सुषमा सिन्हा की दो कविताएं

रखवाला

तुम्हारी याद
परती जमीन पर
गाड़ा हुआ हो जैसे एक डंडा
बताता हुआ मुझे-
‘यह जीवन है तुम्हारा
खुद अपनी इच्छाओं के अनुसार
जीने का अधिकार है तुम्हारा
हंसने, बोलने, गाने की
स्वतंत्रता है तुम्हारी
धूप, हवा, पानी का
अधिकार है तुम्हारा’
अनवरत समझाता-बुझाता
उस डंडे पर दिखने लगता है
एक डंडा और आड़ा बंधा हुआ
जैसे हों दो हाथ तुम्हारे
बताते हुए मुझे-
‘यह प्रकृति है तुम्हारी भी
और हैं दो हाथ तुम्हारे
समेट लो इसके हर रंग को
और सजा लो सपने सारे’
कुछ ही देर में देखती हूं
डंडे को पहना दिए गए हैं
रंग-बिरंगे कपड़े
किसी आदमी की तरह
परती जमीन हो गई है
लहलहाती हुई फसल
और टोपी लगाए वह डंडा
दिखने लगता है
बिलकुल तुम्हारी तरह
एक रखवाले की तरह।।

बहुत दिनों के बाद

बहुत दिनों से मालूम नहीं है मुझे मेरा पता
बहुत दिनों से ढूँढ़ा भी नहीं किसी ने मुझे
पूछा भी नहीं मुझसे मेरे बारे में
खोई हुई-सी, अनजान राहों पर चलते हुए
जिंदा होने के पूरे एहसास के साथ
बातें करना चाहती हूँ आज
खुद से खुद के बारे में
बहुत दिनों के बाद
बहुत दिनों से घूमी नहीं
रास्तों पर बिना मतलब
बातें नहीं कीं किसी से अपने मन की
बहुत दिनों से देखा नहीं
चाँद को चलते हुए
सुना नहीं आवाज समुंदर की
समुंदर-सी आवाज के साथ बातें करते हुए
चलना चाहती हूँ आज
फिर चाँद के साथ
बहुत दिनों के बाद
बहुत दिनों से भींगी नहीं
बारिश के पानी में
बहुत दिनों से बैठी भी नहीं कहीं चैन से
बहुत दिनों से सुना नहीं
बंद आँखों से
आ रही अजान की आवाज और शबद गान
मंदिर की सीढ़ियों पर बैठ सुकून से
भीगना चाहती हूँ आज
घंटियों की आवाज के साथ
बहुत दिनों के बाद।।

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1 Response

  1. रतीनाथ योगेश्वर says:

    मर्मस्पर्शी कविताएँ

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