सुधांशु गुप्त की कहानी ‘संत, सत्यवान और सुधीर’

सुधांशु गुप्त

कई कहानियां देश की प्रतिष्ठत पत्रिकाओं और पत्रों में प्रकाशित। अनेक कहानियां रेडियो से प्रसारित हो चुकी हैं। एक कहानी का मंचन श्रीराम सेंटर में हो चुका है। हिन्दी अकादमी और साहित्य कला परिषद द्वारा कहानी लेखन के लिए सम्मानित। ढाई दशक पत्रकारिता में गुजारने के बाद अब दूरदर्शन और रेडियो के लिए लेखन ।

दो कहानी संग्रह ‘खाली कॉफी हाउस’ और ‘उसके साथ चाय का आखिरी कप’ प्रकाशित

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“अब मुझे कोई भी चीज विचलित नहीं करती” सुधीर ने सोचा है। कितना समय हो गया पत्रकारिता करते-करते। जब उसने पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा था तो दुनिया बेहद शांत थी। ना रंगीन टीवी, ना मोबाइल, ना कंप्यूटर, ना इंटरनेट। समय उस दौर में बहुत धीरे धीरे गुजरता था। कुछ इस तरह जैसे कोई प्रेयसी अपने प्रेमी के पास से ना चाहते हुए भी विदा ले रही हो। पत्रकारिता के शुरुआती दौर में एक बार उससे किसी वरिष्ठ पत्रकार ने कहा था, सुधीर तुम अपने आसपास होने वाली घटनाओं को इतनी गंभीरता से क्यों लेते हो, यू आर ए सेंसटिव पर्सन। इतना संवेदनशील होना तुम्हें आगे नहीं बढ़ने देगा। सुधीर को खराब लगा था। उसने सोचा था कि क्या संवेदनशील होना और होने वाली घटनाओं को गंभीरता से लेना अपराध है? क्या पत्रकार को गैर-संवेदनशील होना चाहिए? उस वक्त वह चुप रह गया था, लेकिन वक्त ने उसे समझा दिया था कि वह वरिष्ठ पत्रकार दूरदर्शी थे। उनका दर्शन था कि तटस्थ रहकर ही आप ग्रो कर सकते हैं, लेकिन वह चीजों से, घटनाओं से, लोगों से और अपने आसपास होने वाले किसी भी अपराध से खुद को तटस्थ नहीं रख पाया। ग्रो नहीं कर पाया। और अब वक्त बदल चुका है।

सुधीर सोच रहा है। सुधीर देख रहा है-लोगों को ग्रो करते, लोगों को तटस्थ होते। उसे आज भी याद है कि पहले किसी बड़े हादसे के बाद वह कई रोज तक खाना नहीं खा पाता था। 1984 के दंगों के जख्म उसकी चेतना से आज तक नहीं धुल पाये हैं। किस तरह लोगों को जिंदा जलाया गया था और वह केवल एक दर्शक की तरह बस, के¢वल देखता रहा था। उसे पहली बार अपने पत्रकार होने पर दुख हुआ था। किस तरह एक युवा नेता ने अपनी ही पत्नी को तंदूर में जला दिया था। ऐसी ही ना जाने कितनी घटनाएं उसके अवचेतन में तैर रही हैं। फिर उपहार हादसे ने तो उसे बुरी तरह झकझोर दिया था। अखबार में बैठा वह केवल यही देखता रहता था कि किस तरह लोगों के मरने में भी पत्रकार अपने लिए पहले “स्टोरी” तलाश करता है और फिर उसमें एंगल ढूंढ़ लेता है। इसके बाद तो ना जाने कितनी ही घटनाएं रोज होने लगीं और धीरे-धीरे उसके ऊपर भी इस तरह की घटनाओं का असर होना कम हो गया। उसे लगने लगा कि अब वह भी चीजों से तटस्थ रह सकता है। अब वह भी पहले की तरह संवेदनशील नहीं रह गया है। वह रोज सोचता है कि कोई ऐसी घटना घटे, जो उसकी सोई हुई चेतना को फिर से जागृत कर दे। लेकिन भूकंप, तूफान और मासूम लड़कियों से बलात्कार या निर्भया जैसी घटनाएं भी उसके भीतर की मजबूती को हिला नहीं पाते। वह सोच रहा है कि ऐसा क्यों हो रहा है।  वह चाहता है कि कोई ऐसी घटना घटे, जिससे वह पहले जैसा हो जाए, उसी तरह संवेदनशील, चीजों को गंभीरता से लेने वाला। लेकिन कोई भी घटना उस पर असर नहीं डाल पा रही है।

