सुशील कुमार की पांच कविताएं

1.

हृदय में न जाने
कितनी कविता
जन्मते ही मर गई !

कभी कंठ फूटा नहीं
अफ़सोस,  हर बार वह अजन्मा ही रही ●

2.

एक शून्य से बड़ा नहीं है ब्रह्मांड
न एक बूंद से अधिक महासागर

एक न एक दिन यौगिक टूटकर
तत्व में विलीन हो जाता है
फिर भी जब तक रूप है ,
यौवन है , ऋतु और श्रृंगार है धरती पर
– जिंदगी एक लौ की तरह जलती है
थरथराती और भभकती है
फिर बुझ जाती है ●

3.

कविता क्या है
इच्छा की आग में दमकता सोना ?
पेट की आग में जलते सपने ?
या संभावना और सच के तनाव से
जन्मा जीवन का कोई राग ? ●

4.

पंछी भाग रहे
रोज़ समूहों में
किसी अनागत भय से
गगनचुंबी मोबाइल – टावरों की
तरंगों से टकराकर

हाईवे के दोनों बगल
कटते दरख्त
उजड़ते घोंसले . .
पंछी विलुप्त हो रहे
अक्सर मरे हुए पंछियों के शव
देखता हूँ यत्र – तत्र –
पार्को – उद्यानों में

कहाँ सुनता हूँ गोधूलि में अब
चिड़ियों की चहचहाहट
एक- दो दिखते भी हैं तो
बिजली की तार पर
बिन दाना – पानी के मुँह खोले
चिचियाते

कैसे बहलाउँ बच्चों का दिल
कि किन मैनों – गौरैयाओं – तोतों की
कहानी सुनाऊँ उसे
देखा नहीँ जनम से जिन्हें अब तक

कौवे – चुनमुन भी
कहाँ उतरते आँगन में
दाना टूंगने ?

न जाने कौन देस
किस वन – नदी
किस घर – आँगन – गाँव – बहियार
की तलाश में
पलायन कर रहे
पंछी टोलियों में ! ●

5.

नदी को देखो

उथले कछार को देखो
वक्ष पर रेत के ढूहों में देखो –
उमस में बालू ढोती पहाड़न का
स्वेद लिप्त चेहरा और जलते तलुवे,
किनारे जल बिन हांफ़ते पंछियों की
चीख भी सुनो

इतनी उदास नदी
इतनी मंद उसकी धार

और महसूसों रेत भरी नदी में
दुःख की तेज धार ●

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