सुशील कुमार की दस कविताएं

सुशील कुमार

1.

कबसे जगा हूँ

जब से जगा हूँ
तब से सोया हूँ

कब से सोया हूँ
तब से कि
जब से जगा हूँ ●

2.

कोई न कोई तार जीवन का
कोई न कोई राग वीणा का
छूट ही जाता है

रचता हूँ
जब भी कोई जीवन-गीत,
कहीं न कहीं लय उसका
टूट ही जाता है

3.

जल गया रावण
हर गली मुहल्ले में
हा हा हा

रामनवमी का लाल ध्वज

लहरा रहा हर घर के कंगूरे पर

(चन्दन-तिलक और पूजा-पाठ ?)
कहती है सरकार, होगा रामराज
हर गली मुहल्ले में
– हे हे हे ●

4.

कितना बेघर हूँ अपने ही घर में
न जगह अपनी
न भाषा अपनी

न चहक न ललक
न बाँटता कोई दुःख अपना

न सुख

न शब्द

न सपने

घर की नींव रखी तो पुरखों ने
पर दीवार और रंग, और हिज़ाब
रच दिए न जाने किस-किस ने

5.

जो धरती रचेगा
कविता में
सूर्य उसी का
चमकेगा

जब तक धरती
बची है कविता में
तब तक कविता
बची है धरती पर

6.

बहुत दूर तलक चलना होता है
किसी का साथ लेने के लिए

प्रतीक्षा में फूल खिलकर बिखर जाते हैं
पत्थरों पर निशान पड़ जाते है

फूल तो खिलेंगे
पत्थर पर निशाँ भी फिर पड़ेंगे
पर जो बिखर जाएंगे

फिर नहीं खिलेंगे
निशां भी उसकी नहीं होगी ●

7.

लौटूँ फिर

शाख से गिरा हुआ एक सूखा पत्ता हूँ
जब तक जुड़ा था,
धरती ने सींचा
सूर्य ने हरा रखा
ऋतु ने प्यार किया
पंछी ने घोंसले बनाए
पथिक ने छाँव ली
हवा ने अठखेलियाँ की
मेघ ने नहलाया मुझे

यौवन था मस्ती थी भरपूर
यूँ समझो..
सरसराहट-सा बजता था
जीवन-संगीत मेरी नस-नस में

【२】

पर अपने प्रारब्ध पर किंचित-मात्र भी
दुःख नहीं मुझे
बस, एक इच्छा से भरा हूँ मैं
कि मिट्टी में गर्त हो
लौटूँ फिर टहनी पर वापस
नए रूप में
उजड़ते जंगल की हरियाली बनकर ●

8.

प्रकृति ने रचा अप्रतिम दृश्य
निहार रहा था जिसे एकटक
दृष्टिकोण नहीं रचा था
– असल में वे मेरे न सपने थे न सच थे

फिर भी दृश्य में
मोहित करने वाली सुन्दरतम छटाएँ थीं
जिसे माया ने जना था

क्या प्रकृति ही मेरे दु:ख का कारण है

अथवा वह दृष्टिकोण –
जिसे मन ने रच दिया ? ●

9.

गुरुत्वाकर्षण की शक्ति पर
टीका है समूचा ब्रह्माण्ड
सारी आकाशगंगाएँ ,
ग्रह-नक्षत्र तारे सूर्य सब

जिस गति से घूमता है समय
उसी गति से घूम रहा
कण-कण रचना का
आकर्षण में आबद्ध होकर

कोई नक्षत्र
कोई तारा
कोई उल्कापिंड टूटता है जब
आकर्षण के नियम से विचलित होकर,
जलकर धूल बन जाता है,
विलीन हो जाता है निर्वात में

हमारी धरती भी
यानी, पूरी मनुष्यता ही टिकी है
उसी आकर्षण के वशीभूत
जिसे आप प्रेम कहते हैं ●

10.

हम से शुरू
हमीं पे खतम
स्वाँस का झूला
जिंदगी की डोर पर
झूलता निरंतर

इस डगर चलते
लगा कि
हमने इसे जिया नहीं

इसमें रंग था जिसे देखा नहीं
खुशबू थी जिसे सूंघा नहीं
लय था ताल था, ज्योत्स्ना थी, उमंग था –
जिसे कभी महसूसा नहीं
एक नाच था जिस पर थिरका नहीं
नाद था जिसे सूना नहीं

आईस-पाईस का खेल खेलते
धोखे में हार गए
अपनी खूबसूरत जिंदगी। ●

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