सुरेंद्र दीप की तीन कविताएं

सुरेंद्र दीप

 

मां

मां

अपने चश्मे पर विश्वास करती है

और चश्मे का विश्वास मां से उठता जा रहा है

मां

डॉक्टर से बार-बार सलाह लेती है

डॉक्टर की सलाह उसे जंचती है,

अच्छी लगती है

वह चाहती है फिर से

विश्वास की दुनिया में शामिल होना

किलकिलाते शिशुओं को हूबहू देखना

बेटों और बहुओं के चेहरों पर फैली

अनगढ़ रेखाओं को साफ-साफ पढ़ना

पति के लिए बनी चाय में

खुद ही शक्कर बन जाना

लेकिन

चुकती नज़रों के परे जो घर है

मां को उसकी तस्वीर

कहीं अधिक धुंधली महसूस होती है

 

डॉक्टर को चुकती नज़र

आंखों के अन्दर दिखाई देती है

जबकि मां अच्छी तरह से जानती है

उसकी आंखों की रोशनी

घर के भार से

दिन पर दिन दबती जा रही है।

 

आस्था

मां,

मनाती आ रही हैं वर्षों से

जिऊतिया का पर्व

इस विश्वास के साथ

कि होंगे भगवान खुश

उसके अन्न-जल ग्रहण न करने से

और देंगे उसकी संतानों को एक लंबी उम्र

बचाएंगे आने वाली मुसीबतों से

वह शास्त्रों के पचड़े में नहीं पड़ती

उसके शास्त्र वे गल्प कथाएं हैं

जो वह बचपन से सुनती आ रही है

घर-परिवार से, गांव-समाज से

 

आज जब वह

पोते-पोतियों वाली हो गई है

फिर भी करती है खर-जिऊतिया

चाहती है दे देना

अपनी शेष उम्र भी अपनी संतानों को

नहीं चाहती बदले में कुछ

नहीं चाहती सुनना कोई तर्क

अपनी आस्था के खिलाफ

वह कुछ भी कर सकती है

जीवन दांव पर लगा सकती है

शर्त केवल इतनी है

कि उसकी संतानों को मिले लंबी उम्र।

 

संभालकर रखती है वह

अपने ‘जीवीत बंधन बाबा’ को

उसे पूरा विश्वास है

कि उसके गुजर जाने पर भी

‘जीवीत बंधन बाबा’

बचाए रखेंगे उसकी संतानों को मुसीबतों से।

 

औरतें डंडी नहीं मारतीं

मां

औरतें वज़न सही करती हैं

कुछ ज्यादा ही वज़न करती हैं

क्या वज़न करते समय

वे कुछ याद करती हैं

कुछ गुनती हैं?

ठीक कहते हो मेरे बेटे

औरतें याद करती हैं

अपने बेटों को, अपनी संतानों को

जब वे वज़न करती हैं

वे रखती हैं

एक पलड़े में अपनी संतानों को

और दूसरे में लाभ को

उनको चुनना होता है

बेटे और डंडी में से एक को

डंडी मारना, बेटे को मारना है

औरत मांग कर खा लेगी

मगर डंडी नहीं मार सकती।

 

निर्भय होकर खरीदा करो

वात्सल्य-हृदया औरतों से

साग-सब्जी, फल-फूल

औरत की ईमानदारी सदी की आशा है

परिभाषा मनुष्यता की

 

कोलकाता के वरिष्ठ कवि सुरेंद्र दीप की कविताएं समकालीन समाज की विडंबनाओं की पड़ताल बड़ी ही संवेदनशीलता के साथ करती है। चाहें इंसानी रिश्ते हों या राजनीतिक दांवपेंच—उनकी कलम सब पर समान रूप से चलती है। वो उद्गार पत्रिका के संपादक भी हैं।

You may also like...

1 Response

  1. उपरोक्त छन्द-मुक्त कवितायें सरस,प्रवाह-युक्त एवम् भारतीय संस्कति में मूलभूत अवधारणाओं को बड़ी सहजता और सादगी से अभिव्यक्त कर जाती हैं.साथ ही, कहना न होगा कि कवि महोदय जमीन से जुड़े हुए सशक्त हस्ताक्षर हैं.. प्रोफ. चेतन प्रकाश ‘चेतन’

Leave a Reply