सूर्यनाथ सिंह की कहानी ‘रजामंदी’

सूर्यनाथ सिंह

जन्म : 14 जुलाई 1966 

स्थान : सवाना, गाजीपुर

इलाहाबाद विश्वविद्यालय और फिर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से पढाई

कई कहानी संग्रह और उपन्यास प्रकाशित। नया उपन्यास 'नींद क्यों रात भर नहीं आती' हाल ही में प्रकाशित।

जनसत्ता  में वरिष्ठ पत्रकार

‘साहब, मेम साहब आई हैं।’ मुन्नन मियां ने ऊपर आकर अंजनी कुमार को सूचना दी। उनकी सूचना में यह प्रश्न भी शामिल था कि वे क्या करें, उन्हें बैठक में बिठाएं या कोई बहाना बना कर वापस भेज दें।

अंजनी कुमार ने आंखें खोलीं और मुन्नन मियां की तरफ सवालिया नजर से देखा। आजकल वे जागते हुए भी ज्यादातर आंखें बंद करके ख्वाबों की दुनिया में खोए रहते हैं। इस तरह वे अपनी देखी हुई दुनिया को दुबारा देखने और स्मृतियों में देर तक खोए रहने का सुख पाते रहते हैं। मुन्नन मियां से सूचना पाकर वे यथार्थ में लौट आए थे। हालांकि वे समझ तो गए कि मुन्नन मियां किसके बारे में कह रहे हैं, पर उन्हें यकीन नहीं हुआ। इस तरह अचानक उसके आने की उम्मीद उन्हें नहीं थी।... दिल की धड़कन बढ़ गई थी। हाथ-पांवों में कंपकंपी होने लगी। गला सूखने लगा। थूक गटक कर उन्होंने खुद को संयत करने की कोशिश की। हकलाते हुए पूछा- ‘कौन-सी मेम साहब?’

‘अलंकार साहब की मम्मी।’ मुन्नन मियां ने बिना कोई देर किए जवाब दिया। उनकी नजरें अंजनी कुमार के चेहरे पर अटकी थीं। शायद वे प्रतिक्रिया देखना चाहते थे कि यह खबर सुन कर अंजनी कुमार के चेहरे पर क्या भाव आते हैं।

जवाब सुन कर अंजनी कुमार की नजरें मुन्नन मियां के चेहरे पर जैसे जम गईं। उस पर खुशी और आशंका के मिश्रित भाव थे। अंजनी कुमार के भीतर जैसे कोई आंधी चलने लगी हो। क्षण भर में ही हजारों सवाल बवंडर की शक्ल में उन्हें घेरे हुए उड़ा ले जाने को जोर मारने लगे। मगर तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों को चीर कर बाहर निकलने में माहिर अंजनी कुमार ने खुद को दृढ़ किया और बिस्तर पर उठ कर बैठते हुए कहा- ‘नीचे ही आता हूं।... बाहर लॉन में बिठाइए। वहीं चाय ले आइएगा।...’

मुन्नन मियां चले गए तो अंजनी कुमार थोड़ी देर बिस्तर पर पीठ टिकाए, खिड़की से बाहर देखते हुए उठंगे रहे। खिड़की की तरफ झुक आई अमलतास की टहनी को देखते रहे। उन्हें हैरानी हुई कि खिड़की के बाहर तो वे रोज देखते हैं, पर अमलतास की टहनी आज उन्हें नई क्यों लग रही है। जैसे आज ही अचानक खिड़की की तरफ झुक आई हो। जैसे इससे पहले उसे कभी देखा न हो। अमलतास के पत्ते गिरने लगे थे। टहनी पर हरी-पीली कलियों के गुच्छे लटक आए थे। दो-एक दिन में ये गुच्छे पीले फूलों से भर जाएंगे। अंजनी कुमार उन गुच्छों को देखते रहे। मगर उन्हें इस बात से कोई पुलक नहीं हुई कि अमलतास कुछ दिनों में पीले फूलों से लद जाएगा। उनके भीतर सवालों का बवंडर वेग से नाच रहा था। उनमें से कोई भी सवाल ठीक से न तो पकड़ में आ रहा था, न किसी सवाल का जवाब उन्हें सूझ रहा था। फिर जैसे उन्होंने अपने को तैयार कर लिया कि यहां बैठ कर मंथन करने के बजाय सामने बैठ कर ही स्थितियों का सामना करना चाहिए।... उन्होंने अंदाजा लगाया कि जरूर अलंकार ने नलिनी को उनकी तबीयत के बारे में बताया होगा और वह सुन कर मिजाजपुर्सी के लिए आई होगी।... मगर वह सिर्फ मिजाजपुर्सी के लिए खासकर आई, हैरानी की बात है। मन के किसी कोने में एक सवाल कुलबुलाया।

