सुरेखा कादियान ‘सृजना’ की तीन ग़ज़लें

एक

जिन्दगी को पहेली बनाया न करो
दर्द हो दिल में गर मुस्कुराया न करो

परदा न हो कोई अपनों से कभी
राज गैरों को मगर बताया न करो

डर अंधेरों से है जो इतना तुमको
सितारों से घर अपना सजाया न करो

न हो कि डाल दें तुम्हें ही दरिया में
नेकी इतनी भी तुम कमाया न करो

अपनी खुशियों को तलाशो रोज मगर
बेवजह गैर को तुम सताया न करो

खुद को फ़रिश्ता जो मानो तो मानो
‘हाँ’ हमसे मगर रोज भराया न करो

लबों से कहते हो जाने के लिए
नजर से अपनी मगर बुलाया न करो

दो
इक किस्सा यूँ दोहरा के देखा था
तुमको फिर आजमा के देखा था

फिर न हँसने में वो मज़ा ही रहा
मैंने हर ग़म भुला के देखा था

दिल से उठने लगा जाने क्यूँ धुँआ
इक तेरा ख़त जला के देखा था

ज़िंदा रहने को ज़मीं बेहतर लगी
चाँद के पास जा के देखा था

हो के तन्हा भी मैं खोई तो नहीं
वक़्त ने हाथ छुड़ा के देखा था..

इश्क़ देता है किस तरह दग़ा
ये तेरे पास  आ के देखा था…

तीन

राह मेरी वो देखता होगा
मेरे बारे में सोचता होगा..

आती होगी सूरत मेरी ही नज़र
आईना जब वो देखता होगा

होंगे आँसू कभी लबों पे हँसी

याद से जब वो खेलता होगा..

उसकी चाहत बनूँ कभी मैं भी
ऐसा वो भी तो सोचता होगा…

मैंने उसको कुछ लिखा ही नहीँ
कोरे ख़त कैसे बाँचता होगा…

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सुरेखा कादियान ‘सृजना’

कहानी,गीत, ग़ज़ल, कविताएं प्रकाशित।

हरियाणा के करनाल की निवासी। पेशे से प्राध्यापिका।

‘प्रीत पुरानी गीत नये’ नाम से काव्य संग्रह प्रकाशित

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