वह अखबार में भी रोज ऐसी ही किसी घटना को तलाशता है। लेकिन अखबार की खबरें इतनी रूटीन होती जा रही हैं कि कोई भी खबर आपको झकझोरती नहीं। बड़े नेताओं या फिल्म अभिनेताओं का जेल पहुंचना… साठ साल की उम्र से लेकर छह माह तक की लड़कियों से बलात्कार… कॉमनवेल्थ घोटाला, कोयला घोटाला या 2 जी स्पेट्रम घोटालों में भी उसे कुछ नया दिखाई नहीं पड़ता। वह सोच रहा है कि ये उसे क्या होता जा रहा है? क्या वह बीमार हो गया है?

उस दिन भी वह रोज ही की तरह अखबार पढ़ रहा था-बेमन से। अचानक उसकी नजर एक खबर पर गयी-संत साशाराम को न्यायिक हिरासत में भेजा गया। जाहिर है खबर पहले से चल रही थी। सुधीर ने पुराने अखबार निकालकर पढ़े तो पाया कि किसी लड़की ने साशाराम पर बलात्कार का आरोप लगाया है। साशाराम….साशाराम….उसक¢ सामने एक श्वेत वस्त्रधारी बूढ़े की कुछ दुर्लभ तस्वीरें घूम गयीं। कभी यह बूढ़ा लोगों को ज्ञान की बातें समझाता दिखाई दिया तो..कभी जीवन दर्शन। मंच पर इस बूढ़े का अश्लील नृत्य अ©र बॉडी लेंग्वेज देखकर कोई भी आदमी आसानी से इस व्यक्ति क¢ चरित्र को समझ सकता है। लेकिन यह सब समझने के बजाय उसके सामने हजारों की तादाद में बैठे दर्शक-जिनमें अधिकांश महिलाएं हैं, अपने दोनों हाथ ऊपर उठा कर इस तरह भक्ति में लीन दिखाई पड़ रहे हैं- जैसे ईश्वर साक्षात उनके सामने बैठा हो। इंटरेस्टिंग…दिलचस्ब खबर है! एक 72 साल के तथाकथित संत पर एक किशोरी ने बलात्कार का आरोप लगाया है। उसने खोजा तो पाया कि इसी संत पर पहले भी इसी तरह के¢ कई गंभीर आरोप लग चुके हैं। सुधीर ने सोचा कि अगर भारत में सिर्फ प्रिंट मीडिया ही होता तो यह खबर इतनी ऊंचाई तक ना जाती। उसने चैनल्स देखने शुरू किये। उसे अपनी दिलचस्पी का एक चैनल मिल गया। इस चैनल ने अपनी खबरों से (बेशक इनमें थोड़ी बहुत सनसनी भी थी) संत साशाराम का हजारों करोड़ रुपये का साम्राज्य छिन्न भिन्न कर दिया। कम से कम चैनल देख कर तो यही लगता रहा। सुधीर लगातार इस चैनल को देखता रहा। साशाराम की गुप्त कुटिया है, जहां वह कृष्ण बनकर गोपियों से रास रचाता है….वह तमाम शक्तिवद्धर्क दवाइयां खाता है, अपनी आंखों को जीवंत और सम्मोहक बनाए रखने क¢ लिए वह चमगादड़ का सुरमा लगाता है…दिन में पच्चीस बार आईना देखता है…वह मर्दानगी की और लोगों को नामर्द बनाने की दवाइयां बेचता है। उसकी रासलीला के लिए जो जगहें निर्मित की गयी हैं वे किसी आलीशान होटल से कम नहीं हैं। यह व्यक्ति स्वयं को कृष्ण और जिन लड़कियों के¢ साथ वह सहवास करता है, उन्हें गोपियां बताता है। चैनल ने साशाराम को पूरी तरह एक्सपोज करने का एक अभियान छेड़ रखा है। इस अभियान में अब बहुत से लोग जुड़ते जा रहे हैं। साशाराम के देश भर में फैले आश्रमों में सेवादार रहे लोग, उनकी सचिव और वे तमाम लड़कियां जो कभी ना कभी साशाराम के यौन शोषण का शिकार हुईं। संभवतः चैनल की ही बदौलत तमाम लड़कियां सामने आने का साहस कर पा रही हैं। इस पूरे अभियान के संचालक के रूप में एक वरिष्ठ पत्रकार सत्यवान को देखकर सुधीर को बहुत अच्छा लगा। उसे अच्छा लगा कि अब भी कुछ लोग ऐसे हैं, जो निस्वार्थ भाव से एक पाखंडपूर्ण व्यक्ति का पर्दाफाश कर रहे हैं। इस अभियान की अगली कड़ी के रूप में साशाराम के बेटे, पत्नी और बेटी पर भी तमाम तरह के आरोप लगने शुरू हो गये हैं। सत्यावन ने ही यह जानकारी दी है कि बलात्कार करने के मामले में साशाराम का बेटा भी पीछे नहीं है। यह भी बताया गया कि कई बार तो साशाराम की बेटी ही लड़कियों को अपने पिता क¢ रासलीला कक्ष तक पहुंचाती थी…साशाराम प्रवचन के दौरान ही इशारों से लड़कियों का चयन करते थे। सुधीर को यह पूरी प्रक्रिया काफी रोमांचक लगी। पहले लड़की पर टॉर्च मार कर उसे पहचानना और फिर उसे बड़े-बड़े सपने दिखा कर साशाराम की हवस का शिकार बनने के लिए भेजना। लड़कियों को उसके कक्ष तक पहुंचाने काम उसके सहयोगी किया करते थे। चैनल ने ही उसे यह भी जानकारी दी कि साशाराम लड़कियों को सम्मोहित करके¢ पहले उनके¢ कपड़े उतरवाता था और फिर उनके¢ साथ सहवास किया करता था। चैनल पर लड़कियों ने स्वयं स्वीकार किया कि उसके¢ सम्मोहन के¢ सामने वे सब कुछ करने को बाध्य हो जाती थीं।

