सुधीर कुमार सोनी की छह कविताएं

बेमिसाल मुहब्बत

पानी के गहरे तल में
पत्थर है
पत्थर के गहरे तल में
पानी है
पानी है
पत्थर है
अटूट प्रेम है
यह शायद कोई नहीं जानता
कि इनके प्रेम की मिसाल दी जाए
धीरे-धीरे कटकर
प्रेम में सब कुछ मिटा देना
पत्थर के सिवाय
कोई नहीं जानता
युगों-युगों से
पानी पत्थर साथ-साथ है
पत्थर होकर
पत्थर सा हृदय लिये
किसी ने किया है ऐसा प्रेम
कुछ बचा रहे
कितना भ्रम पैदा करता है
यह सवाल
कि हमें
जंगल बचाना है
पहाड़ बचाना है
नदियाँ बचानी हैं
संस्कृति/परम्परा बचानी है
व्यवस्था का गाना है
जो सिर्फ गाया जाना है
कुछ लोग
जो करते थे
कहते नहीं थे
उस मुहिम में
मैं भी शामिल हुआ
और जाना
कि क्या-क्या है
जो अपने स्वयं को बचाने में व्यस्त है
नदियाँ
अपनी निर्मलता / पवित्रता बचाने में व्यस्त हैं
धरती व्यस्त है
अपनी हरियाली और उपजाऊपन को बचाने में
सागर अपनी विशालता
और
गुणों को बचाने में व्यस्त है
आसमान
परीक्षणों से लगातार जूझ रहा है
दूषित हवाएं उसके सीने में लदी हैं
अपने नीलेपन को बचाने में
आसमान लाल-पीला हुआ जा रहा है
पहाड़
अपनी चुप्पी
सख्त मिजाज
और खुरदुरापन को बचाने में व्यस्त है
बकरी के झुण्ड
ढूंढ आयें हैं
कुछ ठीये पत्तों के
जो अपनी ताजगी और हरेपन के साथ मौजूद है
विनती है ईश्वर
बचा रहे
थोड़ा सा शुद्ध जल
किसी कुएँ/तालाब/पोखर में
बचा रहे
हमारे बुढ़ापे के समय में
घुटनों में पानी
नौजवानों में बचा रहे
आँखों में पानी
हवा इतनी भी बची रहे
कि रंग-बिरंगे पतंग उड़ सके आकाश में
इतनी उमंग बच्चों के मन में बची रहे
कि तितली के पीछे दौड़ सकें
उड़ते पंछी को निहारे
इतनी सदाशयता
अपनापन बचा रहे
कि बचे हुए समय में
किसी की स्मृति बची रहे
बची रहे कोशिश इतनी भी
कि कुछ भी जो अपने न होने के कगार पर हो
उसे बचाया जा सके
ताकत
एक विमान के
विशाल पंखों में
फँसता एक पक्षी
स्थगित हो जाती है
उसकी यात्रा
मेरी
दुपहिया वाहन की रफ़्तार
रुक जाती है
आँख की भौंह में उलझा होता है
कलम की नोंक के बराबर
एक कीड़ा
प्रकृति ने कितनी बड़ी ताकत दी है
इस नन्हे कीड़े को
आज मैंने
और
विमान चालक ने
अपनी ताकत का अंदाज लगाया
चाक
कुम्हार का
मिट्टी का चाक चल रहा है
लगातार
यहं चाक ही उसका सहारा है
उसका
उसके अपने शरीर के मिट्टी होने तक
लड़ाई
लड़ो कि लड़ने का दौर चल रहा है
क्योंकि सब लड़ रहे हैं
लड़ो कि लड़ाई में मरने वाला
तुम्हारा अपना नहीं है
अपनी जाति का
अपने धर्म का
अपना खून नहीं है
लड़ो कि लड़ने का कोई उद्देश्य नहीं है
तुम्हारे पास
लड़ो कि लड़ाई में
किसी की सलाह की जरूरत नहीं होती
लड़ो कि लड़ने के लिए कोई अनुमति-पत्र की
जरूरत नहीं है
लड़ो
और सारी हदों को पार करके लड़ो
बस एक दिन यूँ ही
जिस पर
अनेक गंभीर आरोप थे
दागी था
उसे चाँद में नहीं दिखा
कोई दाग
जिसे
भूख लगी थी
उसे चाँद रोटी सा लगा
उसने आकाश से
चाँद मांगने की जिद कर ली
जिसे
नींद लगी थी
उसने पथरीली जमीन ढूंढ ली
और
सो गया
जिसे प्यास लगी थी
उसने मिट्टी को निचोड़कर
पी लिया
जिसे छूना था
आकाश
उसने चिड़िया को पकड़ा
हाथ फेरा
और
आकाश में उड़ने छोड़ दिया
जिसे
उजाला चाहिए था
उसने
दुकान से माचिस चुराई
और
उजाले को जेब में रख लिया
जिसे
परदेश से घर
लौटना था
उसने जेल की दीवार फांद ली
मुझे
लिखनी थी कविता
डायरी खोला
तुम्हारा नाम लिखा
कविता
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परिचय

नाम                                        –    सुधीर कुमार सोनी
साहित्यक उपलब्धि                     –     देश के सभी प्रमुख समाचार पत्रों में कविताये प्रकाशित
                     लघु पत्रिकाओं व अन्य पत्रिकाओं मे कवितायें
                      प्रकाशित
                     कादम्बिनी साहित्य महोत्सव में कविता पुरुस्कृत
                      विश्व हिंदी सचिवालय मारीशस से कविता को प्रथम
                      पुरूस्कार
                      स्थानीय नाटकों का गीत लेखन
                      एक संग्रह ”शब्दों में बची दुनिया ” बोधि प्रकाशन  से

सम्पर्क                                     –      अंकिता लिटिल क्राफ्ट ,सत्ती बाजार रायपुर
                       [छत्तीसगढ़ ]
ब्लॉग                                       –      srishtiekkalpna.blogspot.com
ई मेल                                      –       ankitalittlecraft@gmail.com
मोबाईल                                    –      09826174067

3 comments

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