इस निपात समय को जवान बरगद का पेड़ सौंपते कवि की कविताएँ

पुस्तक-समीक्षा

शहंशाह आलम

सुल्तान अहमद समकालीन कविता के वैसे कवियों में शुमार किए जाते रहे हैं, जिनकी कविताएँ हमारे समय की अवनति को, ह्रास को, अध:पतन को को चिह्नित करके जवान, हरियल, उन्नति से भरे पत्ते फागुन और चैत माह को सौंपते रहे हैं। यानी जिस माह में सभी वृक्षों के पत्ते झड़कर नए पत्ते आते हैं, सुल्तान अहमद यही काम कविता के साथ भी करते दिखाई देते हैं। इनके ‘कलंकित होने से पूर्व’, ‘उठी हुई बाहों का समुद्र’, ‘दीवार के इधर-उधर’, ‘लंका की परछाइयाँ’, ‘पहला क़दम’ कविता-संग्रह की कविताएँ कविता के जीवन को मनुष्य के जीवन से जोड़कर देखी जाती रही हैं। मेरा मानना है कि कविता का भी अपना एक जीवन हुआ करता है। तभी तो कविता में सदियों से मनुष्य का जगमग जीवन पूरी तरह प्रकट होता रहा है। कवि का काम ही है रक्त-रंजित स्याह समय का आख्यान रचते हुए मनुष्य-जीवन को जगमग करना। सुल्तान अहमद यही करते आए हैं। तभी तो अपने शिल्प और अपनी भाषा को पसारते-विस्तारते हुए पतझड़ के पेड़ तक पहुँचते हैं, पहुँचकर समकालीन कविता के शिल्प, समकालीन कविता की भाषा को एक नया शब्द-संसार दे डालते हैं। यही वजह है कि अपने नए संग्रह का नाम ‘पतझड़ में पेड़’ रखते हैं और एक ज़बरदस्त आवेग रचते हैं :

आवाज़ों से

आवाज़ें जब

दुश्मनों की तरह

टकरा रही हों

अपने सारे

अर्थ गँवा रही हों

पराजय नहीं है

ख़ामोश रह जाना

बाँसुरी के लिए

जगह बनाना है ( ‘बाँसुरी के लिए’ / पृ. 42 )।

 

सुल्तान अहमद की कविताओं का लोक मनुष्य के अपने लोक का रूपक है। यह चिह्न, यह लक्षण, यह भाव सुल्तान अहमद के कविता-शिल्प को हरदम ताज़ा बनाए रखता है। इनकी कविताएँ आत्मगत, ख़ुद के लिए अथवा आनंद के लिए नहीं रची गई हैं। बल्कि ये कविताएँ उस बड़े समाज के लिए हैं, जिसे पूँजी से लबालब समाज हमेशा घृणा की नज़र से देखता भर नहीं है, घृणा की हद पार करते हुए इस समाज से घृणा करता है। ये कविताएँ उस भूखण्ड की कविताएँ हैं, जहाँ रहने वालों की आँखों का पानी सूख चुका है। इसलिए कि इस भूखण्ड का पानी तक उन तत्वों के लिए है, जो सत्ता पाते तो हैं इस भूखण्ड की विकास से वंचित जनता के प्रयास से, मगर वे उसी पूँजी का हिस्सा होकर इनका सारा हिस्सा मार जाते हैं। सुल्तान अहमद जनता के पक्ष के कवि हैं, सो जनता के पक्ष की लड़ाई अपनी लड़ाई मानकर सत्तापक्ष की मुख़ालफ़त करने से बाज़ नहीं आते। यह सच है कि कविता का हर पक्ष विश्व की आम जनता रही है। इसलिए हर कवि जनता का कार्यकर्ता अपने को मानता रहा है। यह कवि की अपनी परंपरा रही है, इसीलिए प्रत्येक कवि इस परंपरा को बचाए रखना चाहता है। सुल्तान अहमद भी यही करते हैं :

