सुधेश की एक ग़ज़ल

खिडकी मेँ इक चाँद उगा है अच्छा लगता है
उस से मुहब्बत हो जाएगी ऐसा लगता है ।
इस दुनिया के मेले मेँ तो खूब तमाशे हैँ
फिर भी क्योँ हर शख्स  अकेला लगता है ।
क्या है जिस को ढूँढ रहा हूँ भूल भुलैया मेँ.
जिस को देखा हर चेहरा ही अपना लगता है ।
मँहगाई की नागिन डसती फिरती है सब को
सब कुछ मँहगा मगर आदमी सस्ता लगता है ।
जन्म किसी का मरण किसी का रोना ही रोना
भीगी आँखोँ का यह सागर गहरा लगता है ।
चन्दन के तन के ऊपर सोने के आभूषण
इतनी तामझाम मेँ  मन नँगा लगता है ।
सुधेश
314 सरल अपार्टमैन्ट्स , द्वारका
दिल्ली 110075
फोन 09350974120
परिचय
हिन्दी के कवि एवम् गद्य की अनेक विधाओँ के लेखक।   31 पुस्तकेँ प्रकाशित ।
दिल्ली के जवाहर लाल विश्वविद्यालय मेँ हिन्दी के
प्राध्यापक । प्रोफेसर पद से सेवानिवृत्त ।

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