वे बिस्तर से उठ कर बाथरूम में गए। कुर्ते की सिलवटें ठीक की। पानी से कुल्ला किया। मुंह धोया और बालों में कंघा करके एक बार अपने चेहरे को आईने में गौर से देखा। वे आश्वस्त हुए कि चेहरे से बीमार नहीं लग रहे। उन्हें बीमार दिखना बहुत बुरा लगता है। वे कभी नहीं चाहते कि लोग उन्हें बीमार मान कर सहानुभूति जताएं। वे हमेशा तकलीफ में भी चेहरे पर ऐसा भाव बनाए रखने का प्रयास करते रहे हैं कि जैसे पूरी तरह स्वस्थ हैं। अगर कभी कोई पूछता भी है कि आपका स्वास्थ्य ठीक तो है न, वे कुछ तुर्शी से उल्टा पूछ बैठते हैं- क्यों, मेरे स्वास्थ्य को क्या हुआ? सामने वाला निरुत्तर रह जाता है। इस मामले में बचपन में सुनी एक कहावत उनके मन में घुमड़ जाती है- अपनी गरीबी और बीमारी किसी के आगे नहीं रोना चाहिए। सो, वे उस पर अमल करने का प्रयास करते हैं। फिलहाल वे नहीं चाहते थे कि निलिनी उनके स्वास्थ्य को लेकर कोई बात करे। मगर इसे टालना भी तो संभव नहीं था। वे जानते थे कि वह आई ही है उनकी तबीयत खराब होने की सूचना पाकर। सो, तबीयत को लेकर सवाल तो करेगी ही।... खैर।

अंजनी कुमार नीचे उतरे तो उनकी नजर सोफे के पास रखे ब्रीफकेस पर पड़ी। नलिनी का ही था। फिर उनके भीतर सवाल घुमड़ने लगे- शायद कहीं गई होगी, वहां से लौट रही होगी। या यह भी हो सकता है कि इसी शहर में उसका कोई प्रोग्राम रहा हो और वहां से लौटते समय मुझसे मिलने आ गई हो। शायद उसकी फ्लाइट जाने में अभी वक्त हो, इसलिए थोड़ी देर को यहां आ गई हो। ट्रेन से तो वह चलती नहीं, ट्रेन में उसे ‘सफोकेशन’ और ‘बोरियत’ होती है। वह तो कहीं भी दो-तीन घंटे में पहुंच जाना चाहती है। रात-रात भर ट्रेन में सफर करना उसे पसंद नहीं।... उनके भीतर एक कसक उठी कि- फार्मेलिटी करने आई है। मैं खामखा सोच रहा था कि वह विशेष रूप से मेरा हालचाल लेने आई है।...

बैठक से बाहर निकले तो देखा, नलिनी लॉन में बैठी है। उसकी पीठ घर की तरफ है। एक हाथ को उसने छाती तक मोड़ रखा है और उस पर दूसरी कुहनी टिका कर हथेली से ठुड्डी को टेक दिए सामने पेड़ों की तरफ निहार रही है। पीछे से ही देख कर जैसे अंजनी कुमार ने अंदाजा लगा लिया कि वह कुछ सोच रही है।... सोचना तो एक सतत प्रक्रिया है।... उसका मूड इस समय कैसा है, इसका अंदाजा वे उसकी पीठ देख कर नहीं लगा सके।

