सुरेश शर्मा की तीन कविताएं

भयावह दिनों में भरोसे की कविता

( एक )

हम
परास्त करेंगे
उस काले-दैत्य को !

जो लाल, हरे व भगवा रंगों में आता है
और सपनों में मीरा व मरियम को डराता है

ताकि
हो सके तय
कि भरोसा, भय पर भारी है
जंग हर लम्हा जारी है….!!

(दो)

हम
करेंगे मुकाबला
बुरे दिनों का

ताकि,
अच्छे दिनों कि
छांव में मुस्करा सकें
बुरे दिनों की पराजय पर!

हम
चढ़ेंगे दुर्गम चढ़ाइयाँ
और तलाश ही लेंगे जगह
पताका के लिए

ताकि,
हो सके तय
कि राजा हो या पहाड़
कद इरादों का
सबसे बड़ा होता है!

हम
भयावह दिनों में
भरोसे की तरह उतरेंगे दिलों में
और तलाश ही लेंगे सुरंग रोशनी की

ताकि,
अच्छे दिनों की छाँव में
सुना सकें बच्चों को
बुरे दिनों की
पराजय की कहानी!!

कविता! इन दिनों
इन दिनों/जबकि
विदूषक के गेटअप में
मनोरंजन की भूमिका लिए
मंच पर थिरक रही हो कविता
या काफ़ी हॉउस की/ धुँआती गोष्ठियों में
किसी स्मैकिया लड़के-सी कुंठित/ कर रही हो प्रलाप!

कवि! गा रहे हों बसन्त-बहार
निर्जन पहाड़ों पर..मैदानों में या
नदियों के घुटने भर पानी में,
धरती /दरक रही हो बदस्तूर..बदस्तूर कायम हों
भूख के सवाल/ और आदमी
निरंतर अनुपस्थित हो रहा हो कविता-से

तो, बेहद ज़रूरी होता है
सूनी चौपालों पर..सपनों में बच्चों के ..
गाँव के होठों पर/रौंपे हम शब्दों को
एक बेहतर कविता के लिए!!

 

 

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