तुम चाहती हो

दीवारों के बीच

जितना विस्तार है

उससे कुछ ज़्यादा हो

मैं चाहता हूँ तुम्हें

पूरा आकाश मिले

पंखों को विकास

शक्ति और अभ्यास मिले

लड़ने को तूफ़ानी हवाएँ

तो आँखों को

वासंती उल्लास मिले

लेकिन इन दीवारों का

मैं भी क्या करूँगा

तुम भी क्या करोगी

व्यक्तिगत ( ‘अपनी मासूम चिड़िया से’ / पृ. 48 )।

समय तेज़ी से आगे की तरफ़ बढ़ रहा है। ग़ौर करने वाली बात यह है कि इस तेज़ी से बदल रहे समय में अपने यहाँ की जो श्रमशील जनता है, इसने ख़ुद को कितना बदला है, इसने अपने सपनों को कितना बदला है, इसने पूँजीवाद के विरुद्ध, शासन-सत्ता के विरुद्ध अपनी लड़ाई का कौन-सा तरीक़ा बदला है? मुझसे इसका उत्तर आप चाहें, तो मेरा उत्तर यही है कि भारत की श्रमशील जनता ने आज़ादी के बाद से आज तक पूँजीवाद से कोई ऐसी गंभीर निर्णायक लड़ाई नहीं लड़ी, जिससे भारत का पूँजीवादी वर्ग, जोकि श्रमशील जनता का ही नहीं बल्कि इस आज़ाद देश को अपनी नई ग़ुलामी में जकड़ रखा है, क़ैद कर रखा है, इस वर्ग में जनता की किसी लड़ाई का भय पैदा होता और यह वर्ग श्रमशील जनता को उसका वाजिब हक़ देता। मुझे लगता है कि पूँजीवाद सत्ता के सुरक्षित संरक्षण में जिस तेज़ी से अपने देश में अपनी जड़ें जमा रहा है, इस पूँजीवाद को ऐसे ही छोड़ दिया गया तो वह दिन दूर नहीं, जब समाजवाद का सपना सिर्फ़ सपना रह जाएगा और भारत की जनता बस मुनाफ़ा बटोरने का ज़रिया भर रह जाएगी। सुल्तान अहमद की भी यही चिंता रही है। इस मुनाफ़ाख़ोर संस्कृति के विरुद्ध कोई निर्णायक लड़ाई हर कवि की तरह सुल्तान अहमद भी चाहते हैं और इस लड़ाई का बिगुल भी बजाते हैं :

एक ख़ौफ़नाक परछाईं है

चौतरफ़ा मंडराती हुई

जिसके सिर से गुज़र जाती है

उसकी साँसें सिकुड़ जाती हैं

सीना सूना हो जाता है

आँखें मरुस्थल की तरह फैल जाती हैं

 

अपनी साँसों को समेटते हुए

एक शहर से

दूसरे शहर भागता है आदमी

उससे तेज़

मंडराती है परछाईं

मेरी ही तरह तुम भी

पहचानते हो उस परछाईं को

और उसे भी

जिसकी है वो (‘ख़ौफ़नाक परछाईं’ / पृ. 30 )।

सुल्तान अहमद पूँजी की जिस काली परछाईं की तरफ़ इशारा करते हैं और पहचान भी बताते हैं, इस परछाईं से कवियों की लड़ाई बेहद पुरानी है। सुल्तान अहमद जनता के जिस शासन का निर्माण विश्व भर में चाहते हैं, यह कठिन निर्माण अवश्य है, परन्तु विश्व की जनता की शक्ति के आगे असंभव कुछ भी नहीं है। इसमें संदेह नहीं कि जनता जब ठान लेती है, तो बड़े-से-बड़े टैंक के आगे सीना तानकर खड़ी हो जाती है और सरकारें यहाँ-वहाँ मुँह छिपाती भागती दिखाई देती हैं। तब भी अपने भारत में जनता के द्वारा ऐसी लड़ाई का सपना बाक़ी है, समर शेष है। इसलिए कि यहाँ की मिट्टी सहिष्णु है। पूँजी के लात-जूते खाकर भी हमने सहिष्णु ही बने रहना सीख लिया है। अब कवि कोई हो, अपने यहाँ के सुल्तान अहमद हों, जो ज़रा धीमी आँच में अपने विरोध को पकाते हैं अथवा पाकिस्तान के अहमद फ़राज़ हों, जो किसी लावे की तरह खदकते हुए अपना विरोध प्रकट करते हैं, दोनों अपने-अपने तेवर के साथ मुनाफ़ाख़ोर सरकारों के विरुद्ध अवाम को उकसाते रहे हैं। मगर अवाम को फ़ुर्सत कहाँ है कि उनके लिए रचे जा रहे शब्दों का परीक्षण करे और कवि द्वारा कहे पर अमल भी करे। इसलिए कि कविताएँ पूरे समाज के लिए होती हैं :