उनके पैरों की आहट पाकर नलिनी ने पीछे मुड़ कर देखा और कुर्सी से उठ खड़ी हुई। उसने आगे बढ़ कर अचानक अंजनी कुमार को बाहों में भर लिया। अंजनी कुमार इस स्थिति के लिए तैयार न थे। मगर उससे गले लग कर जैसे उनके भीतर का बवंडर शांत हो गया था। उन्होंने भी अपने दोनों हाथ उठा कर नलिनी की पीठ पर रख दिए और प्यार से सहला दिया। हालांकि वे जानते थे कि मुन्नन मियां किचेन की खिड़की से उन दोनों को देख रहे होंगे, पर उन्हें नलिनी से इस तरह गले मिलना अच्छा लग रहा था। वे यह भी जानते थे कि अगर मुन्नन मियां उन्हें इस तरह मिलते देख रहे होंगे तो उन्हें अच्छा लग रहा होगा। बल्कि वे चाहते थे कि मुन्नन मियां उन्हें इस तरह मिलते हुए देखें।

अंजनी कुमार ने नलिनी को कुर्सी पर बैठने का इशारा किया और खुद उसके पास की कुर्सी पर बैठ गए। आमतौर पर वे सामने वाली कुर्सी पर बैठते हैं। कोई और होता या शायद नलिनी इस तरह उनसे गले न मिलती तो शायद वे सामने की कुर्सी पर ही बैठते। पर अपने इस नियम को वे भूल गए या शायद जानबूझ कर उसका पालन नहीं किया।

कुर्सी पर बैठते हुए उन्होंने सहज भाव से पूछा- ‘अचानक आना हुआ?... किसी प्रोग्राम में आई थी क्या?’

‘क्यों, बिना किसी प्रोग्राम के नहीं आ सकती?’

अंजनी कुमार झेंप-से गए। सोचा, इस तरह सवाल के जवाब में सवाल करना नलिनी की पुरानी आदत है। समय गुजरने के साथ-साथ आदमी बेशक कुछ बदल जाता है, पर उसका स्वभाव और कुछ आदतें नहीं बदलतीं। मगर उन्हें उसके सवाल का बुरा इसलिए नहीं लगा कि नलिनी ने मुस्कराते हुए सवाल किया था। उसके बोलने के अंदाज में चिढ़ या नाराजगी नहीं थी। मुलायमियत थी। सो, उन्होंने झेंपते हुए कहा- ‘क्यों नहीं।... मुझे थोड़ी हैरानी हुई... इसलिए पूछा।’

‘हैरानी का भी अपना सुख होता है, इसलिए समझो कि तुम्हें हैरान करने चली आई। मुझे देख कर शॉक तो नहीं लगा न?...’

इस तरह अपनी बातों को दार्शनिक कलेवर देने और रहस्य बनाए रख कर बात करने का नलिनी का अंदाज भी अंजनी कुमार के लिए नया नहीं था। अक्सर वे उसके इस अंदाज पर उससे सहमत होने का नाटक करते हुए अपनी बात का रुख दूसरी तरफ मोड़ देना उचित समझते रहे हैं। इस बार भी उन्होंने ऐसा ही किया- ‘अच्छी बात है।... हाथ-मुंह धोना चाहो तो धो लो, मुन्नन मियां चाय लाते होंगे।...’

‘वह तो मैं धो लूंगी। पहले तुम ये बताओ, मेरा आना तुम्हें अच्छा लगा या नहीं।’

अंजनी कुमार उसके इस स्वभाव से भी बखूबी वाकिफ थे कि वह जब तक अपनी बात मनवा नहीं लेती, सवालों की जलेबी बनाती रहेगी। उन्होंने गरमजोशी से कहा, ‘आफकोर्स अच्छा लगा। न लगता तो इस तरह तुम्हारे पास न बैठा होता।’

‘नहीं, कई बार फार्मेलिटी में भी लोगों को ऐसा करना पड़ता है।’

‘कम ऑन नलिनी।...और बताओ, तुम्हारा कैसा चल रहा है?’

‘क्या कैसा चल रहा है?’

‘तुम्हारा कामकाज।... लाइफ।...’

‘कौन-सा कामकाज?’

‘... एनजीओ का!’