अपराध का इस तरह का सामूहिकीकरण पहले कभी नहीं देखा गया। सुधीर सोच रहा है। उसे यह खबर अच्छी लगने लगी है। उसकी सोच से जुड़ी सभी इंद्रिया सतर्क हो गयी हैं। वह सोच रहा है, लगातार सोच रहा है। काफी लंबे समय बाद उसे एक ऐसी खबर दिखाई दी है, जो उसे सोचने पर मजबूर कर दे। वह दिन रात साशाराम के ही बारे में सोच रहा है। सत्यवान के¢ बारे में सोच रहा है। उसे पत्रकारिता के अपने शुरुआती दिनों की याद आ रही है। चैनल पर दिखाई गयीं साशाराम से जुड़ी खबरें उसके अवचेतन को खंगाल रही हैं। अचानक उसके¢ अवचेतन में कुछ धुंधली सी तस्वीरें उभरती हैं। एक बेहद युवा और दबंग पत्रकार तेजी से पत्रकारिता की सीढ़ियां लांघता चला जा रहा है…राजनेता भी उसे पत्रकारिता के¢ भविष्य के¢ रूप में देख रहे हैं…अनेक महत्वाकांक्षी लड़कियां इस पत्रकार के¢ चक्कर लगाने लगी हैं। एक दिन एक बेहद खूबसूरत लड़की…जिसकी उम्र कोई बीस बाइस साल होगी…इस पत्रकार के¢ घर आती है। कई दोस्तों क¢ साथ शराबों का दौर चलता है। इसके बाद उस पत्रकार को लड़की के¢ साथ सहवास का निमंत्रण मिलता है। लेकिन वह पत्रकार यह निमंत्रण ठुकरा देता है। उसकी मांग दूसरी है। वह लड़की से कहता है कि वह नग्न अवस्था में कमरे के दो चार चक्कर लगाए। लड़की ऐसा ही करती है। सामूहिक अपराध! कुछ सालों बाद वह लड़की भी बड़ी पत्रकारों में गिनी जाने लगती है। ऐसी ही ना जाने कितनी तस्वीरें उसक¢ जेहन में कौंध रही हैं।

