लड़की : सुशील कुमार की पांच कविताएं

एक

लड़की के रूप की

रजनीगंघा खिली है अभी-अभी

उमंग जगी है उसमें अभी-अभी

जीवन का रंग चटका है वहाँ अभी–अभी

 

जरूर उसका मकरंद पुरखों के संस्कार

माँ की ममता, पिता के साहस

भाई के पसीने और दादी-नानी के दुलार से बना होगा

 

देखो, कितना टटका दिख रहा वह फूल !

मधुमक्खियों और भ्रमरों तक को

इसकी देह-गंध का पता चल चुका है

घर-आँगन महमहा उठा है उसकी सुवास से

और वसंत अब उसे घेरने की तैयारी में है |

 

दो

लड़की अपने साथ वसंत लाती है

लड़की अपने ख्यालों में वसंत बुनती है

लड़की अपने माँ-पिता की नींद चुराती है

लड़की एक दिन घर का काजल, प्यार

और वसंत लेकर पराये घर चली जाती है |

 

तीन

लड़की धीरे-धीरे पूर्ण स्त्री बन जाती है

और पूरी तितिक्षा से अपना एक घर बनाती है

उस घर में उसके सपने पलते हैं

और रजनीगंधा उसके चेहरे से उतरकर

उसके आँगन में खिलने लगती है

उसके होने मात्र से घर भरा-पूरा लगता है |

 

चार

लड़की सबसे सुंदर तब दिखती है

जब वह प्रेम में होती है

प्रेम में ही वह अपना संसार रचती है

क्योंकि लड़की को मालूम है

प्रेम का मर्म और सृष्टि का रहस्य

 

लड़की माया रचती है प्रेम में

फिर योगमाया तक उसका विस्तार करती है |

 

पाँच

काम-रूप-यौवन बिहरने लगते हैं

लड़की से धीरे-धीरे

फिर भी लड़की बचाए रखती है

अपने सीने में अथाह प्रेम

जो थामे रहता है उसके घर को मजबूती से

और उसे आंधी-बतास से बचाता है

 

लड़की पककर झड़ने लगती है

अपने आँगन में तुलसी के फूल की तरह

जिसके बीज से फिर

जनमने लगती है नई पौध

 

लड़की अपनी योगमाया से

वैष्णवी-सी बन जाती है

माया का पुन: विस्तार करती है

और जीवनोत्सव में मगन हो जाती है |

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