‘वह सब बंद कर दिया।... साल होने को आ रहा है। जो प्रोजेक्ट पेंडिंग थे, पूरा करके डाक्यूमेंट्स सबमिट कर दिए। अब नया कोई प्रोजेक्ट लेती नहीं। ऑफिस लगभग बंद है।...’

‘क्यों, क्या हुआ?’

‘कुछ खास नहीं। बस, मन ऊब गया।... वैसे भी जब से नई सरकार आई है, एनजीओज पर सख्ती बढ़ गई है। फंड वगैरह लेने में मुश्किल होती है।...फिर, मन भी नहीं होता। थक गई हूं, यह सब करते-करते। अब आराम करना चाहती हूं। सो, बंद कर दिया। कंसलटेंसी देती हूं। किसी को कोई सुझाव चाहिए तो दे देती हूं। सेमिनार वगैरह में कोई बुलाता है तो चली जाती हूं।... बहुत काम कर लिया। अब घर पर रह कर किताबें पढ़ती हूं, मन हुआ तो कहीं घूमने चली जाती हूं।...’

‘अच्छी बात है।...’

मुन्नन मियां चाय ले आए थे। टेबल पर सजाते हुए बोले- ‘मेम साहब, फिश कटलेट बना लाऊं क्या?... पता नहीं दोपहर को खाना खाया या नहीं, भूख लगी होगी।...’

नलिनी ने ट्रे में सजे बिस्किट, नमकीन, टोस्ट वगैरह की तरफ देखा, फिर मुन्नन मियां की तरफ मुखातिब हुई- ‘इतना सारा कुछ तो ले आए।... दोपहर को खाना खाया था, भूख नहीं है।... वैसे आपके हाथ का कटलेट तो खाऊंगी। बहुत अच्छा बनाते हैं। कबसे नहीं खाया।... मगर, आपसे एक शिकायत है कि साहब का खयाल नहीं रखते।... वरना अटैक न पड़ता।’

मुन्नन मियां झेंप-से गए थे। उन्होंने एक बार अंजनी कुमार के चेहरे की तरफ देखा और फिर जमीन की तरफ नजरें झुका लीं।

‘अगर मुन्नन मियां न होते तो आज शायद तुम्हारे साथ यहां चाय न पी रहा होता मैं।... बहुत खयाल रखते हैं मेरा।...’ मुन्नन मियां की तरफ से अंजनी कुमार ने जवाब दिया।

मुन्नन मियां यह कह कर वहां से चले गए कि मैं नाश्ता बना कर लाता हूं।

नलिनी ने केतली से प्यालों में चाय ढालते हुए बात शुरू की- ‘ऐसी कौन-सी बात दिल से लगा बैठे कि वह उसका बोझ सह न सका?’

‘अरे कुछ नहीं, मामूली ब्लॉकेज था।... उस रात बेचैनी महसूस हुई, तो मुन्नन मियां अस्पताल ले गए। अस्पताल वालों ने भर्ती कर लिया और अगले दिन बाईपास करके ब्लॉकेज हटा दिया।... अब मैं बिल्कुल फिट हूं।...’

‘ज्यादा पीने लगे हो क्या?’

‘नहीं। वही रोज का तय कोटा।...’

‘अंजना तुम्हें देखने नहीं आई?’

अंजनी कुमार को इस सवाल की उम्मीद नहीं थी। वे चुप रहे। नलिनी का सवाल सुन कर उनके भीतर माचिस की तीली माफिक गुस्सा फक से जल उठा। पर उन्होंने उसे जाहिर नहीं होने दिया। उसे बुझ जाने दिया। सोचा, अब गुस्से को आग के गोले की तरह उगलने का वक्त नहीं रहा। वैसे भी घर आए मेहमान से तो कतई नहीं। थोड़ी देर चुप रहने के बाद उन्होंने कहा- ‘...अभी तक तुम्हारे दिमाग की सुई अंजना पर अटकी हुई है!’

‘वह तो जिंदगी भर वहीं अटकी रहेगी।’

‘मगर उससे हासिल भी क्या होने वाला है!’

‘मैंने तो कुछ हासिल करने के मकसद से ऐसा किया नहीं। जो किया, तुमने किया, वही याद रहता है।’

‘मगर तुम्हारी गलत व्याख्या की वजह से उस मामले ने गलत रुख ले लिया।...’