वह साशाराम के जाल में लगातार फंसता जा रहा है। एक तरफ सत्यवान साशाराम के बारे में बड़े-बड़े खुलासे कर रहे हैं तो दूसरी तरफ हिंदू धर्म के तमाम विद्वान और वरिष्ठ पत्रकार उसके पैनल पर डिस्कशन में शामिल हो रहे हैं। इस पूरे डिस्कशन में सत्यवान ही धुरी बना हुआ है। वह किसी भी व्यक्ति के¢ मुंह से साशाराम के¢ पक्ष में कोई बात सुनने के¢ लिए तैयार नहीं है। एक वरिष्ठ पत्रकार ने जब साशाराम के¢ पक्ष में कुछ तर्क दिये तो सत्यवान ने उन्हें साशाराम का प्रवक्ता तक कह डाला। इस चैनल पर साशाराम के¢ पक्ष में कुछ भी सुनने के लिए सत्यवान तैयार नहीं हो रहा। ऐसा लग रहा है कि वह साशाराम का सारा साम्राज्य धूल धुसरित करने के¢ लिए बजिद है। एक पैनल में बैठे एक आचार्य ने जब सत्यवान की तीखे शब्दों में आलोचना करते हुए कहा, सत्यवान जी जब साशाराम जैसे लोग गलत सलत तरीकों से धनोपार्जन कर रहे थे, तब आप कहां थे, तब आपने साशाराम के¢ खिलाफ कोई मुहिम क्यों नहीं चलाई? इस पर सत्यवान ने एकदम ठंडे लहजे में कहा, आचार्य जी, आप मुझे पत्रकारिता के¢ धर्म-कर्म मत सिखाइये…आपका कच्चा चिट्ठा भी मेरे पास है, कहिए तो दिखाऊं, क्या आप देख पाएंगे?

सुधीर को इस सारी बहस ने बेहद उलझा दिया है। वह सत्यवान से कई सवाल पूछना चाहता है। वह पूछना चाहता है कि जब साशाराम जैसे बाबाओं के¢ प्रवचन चैनल दिखाता है तो क्या वह इन बाबाओं को महान बनाने की प्रक्रिया में भागीदार नहीं होता, जब चैनल इनके विज्ञापनों को दिखाकर करोड़ों रुपए की कमाई करते हैं, तब ये बाबा गलत नहीं होते, जब मीडिया इनसे जुड़ी छोटी-छोटी खबरों को भी प्रमुखता से छापता और दिखाता है तो क्या वह इन्हें नायक के रूप में पेश नहीं कर रहा होता। ऐसा कैसे संभव होता है कि एक अदना-सा अनपढ़ आदमी इतने विशाल और ताकतवर मीडिया के सामने अनैतिकता का इतना बड़ा साम्राज्य स्थापित कर लेता है, क्या मीडिया में बैठे लोगों के कच्चे चिट्ठे किसी के¢ पास नहीं हो सकते, होंगे। कैसे पांच हजार रुपये की तनख्वाह पर पत्रकारिता की शुरुआत करने वाला करोड़ों रुपए का मालिक बन जाता है, बहुत सारे सवाल सुधीर के जेहन में आ रहे हैं। ये सवाल उसे लगातार परेशान करने लगे हैं। अब तो उसे चैनल पर भी संदेह होने लगा है।