मेरी बातों को

बहकावा समझते हुए

गमलों में चले गए

कुछ दुनियादार पौधे

वक़्त से

खाद-पानी पा रहे हैं

क्या हुआ जो

रह गए हैं बौने ( ‘इस कड़ी धूप में’ / पृ. 74 )।

ग़ौरतलब है कि सुल्तान अहमद उम्मीद के कवि हैं। भले इनकी कविताई किसी सत्ता से, किसी पूँजीपति से, किसी अँधेरे समय से सीधे मुठभेड़ न भी करती हो, तब भी मेरी नज़र में सुल्तान अहमद मुठभेड़ के कवि हैं। इसलिए कि सुल्तान अहमद गुजरात जैसे जिस प्रदेश से आते हैं, जो काले समय की प्रयोगशाला रहा है, जिस काले समय को ख़ुद सुल्तान अहमद ने जिया है, उस काले समय के प्रति उनका तीव्र विरोध न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। इसीलिए सुल्तान अहमद रचनात्मकता से बँधे कहते हैं : सूखे होंठों पर / सूखी ज़बान फेरते हुए / वहाँ से मैंने / सिर्फ़ धुआँ ही देखा / आग नहीं देखी / वह जिन घरों में / लगाई गई थी / उन्हें छोड़कर / किस तरह भागे थे लोग / कौन-कौन-सी ज़रूरी / और कौन-कौन-सी / प्यारी चीज़ें आ गई थीं / उसकी चपेट में / देख नहीं पाया मैं / न यही देखा / कि कोई आदमी / कितनी देर तलक / और किस तरह / ज़िंदा रहा जलते हुए ( ‘उस वहम का डर’ / पृ. 27-28 )। इस लय-प्रवाह में सुल्तान अहमद का ‘पतझड़ का पेड़’ रक्त-रंजित होकर भी, कठिनाई सहकर भी, अशांत रहकर भी हरियल पत्ते अपने कठिन समय को देता-सौंपता है। इसलिए कि कवि अगर सच्चा है, तो वह नपुंसक बने रहना पसंद नहीं करेगा। वह अपने समय को जो भी देगा, सार्थक ही देगा और अपने समय से सार्थक ही चुनेगा। सुल्तान अहमद को पढ़कर सुल्तान अहमद से जो सीखा जा सकता, मैंने यही सीखा है कि अपने समय के छंद को पकड़कर समय को लयबद्ध किया जाना ही समय को रचा जाना है। और सुल्तान अहमद भी इसी सूत्र को पकड़कर कवितारत हैं। इसमें न मुझे कोई संदेह है, न सुल्तान अहमद के पाठकों को।

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पतझड़ में पेड़ ( कविता-संग्रह ) / कवि : सुल्तान अहमद / प्रकाशक : प्रकाशन संस्थान, 4268-बी/3, अंसारी रोड, नई दिल्ली-110002 / मोबाइल : 09979451234 / मूल्य : ₹300

 

समीक्षक संपर्क : शहंशाह आलम, हुसैन कालोनी, पेट्रोल पाइप लेन के नज़दीक, नोहसा बाग़ीचा, नोहसा रोड, फुलवारीशरीफ़, पटना-801505 / मोबाइल : 09835417537

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