‘अच्छा, मैंने गलत व्याख्या की! तुम छिप-छिप कर उसके साथ नाजायज संबंध बनाते रहे और मुझे पता चल गया तो वह मेरी गलत व्याख्या हो गई। अगर मैं मुंह बंद रखती, तुम दोनों के बीच जो चल रहा था उसे चुपचाप सहती रहती, तो सब ठीक रहता।... और अगर मेरी व्याख्या गलत थी, तो मेरे जाने के बाद वह तुम्हारे साथ रहने आ गई थी, वह क्या सही था?’

‘वह मेरी दोस्त थी, बस।... और तुम्हारे जाने के बाद मेरे पास इसलिए रहने आई थी कि उसके भाई और भाभी ने उसे प्रताड़ित किया था। वह उनका घर अचानक गुस्से में छोड़ आई थी।... जब उसने किराए का घर ले लिया तो चली गई थी मेरे पास से। हमेशा के लिए मेरे पास नहीं आई थी। तीन-चार दिन रही थी। गेस्ट की तरह।... मुन्नन मियां इसके गवाह हैं।... और अगर मेरे उसके साथ इस तरह के संबंध होते तो मैं तुम्हारे जाने के बाद उसे अपने साथ रख सकता था।...’

‘अब भी समय बीता थोड़े है, रख लो साथ। वह भी तो कुंआरी है। अभी तक शादी नहीं की।... वह तो तैयार बैठी है। बुला लो।...’

‘नलिनी, छोड़ो उस बात को। उसने शादी क्यों नहीं की, यह उसका व्यक्तिगत मामला है। मैं बस उसे दोस्त मानता था।... अब तो कोई संपर्क भी नहीं रहा।... और इस तरह किसी के जीवन को बिना जाने-समझे उसे बदनाम करना ठीक नहीं।...’ अंजनी कुमार ने बात टालने की गरज से कहा।

‘मैंने तो उसे बदनाम नहीं किया।... पूरी दुनिया जानती है तुम दोनों के संबंधों के बारे में।...’ मगर नलिनी बात को पकड़े हुए थी।

‘देखो नलिनी, लोग किसी के बारे में जो कुछ कहते-सोचते हैं, वह पूरी तरह सही हो, जरूरी तो नहीं।... लोग क्या तुम्हारे बारे में नहीं कहते।... क्या मैं नहीं जानता कि तुम्हारी कितने पुरुषों से दोस्तियां हैं और किनके प्रति तुम्हारे मन में क्या है।... मुझसे अलग होकर तो तुमने अपनी दूसरी शादी के लिए विज्ञापन तक दिया था।...’

‘उसमें बुरा क्या है? तुमसे अलग होने के बाद विज्ञापन दिया था। दूसरी शादी करना चाहती थी, इसमें बुराई क्या है?’

‘मैं अच्छाई-बुराई नहीं बता रहा। मैं तो बस यह कह रहा हूं कि पुरुषों के साथ तुम्हारी भी निकटता रही है।... तुम भी कम महत्त्वाकांक्षी नहीं। मैं तो गांव के किसान का बेटा हूं। अपनी मेहनत के बल पर यूपीएससी की परीक्षा पास करके नौकरी पाई थी। तुम तो खानदानी रईस हो। तुम्हारे दादा भी प्रशासनिक अधिकारी थे, पापा होम मिनिस्ट्री में चीफ सेक्रेटरी थे, रिटायर होते ही राज्यसभा के मेंबर बन गए।... तुम्हें नेताओं और कॉरपोरेट्स की शानोशौकत शुरू से ललचाती रही। उन्हीं के बीच उठना-बैठना तुम्हें रास आता था।... उनमें से किस-किस के प्रति तुम आकर्षित थी, छिपी बात नहीं है। ऐसा नहीं कि मुझे तुम्हारे आकर्षण के बारे में पता नहीं था। मगर मैं यह सोच कर चुप रहता था कि यह मनुष्य में स्वाभाविक है। पुरुष स्त्री के प्रति और स्त्री पुरुष के प्रति आकर्षित होता ही है। एक उम्र तक यह सभी के साथ होता है। मगर असल बात है कि वह वास्तव में किससे जुड़ा है। बाहर के आकर्षण का अंत नहीं, वास्तविक जुड़ाव जहां होता है, वही सच होता है।...’