फिर भी सुधीर खुश है। एक लंबे अरसे बाद उसे एक ऐसी खबर मिली है, जो उसे परेशान कर पाने में सफल रही है। उसे विचलित करने में सफल रही है। अपने किसी संपर्क की मदद से उसने भी इस डिस्कशन में शिरकत करने का फैसला कर लिया है। कल उसे सत्यवान के¢ पैनल में शामिल होना है। वह बहुत खुश है। इस खुशी की वजह से ही उसे नींद नहीं आ रही है। वह लेटा है। करवटें बदल रहा है। कभी उसकी आंखें बंद हो रही हैं, कभी खुल रही हैं। लेकिन नींद उसे नहीं आ रही है। उसकी आंखों के¢ सामने साशाराम…सत्यवान और कई संत घूम रहे हैं। वह इन सबसे बचने के¢ लिए अपनी आंखें कस कर बंद कर लेता है।

उसकी आंख खुलती है। वह देखता है सारे कैमरे ऑन हो गये हैं। सत्यवान अपनी कुर्सी पर विराजमान है और पैनल में कई और लोग भी शामिल हैं। इस लाइव कार्यक्रम में अब लोग उसे देख सकते हैं, सुन सकते हैं। वह अपनी बात कह सकता है। दूसरे संतों के¢ साथ बैठकर वह भी सत्यवान से सवाल पूछ सकता है। तभी अचानक सत्यवान ने बड़े ठंडे लहजे में कहा, सुधीर जी आप लंबे समय से पत्रकारिता कर रहे हैं, कोई भी सवाल पूछने से पहले यह याद रखना कि आपका कच्चा चिट्ठा भी मेरे पास है, जिसे मैं किसी भी वक्त लाइव टेलीकास्ट कर सकता हूं। सुधीर के¢ पूरे शरीर में एक सिहरन सी दौड़ गयी है। वह कुछ पूछे इससे पहले ही सारी लाइटें बुझ गयीं।

 शायद लाइट आ गयी है।

सुबह हो गयी है। सुधीर बहुत डरा हुआ है। उसका कच्चा चिट्ठा सत्यवान के¢ पास कैसे हो सकता है, क्या है उसका कच्चा चिट्ठा। उसने कभी किसी से एक पैसे की रिश्वत नहीं ली, कभी अपनी पोजिशन का जायज-नाजायज फायदा नहीं उठाया। जितना संभव हुआ लोगों की मदद की। फिर कौन-सा चिट्ठा सत्यवान के¢ पास है। सुधीर ने पल भर में ही अपने पूरे पत्रकारिता जीवन को खंगाल डाला है। बहुत खोजने पर भी उसे कुछ दिखाई नहीं दिया। फिर अचानक उसे याद आया कि कई लड़कियों से उसके¢ भी रिश्ते रहे हैं। वह देर रात तक उन्हें एसएमएस और फोन किया करता था। क्या इसकी सारी सूचनाएं भी सत्यवान के¢ पास पहुंच गयी है। क्या सबका कच्चा चिट्ठा सत्यवान क¢ पास है। धीरे-धीरे सुधीर का डर बढ़ने लगा है। उसे लगने लगा है कि किसी भी वक्त सत्यवान पुलिस लेकर उसके घर पर पहुंचने ही वाला होगा। उसका पूरा चिट्ठा चैनल पर लाइव दिखाया जाएगा….वह भी साशाराम की तरह बदनाम हो जाएगा। अचानक उसने महसूस किया कि कमरे में अंधेरा बढ़ता जा रहा है। बहुत से हाथ उसकी ओर बढ़ रहे हैं….उसने अपने गालों पर हाथ फेरा तो उसे महसूस हुआ कि उसकी भी लंबी दाढ़ी निकल आई है। उसने अपने वस्त्रों की ओर देखा…वे भी पूरी तरह सफेद हैं। वह अपने बिस्तरे पर लेट गया है अ©र उसने चद्दर को सिर के ऊपर खींच लिया है। अब वह कुछ देखना सुनना नहीं चाहता। वह नहीं चाहता कि कोई भी खबर उसे विचलित कर दे। लेकिन अगर सत्यवान के पास उसका कोई कच्चा चिट्ठा नहीं है तब भी वह इस सामूहिक अपराध से मुक्त कैसे हो सकता है?

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