सुषमा सिन्हा की तीन कविताएं

सुषमा सिन्हा

एहसास

किसी के होने का एहसास
बचा रहता है वर्षों तक
जबकि गुजरे उसके
बीत चुका होता है बहुत सारा समय

किसी का वजूद
खड़ा रहता है दीवारों-सा
जबकि उसका अस्तित्व ही
नहीं होता है इस दुनिया में

कोई आवाज
करती है पीछा ताउम्र
जबकि उस आवाज की
नहीं बची होती है कोई वजह

कुछ गंधों के एहसास
बचे रहते हैं इस कदर
कि याद आ जाते हैं
कुछ खास लोग, कुछ खास वक्त,
कुछ खास दिन, कुछ खास मौसम

अचानक कभी कुछ घटता है इस तरह
कि लगता है घटा है
पहले भी ऐसा कुछ
गुजरा है ऐसा ही कोई पल पहले भी

ऐसी ही और भी ढेर सारी चीजें
रहती हैं हमारे साथ, हमारे पास
जो कराती हैं एहसास खुद की
कि हम भी रहे थे कभी
इस दुनिया का एक हिस्सा

कोई खंडहर, कोई किला, कोई मकबरा
या कहीं भी हो कोई पुरानी जगह
वह बेजुबान नहीं होती
कहती है कहानियाँ खुद ही खुद की

खाली होने के बावजूद
खाली नहीं होतीं ऐसी जगहें
रहती हैं उनमें यादें, आवाजें, महक
और ढेर सारे एहसास।।

तुम्हारा सपना

कल रात
फिर तुम्हें सपने में देखा
और दिन भर मैं ख्वाब बुनती रही

तुम दिखे मुझे
बरामदे में बैठे
बाजार में घूमते, छत पर टहलते
मैदान में खेलते, दोस्तों से बातें करते
इसी तरह तुम मुझे कई जगह दिखे
हर जगह से मैंने देखा
तुम मुझे ही देख रहे थे
दिन भर मैंने तुम्हें जगह-जगह ढूँढा

मैंने देखा
हमेशा की तरह तुम्हारी नजर
मुझसे कुछ पूछ रही थी
मुझमें कुछ ढूँढ़ रही थी
दिन भर मैं खामोश नजरें चुराती रही
खुद से खुद को छुपाती रही

फिर मैंने देखा
अचानक तुम
लोगों की भीड़ से निकलकर
मेरे सामने आए,
और बड़ी संजीदगी से कहा-
‘‘मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हंूँ।’’

दिन भर मैं बहुत उदास रही।।

घर लौटने का सुख

हमने ही तो चाहा था जाना घर से दूर
ताकि बचा रहे घर लौटने का सुख
आज बहुत दिनों के बाद
लौटी हूंँ अपने घर
एक सुकून के साथ

दरवाजे ने हंँस कर मेरा स्वागत किया
खिड़कियों ने खुलते-खुलते
आखिर पूछ ही लिया
उस दुनिया के बारे में
जो खिड़की से दिखती ही नहीं
रोशनदानों ने हुलस कर कहा-
‘हमने बचा कर रखी है
तुम्हारे लिए उम्मीद की कई किरणें’
तन्हाइयों ने मुस्कुरा कर देखा है मुझे
और गले लग कर रोई बहुत
बहुत दिनों के बाद

घर के कमरें, दीवारें, छत, बालकनी,
खामोश हसरत भरी नजरों से देख रहे हैं
मेरे छूते ही सिसकियों की आवाज
तेज हो आई है
देखा कि जख्म अब भी हरे हैं
और दर्द आज भी
हर जगह बिखरा पड़ा है
हिम्मत कर के फिर से
समेटने लगी हूँ उन्हें
कि हरकत हुई है घर में
घर जो खत्म हो रहा था
मैंने उसे बचाना चाहा बहुत दिनों के बाद।।

You may also like...

5 Responses

  1. vimmi malhotra says:

    Bahut hi umda….

  2. saikat says:

    susma maim ap hamesha shandar hai aur apki rachnaye bhi aphi ki tarah shnadar hai . tino kabitaye dil ki gahrai tak utar gaya , age aur bhi ummid hai ……. badhai

  3. Sneha Parul says:

    Heart touching as always 🙂

  4. bipin bihari prasad Gupta says:

    Sushmaji ki kabitaye achhi lagi. Unhe sahitya sewa karte dekh prasannta hoti hai.Mai unko sahityasrijan me aur uchaii tak pahuchne ki kamna karta hu.
    bbpgupta. jcct. appeal. Ranchi div

Leave a Reply