‘फिर तुमने मुझे जाने से रोका क्यों नहीं?’

‘कोई फायदा नहीं था।... तुम शुरू से मुझसे अलग होना चाहती थी। बहाने तलाशती थी अलग होने के। उसके लिए तुमने तैयारियां भी बहुत सोच-समझ कर की थीं। पहले नोएडा वाला घर अपने नाम कराया। उसमें अपने एनजीओ का दफ्तर खोला। फिर किसी न किसी बात को लेकर मुझ पर आरोप लगाती रही। अंजना ही क्यों, किसी भी औरत के साथ तुम मेरे संबंध जोड़ देती थी। अगर किसी से फोन पर भी बातें कर लूं, तो तुम यही प्रचारित करती थी कि मेरे उससे संबंध हैं। पहले मैं समझता था कि तुम मुझे लेकर पजेसिव हो। मगर मैं गलत साबित हुआ।... मेरे दोस्तों, मेरे जानने वालों में यही प्रचारित करती रही कि मैं तुम्हें प्रताड़ित करता हूं। दूसरी स्त्रियों से मेरे रिश्ते हैं। फिर अंजना से मेरी दोस्ती को इतना तूल दिया कि सबने मान लिया कि मेरे उससे जिस्मानी रिश्ते हैं। मैं वाकई ऐयाश हूं। मुझे अपने परिवार की कोई फिक्र नहीं।... जबकि तुम एक रणनीति के तहत यह सब कर रही थी। तुम कभी शादी के मूड से बाहर निकल ही नहीं पाई। तुम्हें हर समय यही लगता रहा है कि तुम्हारी शादी गलत आदमी से हो गई। किसी भी कोण से मैं तुम्हारे लायक हूं ही नहीं। मेरी नौकरी, मेरे दोस्त, मेरे परिवार के लोग, सब तुम्हें थर्ड ग्रेड के लगते रहे। इसलिए हर समय तुम बेहतर शादी का विकल्प तलाशती रही।... तुम्हारी वजह से अपने परिवार वालों से मेरी दूरी बढ़ती गई। दोस्तों को घर तभी बुलाता, जब तुम नहीं होती। ज्यादातर उन्हें क्लब में ही बुलाता या मिल लेता।... शादी के मूड से बाहर न निकल पाने का नतीजा यह भी हुआ कि तुम एक बेहतर मां भी नहीं बन सकी। अलंकार से भी तुम्हारी निकटती नहीं बन पाई। एक खिंचाव का ही रिश्ता रहा तुम दोनों में। दरअसल, तुम्हारे लिए परिवार कोई अर्थ रखता ही नहीं। तुम सिर्फ अपने बारे में सोचती हो। परिवार के प्रति तुम्हारा कमिटमेंट कभी रहा ही नहीं। वह बस एक ऐसी जगह रहा, जहां तुम अपनी खुशियां जाहिर कर सको, बाहर के तनाव उड़ेल सको, जिसके जरिए समाज के बनाए नियमों के पालन की गारंटी दे सको।... अपनी खुशियां तुम सदा बाहर तलाशती रही। घर में तो तुम्हें दिक्कतें ही दिक्कतें थीं।...

