सुषमा सिन्हा की चार लघुकथाएं

1. बेटा

स्थानांतरण के फलस्वरूप कार्यालय में आये नये साहब ने अनुकम्पा पर नियुक्ति पाये एक क्लर्क से पूछा- ‘क्या बात है? तुम बार-बार छुट्टी क्यों लेते रहते हो?’
कलर्क ने उत्तर दिया- ‘क्या करें साहेब, माँ बहुते बीमार रहती है। उसका देखभाल करना पड़ता है न। उसको दस हजार रुपिया पेंशन मिलता है साहेब।’

2. माँ

सकुचाते हुए वह सामने आकर बैठी। मैंने उसे प्रश्न भरी नजरों से देखा तो उसने बताया कि पिछले महीने उसका 20 वर्ष का बेटा नहीं रहा। मैंने अफ़सोस जताया और उसे अपना काम बताने को कहा पर वह अपने बेटे के बारे में बताने लगी- ‘मैडम मेरा बेटा बहुत बहादुर था। वह 9 वर्ष से हॉस्पिटल में था।’
मैं चौंकी और फिर उसकी बातें ध्यान से सुनने लगी। वह बताती जा रही थी- ‘वह बोलने-सुनने में असमर्थ था मैडम पर मुझे और मेरी माँ को देख कर उसकी आँखे चमकने लगती थीं। हर सुबह मैं माँ को उसके पास छोड़ कर अपने काम पर जाती थी और फिर शाम को माँ को ले कर घर वापस। पास जाने पर सिर हिला-हिला कर वह हम पर प्यार जताता था। हॉस्पिटल के नर्स एवं कर्मचारियों से भी उसकी खूब दोस्ती थी।’
उसकी आँखें भीग आईं और मैं निःशब्द होती गई। अचानक उसने अपना मोबाइल मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा- ‘देखिए न मैडम, देखिए मेरे बेटे का फ़ोटो।’

फ़ोटो देखते ही मेरी अन्तर्रात्मा तक काँप गई। एक बिलकुल किकुड़ा हुआ सा इंसान जिसकी आँखे धँसी हुई, गाल धँसा हुआ, पूरा शरीर टेढ़ा-मेढ़ा एक साफ-सफ़ेद बिस्तर पर एक बोरे की तरह पड़ा हुआ था। सिर्फ अंगुलियों से ही पता चल रहा था कि यह कोई उन्नीस-बीस वर्ष के लड़के का है और वह उसकी माँ थी जो बोली जा रही थी- ‘मेरा बेटा बहुत प्यारा था मैडम, बहुत अच्छा, बहुत समझदार………..।’
3. आटे का हलवा
समय के साथ पिता वृद्ध और लाचार हो गए पर अपनी बुरी लतों से बाज नहीं आये। जीवन भर पिता और बच्चों के बीच संतुलन बनाती माँ अब नहीं रही। बच्चों द्वारा यथासंभव उनका ख्याल रखने के बावजूद अक्सर वे मौका निकाल लेते और फिर पूरे घर को सिर पर उठा लेते। आज फिर उन्होंने खाने में अपने मनपसंद की सब्जी इत्यादि न पा कर बेटी को खूब खरी-खोटी सुनाया और भुनभुनाते हुए गुस्से में खाना खाया। आज फिर बेटी ने दुःखी हो कर कहा- ‘आप कुछ बताते भी तो नहीं हैं’ और अपने कमरे की ओर भागी। पिता के गुस्से में चिल्लाने की आवाज़ सुन कर भाई कमरे से बाहर आया और स्थितियाँ समझ कर बहन के पीछे भागा।
पलंग के दोनों छोर पर बैठे भाई-बहन को आज फिर उनकी माँ बेतरह याद आईं और साथ ही याद आई बचपन की वह घटना, जब एक शाम वे चारो भाई-बहन माँ और चूल्हे को घेरे बैठे थे। माँ बना रही थी आटे का हलवा और वे हलवे की सोंधी खुशबू लेते हुए खाने को उतावले हुए जा रहे थे। तभी बाहर से लौटे थे पिता और यह नजारा देख माँ पर बहुत जोर से चिल्लाये थे- ‘तुमको पता है कि हमको आटा का हलुवा अच्छा नहीं लगता है तो काहे बना रही हो अउर उ भी एतना कड़ाही भर के !’ और फिर गुस्से में पूरी कड़ाही उठा कर बाहर फेंक आए थे। सहमे हुए से बच्चों को माँ ने बाद में खाना खिलाते समय चुपके से भरोसा दिलाया था कि हलवा फिर से बना दूँगी।
थोड़ी ही देर में पिता के अपने कमरे में जाने की आहट मिलते ही दोनों भाई-बहन की आँसू भरी नजरें मिलीं। भाई ने बहन का हाथ पकड़ा और धीरे से कहा- ‘चलो आज आटे का हलवा बनाते हैं।’
4. पत्नी की औकात
सुबह-सुबह मुहल्ले के लोगों से खबर मिली कि रमेश, उसके माता-पिता और छोटे भाई को पुलिस पकड़ कर थाने ले गई। परेशान-सा दोस्तों के पास पहुँचा तो पता चला कि एक सप्ताह पहले उसकी पत्नी अपनी छः-सात महीने की बच्ची के साथ मायके चली गई है और वहीं से उसने रमेश और उसके परिवार के विरुद्ध बेटी होने पर मार-पीट करने एवं दहेज़ के लिए प्रताड़ित करने का आरोप लगाते हुए एफ आई आर दर्ज कर दिया है। मुझे आश्चर्य हुआ क्योंकि वह एक अच्छी, पढ़ी-लिखी, समझदार लड़की लगती थी मुझे और दोस्तों से भी अक्सर उसकी तारीफ ही सुना था।
उसके बारे में सोचते-सोचते अचानक मुझे रमेश की कही वे बातें याद हो आईं। जब अच्छी नौकरी मिलने पर उसके परिवार के लोगों ने काफी देखभाल कर शहर के ही एक बहुत बड़े व्यवसायी की इकलौती, खूबसूरत और पढ़ी-लिखी बेटी के साथ उसका रिश्ता तय किया था। तब दोनों परिवारों की आर्थिक स्थिति में जमीन आसमान के अंतर को देखते हुए कुछ मित्रों ने उसे समझाने की कोशिश की थी। उनकी बातें सुन कर वह जोर से हँसा था और कहा था- ‘अरे यार, क्यों बेकार के टेंशन में डालते रहते हो तुमलोग !! अगर मेरी शादी किसी राष्ट्रपति की बेटी से भी हो जाये तो क्या?? बोलो?? आखिर रहना तो उसे मेरे ही औकात में होगा न, कि राष्ट्रपति के औकात में?’ ।।

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