स्वाति शर्मा की 4 कविताएं

स्वाति शर्मा
  1. बातें

 

कुछ ऐसी बातें होती हैं

कुछ यूं ही यादें होती हैं

कुछ डूब उतर के जाती हैं

कुछ देख़ती ही रह जाती हैं

कुछ ख़ुद ही खुद में खोती हैं

कुछ ऐसी बातें होती हैं

 

सांसों में चलती रहती हैं

कुछ चुप हैं तो कुछ कहती हैं

कुछ दम ही में अटक गईं

और ख़्याल की स्याही टपक गई

जो जी-जी कर जोती हैं

कुछ ऐसी बातें होती हैं

 

अनकही तो ख़ालिस ख़ुशबू है

कह दी तो बिखरा जादू है

कुछ आस में पलती रहती हैं

कुछ आह में जलती रहती हैं

कुछ बीज नए भी बोती हैं

कुछ ऐसी बातें होती हैं

 

बातें कुछ कह दी जाती हैं

काफ़ी पर रह ही जाती हैं

जब रातों से डर लगता है

और रातें साथी होती हैं

दिन भर तब ख़ुद से होती हैं

कुछ ऐसी बातें होती हैं

 

  1. अधूरे चाँद सा

 

आज दिल है
कुछ अधूरे नग़मे सुनने का
अधूरी बातें
अधूरे सपने
अधूरी यादें बुनने का

कुछ कहो
जो सुना न हो
हो अधमरा पर फ़ना न हो
सिर्फ़ आधा ही तुम्हें दिखा हो
जिसे आधी साँस से तुमने लिखा हो

 

वो बात जो अधर में रुक गई
वो नज़्म जो क़लम में छुप गई
वो ख़याल जो
लफ़्जों को पीछे छोड़ गया
वो आंसू जो
तुम्हारी स्याही निचोड़ गया

वही क़िस्से जो
चुप रह न सके
वही हिस्से
पर तुम कह न सके

वो अक्षर जो
क़सक लिए बैठे हैं
वो अक्षर जो
न आने को ऐंठे हैं

वो मसले जो
अनसुलझे हो गए थे
वो रास्ते जहाँ
तुम खो गए थे

कहो उसे
जिसे दर्द के सिरे पे
तुम छोड़ आए थे
वो अतल विचार
जहाँ से पग मोड़ लाए थे

ज़रा पलटो उन वरक़ों को
जो राह तुम्हारी तकते हैं
और जानो ज़रा
क्या अधूरे वाक्य कर सकते हैं

वो सितारे हैं
तुम्हारी किताब के
वो टुकड़े हैं
आफ़ताब के

वही प्रतिबिंब
तुम्हारी कुण्ठा का
सबसे ऊँचा
सबसे सच्चा
सबसे पक्का था

बस वही अनकहा एक
पूरा है
जो कह डाला
क्या जाने वो अधूरा है

 

  1. प्रेम

 

कह दे तो तेरी माया बनूँ
चाहे तो तेरा वैराग
सुमिरे तो रागिनी हो जाऊँ
बिसरे, वियोगिनी अभाग

बोले तो हूँ देव संस्कृत
हो मूक तो अश्रुधार
देखे तो कामना रति की
समझे तो योग का सार

संग चलो मैं काल-चक्र अविराम
ठहरे तो तेरा परम-धाम
बूझे तो तेरी सम-दृष्टि हूँ
हो नित-शान्ति या जीवन-संग्राम

थामे तो शान्त-चित धरा
खेले तो कल-कल अप्सरा
छोड़े तो मरुस्थल निर्दयी
भूले तो मृत्यु की वरा

जाने मुझे
धारे मुझे
राखे कभी
हारे मुझे

शाकुन्तल विश्वास मैं
भागीरथ प्रयास मैं
केवल तेरी खिन्नता
केवल तेरी आस मैं

मैं स्वामिनी
मैं भोगिनी
हो रूष्ट तो
चिर-चिर रोगिनी

अपनी न मेरी वाणी
अपने न मुझमें प्राण
तेरी हूँ जड़-बुद्धि मैं
तेरी हूँ वीणा-ज्ञान

तेरे बिना
असहाय हूँ
तू शब्द
मैं अभिप्राय हूँ

जो हूँ मैं काव्य-ग्रन्थ
अक्षर-विहीन मैं रिक्त हूँ
मैं हूँ सही
पर अव्यक्त हूँ

तू आत्मन
मैं प्रकृति
निर्जीव हूँ
जो तुझसे हटी

ना वियोग का धर्म कोई
ना विरहनी की जात
प्रेम है आशय इसका
समर्पण इसकी साख

 

  1. हम

 

मिलना

रातों से सुबहों का

सुबहों से आशाओं का

आशाओं से व्यथाओं का

व्यथाओं से साहस का

और मुझसे तुम्हारा

 

वादा

ज़ुल्म से ग़दर का

ग़दर से बिजलियों का

बिजलियों से बारिश का

बारिश से फूलों का

मेरे मन से तुम्हारा

 

इन्तज़ार 

गरमी को सावन का

सावन को पतझड़ का

पतझड़ को सर्दी का

सर्दी को सूरज का

और मुझे हमारा

 

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