‘मैं यही उम्मीद पाले रहा हरदम कि कभी न कभी तुम परिवार को लेकर संजीदा होगी। हमारे बीच मधुरता आएगी। मगर मैं गलत साबित हुआ।... उस दिन तुमने इतना झगड़ा किया कि मैं हार गया। मन खट्टा तो बहुत पहले हो गया था। मैं सोचने लगा था कि जब हम दो घंटे भी शांति से साथ नहीं रह पाते, किसी न किसी बात पर लड़ते-झगड़ते ही रहते हैं, तो बेहतर है कि दूर हो जाएं।... हमारे झगड़े का असर अलंकार पर पड़ता था। तुमने उसे हॉस्टल भेज कर अपनी जिम्मेदारी से मुक्ति पा ली थी। फिर तो तुम पूरी तरह आजाद थी। बच्चे के प्रति जिम्मेदारियों से मुक्त।... कहां जा रही हो, क्या कर रही हो, उन बातों की खबर मुझे बाहर वालों से मिलती। मैं इसलिए समझौते करता रहा कि हमारे अलग होने से समाज में गलत मैसेज जाएगा। आखिर हम तनहा तो नहीं होते, हमसे जुड़े बहुत-से लोग होते हैं। दोस्त, रिश्तेदार, परिवार के लोगों पर भी उसका असर पड़ता है। लोग तरह-तरह की बातें करते हैं।... लोगों की तो यह भी फुसफुसाहट मेरे कानों में पड़ती कि मैं कैसा नामर्द हूं कि बीवी पर नकेल नहीं कस पाता। मगर ऐसा मैं उचित नहीं मानता। मैंने तुम्हें हमेशा अपने ढंग से जीने की आजादी दी, तुम्हारी आजादी छीन कर अपनी मर्दानगी बढ़ाना मैंने उचित नहीं समझा।... मगर मेरी ढील का फायदा उठाया तुमने, जो मन में आता करती रही।... यह तो अच्छा हुआ कि अलंकार पढ़-लिख गया और बोस्टन में जा बसा।... फिर उस दिन जब तुमने नोएडा वाले मकान में शिफ्ट होने का फैसला सुनाया तो तुम्हें रोकने का कोई तर्क नहीं था।...’

अंजनी कुमार बगैर किसी तल्खी के, मद्धिम स्वर में बोले जा रहे थे। नलिनी ने देखा, उनके चेहरे पर पीड़ा गहरा गई थी। उनके स्वर में दर्द था। नलिनी ने महसूस किया, जैसे कोई फोड़ा फूट कर बह रहा हो। अंजनी कुमार के पास कहने को जैसे बहुत कुछ था, पर वे अब चुप हो गए थे।

नलिनी ने अंजनी कुमार के चेहरे से नजरें हटाई। कुछ देर चुप्पी साधे पेड़ों की तरफ देखती रही, कुछ सोचती रही। अब दोनों के बीच सन्नाटा पसरा रहा। अंजनी कुमार ने नलिनी के चेहरे की तरफ देखा। उसका चेहरा उसके भीतर का पता दे रहा था। उसके भीतर प्रतिवाद की लहरें उठ रही थीं। आक्रोश झलक-झलक जा रहा था, पर वह लंबी सांस लेकर अपने को जबरन थिर कर रही थी। फिर यह भी भाव तैर जाता था कि कहीं न कहीं वह अंजनी कुमार की बातों से सहमत है, या उनका जवाब देकर शायद वह इस समय झगड़ा बढ़ाना नहीं चाहती थी। शायद अंजनी कुमार के दिल के दौरे का खयाल आ जाता हो उसे। फिर उसके चेहरे पर आश्वस्ति का यह भी भाव उभर आता था कि अच्छा है, अंजनी के भीतर बरसों का जमा गुबार बाहर निकल आया। जो फोड़ा इतने समय से उनके भीतर टभक रहा था, वह फूट कर बह गया। इस तरह वे कुछ हल्का अनुभव करेंगे। वह चुप ही रही। अंजनी कुमार भी चुप हो गए थे। थोड़ी देर चुप्पी जमी रही। बस बीच-बीच में चाय सुड़कने की आवाज उठती।... फिर गहरी सांस लेकर सन्नाटा नलिनी ने ही तोड़ा, ‘तुम लखनऊ क्यों आ गए?... दिल्ली में तुम्हारे दोस्त थे, जान-पहचान वाले थे। अचानक यहां रहने का फैसला क्यों किया?’

‘अचानक फैसला नहीं किया। पहले से तय था। रिटायर होने के बाद सरकारी घर खाली करना था। दिल्ली में कोई अपना घर था नहीं। लखनऊ में यह घर था ही। काफी जगह भी है इसमें। अलंकार के वापस लौटने की कोई गुंजाइश है नहीं, सो रहना ही है तो दिल्ली रहो, लखनऊ रहो, क्या फर्क पड़ता है। कोई ऐसा काम तो है नहीं कि दिल्ली में रहना मजबूरी हो। रिटायरमेंट काटना है। सो, मुन्नन मियां से सलाह की और आ गए हम दोनों यहां।...’

