सुशील कुमार की पांच कविताएं

एक

जितने दृश्य दर्पण ने रचे थे
वे सब उनके टूटने से बिखर गए
रेत पर लिखी कविताएँ
लहरें अपने साथ नदी बीच ले गई
अब जो रचूँगा, सहेजकर रखूँगा
हृदय के कागज पर अकथ लिखूंगा l ●

दो

एक रीते समय में
न सुख न दुःख
न चाह
न कोई राह
चिंता – दुश्चिंता से भी दूर –
मगर नीरव शान्ति तो घेरती है मुझे

अंदर से
तब लगता है कि
कुछ न करना भी एक करना होता है

तीन

हमेशा ऐतबार है तुम्हारे प्यार पर
कि शांति के फूल खिलते ही रहेंगे इस मरु में,
कि अविरल प्रेम – धार भी बहती रहेगी
बाधाओं को रेत बनाती हुई
कि देह के काठ होने तक
भरपूर जीता रहूंगा श्वांस – झूले में
जिसमें जीवन जागता -पुलकता
तुम्हारे स्नेह – वर्षा में भीगता रहेगा

काश, यह दुनिया भी
तुम्हारे अनाम प्यार की तरह होती ! ●

चार

टायरों की जली काली मिट्टी से सना
मोबिल में लिपटा काला लड़का
जब हँसता है तो
पूरी दुनिया
उसकी सफेद दूधिया दाँतों में फँस जाती है l

रात है गहरी –
छोटी सी दुनिया में मस्त ये छोरे
गैराज में छितरा रहे इधर-उधर –
पसर रहे गमछे बिछा
अपने बटुए टटोलते
पेट में पैर डाल
आधी नींद में
अगले बस कार ट्रक की प्रतीक्षा में

सपनों में भागते

सुख का पीछा करती
रोज़ कितनी ही जोख़िम भरी रातें
यूँ ही कट रही गैराज में
टायरों स्क्रू पेंचकश डीजल मोबिल के साथ
सोते-जागते खाँसते-कुहरते
बीमारियों से लड़ते
मौत के साये में जैसे-तैसे पलते-बढ़ते।

पांच

आओ वक्त की खुली खिड़की से
स्वयं की ओर
एक छलाँग लगाएँ

अपने होने और न होने के बीच
थोड़ी देर दिमाग़ की शातिर नसों से बचकर
लोथ-लुंठित दुनिया के रचाव से बेहद दूर
हृदय की अटूट नीरवता में कहीँ बिछ जाएँ

इस अन्तर्यात्रा में
हम जी उठें दोबारा
उतने ही तरंगायित और भावप्रवण होकर
जितने माँ की कोख से जन्मे थे

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1 Response

  1. बेहद सुन्दर कविताएँ। ये जीवन-राग से ओतप्रोत हैं। ऐसी कविताएँ कम ही देखने को मिलती हैं। बहुत ही सुकून का अहसास करातीं कविताएँ। सुशील कुमार जी को बधाई। आपको भी श्रेष्ठ कविताओं के प्रकाशन के लिए।

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