सुरेंद्र कुमार की पांच ग़ज़लें

एक

जैसे हो तुम, हुए वैसे ही हम
इनायत, नवाज़िश, इलाही करम

खाने ना देना हमें तुम कभी
लबों की क़सम, गेसुओं की क़सम

इंकार कर दे, ज़रा दम तो लूं
तेरी हां से जानां गई नब्ज़ जम

ये गज़लें ये, नज़्में, नज़रबन्द हैं
चारों दीवारों में घर की सनम

रुतबा मिला, खासी इज़्ज़त मिली
क़ुर्बान जाऊं तेरे मैं शरम

तभी जा के पाई है सादा-दिली
लिए आज़मा शोख़ सब पेचो-ख़म

 दो

सहन में फ़लक़नुमा नज़ारे हैं
चांद के साथ-साथ तारे हैं

प्यारा-प्यारा है सब नज़ारों में
आप जो ज़हन में हमारे हैं

एक वाहिद यही वो गुलशन है
ख़ार भी गुल की तरह न्यारे हैं

ये चढ़ी सांस, डोलती आंख़ें
वल्लाह किस बात के इशारे हैं

इश्क़ के साथ-साथ ही हमने
फर्ज़ के क़र्ज़ भी उतारे हैं

थोडा ख़र्चा फ़िज़ूल कर लेना
कितने घर आपके सहारे हैं

 तीन

अना आज चूल्हे में सालिम जला लूं
चलो आज मैं घर की रोटी पका लूं

नहीं करने देगी मुझे चूल्हा-चौका
थकी है, चलो आओ चाय बना लूं

न ये कमतरी है, न है कोई हत्तक
धोए वो, मैं छत पे कपड़े सुखा लूं

जगाऊं सवेरे कुछ दिन तो घर भर
सोने से पहले मैं सब को सुला लूं

ज़ुबां बंद होगी, बदन जल उठेगा
उसको सुनाया जो ख़ुद को सुना लूं

सबर, इत्मिनान, सहन, फ़ितरत, बेग़र्ज़ी
उसका सभी कुछ मैं अपना बना लूं

भूखी है वो बस ज़रा सी क़दर की
ज़रा ध्यान देकर मैं क्यों न मज़ा लूं

बंधीं हैं जो नादान अपनी रज़ा से
उन्हें भी ज़रा सी आज़ादी चखा लूं

दे दी है मंज़ूरी हंस के ज़हन ने
तेरे नाम की दर पे पट्टी लगा लूं

 चार

चांद तक सीढ़ियां लगाने का
दिल में है कर के कुछ दिखाने का

मार कर या गुलेल से गोटी
चांद को फ़र्श पर गिराने का

तोड़ साग़र तलक के पास नहीं
मस्त आंखों मे डूब जाने का

एक चाहत है एक ही मक़सद
आपसे आपको चुराने का

एक मौक़ा तो दीजियेगा हुज़ूर
अपनी तालीम आज़माने का

बड़ी मेहनत से हुनर पाया है
दिल को बात से गुदगुदाने का

ये मेरे शेर नहीं हैं जानां
हाले-दिल है हरिक दीवाने का

अब भला क्या कहे के क्या हासिल
उनको ताज़ा गज़ल सुनाने का

 पांच

कांटा लगे चहकने पत्थर भी गुनगुनाये
है शर्त सिर्फ़ इतनी वो सुर में सुर मिलाये

इक रात में उजाले उम्रों के भर लिये है
सूरज की अब ख़ुशी है कल आये या ना आये

बगिया मे मेरे घर की है प्यार की पनीरी (nursery)
दरकार हो जिसे वो इक पौधा ले के जाये

सूरज भी ठहर जायेगा और वक़्त भी रुकेगा
सहला के पीठ पर वो हाथ जो फिराये

धरती है कहां बदली सूरज भी ज्यों का त्यों है
सदियों के ज़लज़ले भी क्या इनको बदल पाये

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