‘तुम्हें अकेलापन नहीं लगता यहां?’

‘दिल्ली में रहता तो भी ऐसे ही रहता। वहां भी अकेलापन होता।’

‘तुम्हारा मन नहीं हुआ कभी कि मुझसे मिलो?’

‘तुम्हें और कड़वाहट देने का मन नहीं होता।’

‘इतना प्यार करते हो मुझसे?’

‘नफरत तो कभी नहीं की।’

नलिनि फिर खामोश हो गई थी। हाथ में चाय का प्याला पकड़े पेड़ों की तरफ देखती और कुछ सोचती रही। फिर वैसे ही पेड़ों की तरफ देखते हुए बुदबुदाई, ‘सही कहता है अलंकार।...’

‘क्या?’

‘कि तुम मुझसे अब भी प्यार करते हो।’

फिर थोड़ी देर को चुप्पी पसर गई। अंजनी कुमार हाथ में पकड़े कप की डिजाइन पर नजरें टिकाए हुए थे, मानो पहली बार उस कप को देख रहे हों। नलिनी पेड़ों की तरफ देखती रही।... अबकी बार चुप्पी अंजनी कुमार ने तोड़ी- ‘तुम्हारी फ्लाइट कब की है?’

‘कहां के लिए?’

‘... दिल्ली या कहीं और के लिए!’

‘क्यों?’

‘तुम्हें कहीं जाना होगा शायद।... बैग साथ लेकर आई हो।...’

‘मुझे कहीं नहीं जाना। मैं यहीं रहने आई हूं।’

‘....’

फिर चुप्पी छा गई। अब अंजनी कुमार पेड़ों की तरफ देखने लगे थे और नलिनी अंजनी कुमार के चेहरे पर नजरें गड़ाए मुस्करा रही थी। वह उनके जवाब का इंतजार नहीं कर रही थी, उनके चेहरे को पढ़ रही थी। अगर कोई कुछ न भी बोले तो उसका चेहरा उसके भीतर का पता दे देता है। अंजनी कुमार के चेहरे पर भीतर की खुशी, असमंजस और ऊहापोह उभर-उभर आ रही थी। नलिनी ने उन्हें कुछ कहने का दबाव नहीं डाला।

इसी बीच मुन्नन मियां बड़ी-सी ट्रे में खाने-पीने की चीजें ले आए। उनके आने से चुप्पी भंग हुई। मुन्नन मियां ने टेबल से पहले के कप-प्लेट हटा कर कटलेट की प्लेटें लगानी शुरू कर दीं। अंजनी कुमार ने लंबी सांस ली और उनसे कहा- ‘मुन्नन मियां, मुझे कुछ दिन पहले ही दिल का दौरा पड़ा था। अगर फिर से पड़े तो क्या होगा, आप जानते हैं?’

मुन्नन मियां सकपका-से गए। उनका चेहरा गंभीर हो गया। वे प्लेटें लगाते हुए रुक गए। अंजनी कुमार की तरफ देखा- ‘क्या बात करते हैं साहब, खुदा न करे ऐसा हो। ऐसा क्यों कह रहे हैं आप?’

‘मेम साहब अब हमारे साथ रहेंगी।’

‘... अरे वाह। यह तो बहुत खुशी की बात है।... मैं जानता था कि एक न एक दिन मेम साहब लौट आएंगी।...’ मुन्नन मियां के चेहरे पर सचमुच खुशी थी।

‘मतलब, आपको मेरी चिंता नहीं है?’

‘अब मेम साहब आ गई हैं न, आप बिल्कुल ठीक हो जाएंगे साहब।... कोई दौरा-वौरा नहीं पड़ेगा अब। अल्ला आप दोनों को बहुत खुश रखेगा।...’

‘चलिए आप कह रहे हैं तो मान लेता हूं।... तो फिर, मेम साहब का बैग रख दीजिए ऊपर कमरे में और इनसे पूछ लीजिए कि रात को खाने में क्या पकेगा।...’

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