Tagged: कविता

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पवन तिवारी की कविता किताबें

अब लोगों के हाथों में किताबें नहीं दिखतीं पर सच यह भी है कि मेरे हाथों में भी किताबें नहीं दिखतीं कुछ दोस्तों के हाथों में कभी-कभी दिखती थीं किताबें पर मेरे हाथों में तो रोज रहती थी किताबें जो रिश्ता था रुहानी सा किताबों से,किताबी हो गया कल जब...

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चंद्र प्रकाश श्रीवास्तव की सात कविताएं

जब कविताएं नहीं होंगी सोचो जरा ऐसे कल के बारे में जब कविताएं नहीं होंगी सोचो जब गीतों में सुर नहीं होंगे सोचो जब आल्हा चैती के स्वर नहीं होंगे सोचो जब ताल, धुन और लय नहीं होंगे सोचो जब किस्से और किस्सागो नहीं होंगे सोचो जब बच्चे सपने देखना...

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संजीव ठाकुर की कविता ‘वे भूल गए’

वे भूल गए वे दिन जब बाढ़ में डूबे गाँव से निकलते थे सतुआ खाकर चिलचिलाती धूप में जाते थे शहर के कॉलेज नंगे पाँव ! अब वे महानगर में माल रोड पर रहते हैं चार कमरों के मकान में ए॰सी॰ में सोए बगैर नहीं निकलता पेट का पाखाना कमोड...

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‘कविता लिखना आसान काम नहीं’

1.कविता के प्रति आपका झुकाव कैसे उत्पन्न हुआ ? शहंशाह आलम : मेरा पूरा समय अभाव में गुज़रा है। होश संभाला तो देखा पिता हम पाँच भाई और तीन बहनों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। पिता बिहार स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कंपनी के मुंगेर प्रतिष्ठान में मामूली ड्राइवर थे। जो...

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अनुपमा शर्मा की कविता ‘अस्तित्व की जड़’

अदृश्य है ,है दृश्य भी, सजीव में है,निर्जीव में भी, ज्ञान में है, अश्रु में है, मुस्कान में है, आवाज़ में है, साज़ में भी, नृत्य की मुद्राओ में भी, अभिनय में भी, शिक्षा में भी, आत्मविश्वास में भी, विश्व की हर काबिलियत में भी, उसकी प्राथमिकता है केवल सम्मान,...

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मनोज चौहान की तीन कविताएं

ऐ कविता   दस्तक देना तुम कभी ऐ कविता दिनभर कमर तोड़ चुके ईंट-भठ्ठे के मजदूरों की उन बास छोड़ती झुग्गियों में बीड़ी के धुंएं और सस्ते देशी ठर्रे के घूंट पीकर जो चाहते हैं मिटा देना थकान और चिंताओं को व भीतर उपजती वेदना को भी और बुनते हैं सपनों...

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आरती आलोक वर्मा की दो कविताएं

मैं आज की नारी हूं ढूंढते रहे हर वक्त खामियां दर खामियां दोष मुझमें था या तुम्हारे नजरिए में नापसन्द थी तुम्हेें हर वो चीज, व्यक्ति या परिस्थितियाँ जो मुझे बेहद पसंद थी । मेरे किसी फैसले तक आने से पूर्व, सुना देते अपना निर्णय या फिर धमकियाँ तलाक की...

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प्रतिभा चौहान की पांच कविताएं

||हमारे फूल -तुम्हारे नक्शे|| तुम्हें उलझे हुए आदमी हो तुम सुलझा नहीं  सके समय की लट को तुमने नहीं सीखा खुशियों से खेलना तुम्हें नहीं आता सीधे सरल सवालों का जवाब देना तुमने तो यह भी नहीं समझा कि डूबते हुए आदमी को तिनके का सहारा होता है तुमने नहीं...

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पंकज शर्मा की दो कविताएं

तस्वीरें… गहरे असमंजस से भरा चेहरा अचानक मुस्कुरा उठता है। स्माइल प्लीज.. सुनकर कुछ साफ दिल लोगों को छोड़ हर चेहरा हरा भरा हो उठता है। और.. निकल आती है तरह तरह की तस्वीरें.. कुछ हँसते चेहरों के बीच, बुझी आँखों की कुछ जवां नौकरियों के बीच,रिटायर्ड साखों की अटल...

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सुशांत सुप्रिय की छह कविताएं

1. लौट आऊँगा मैं क़लम में रोशनाई-सा पृथ्वी पर अन्न के दाने-सा कोख में जीवन के बीज-सा लौट आऊँगा मैं आकाश में इंद्रधनुष-सा धरती पर मीठे पानी के कुएँ-सा ध्वंस के बाद नव-निर्माण-सा लौट आऊँगा मैं लौट आऊँगा मैं आँखों में नींद-सा जीभ में स्वाद-सा थनों में दूध-सा ठूँठ हो...

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कविता में भाषा की खोज

शहंशाह आलम मेरे मन में अक्सर यह प्रश्न आता.जाता रहा है कि भाषा का काम क्या है? मैं सोचता हूँ (मेरा ऐसा सोचना भाषा के विद्वान अध्येता की दृष्टि में किसी जाहिल, किसी अपढ़, किसी बच्चे का सोचा हुआ कहा जा सकता है, तब भी मैं अपने इस सोचे को...

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कविता हमें त्रासदी से बाहर निकालती है : मदन कश्यप

 राजभाषा विभाग, बिहार सरकार के   ‘नागार्जुन-सम्मान’ से सम्मानित  कवि मदन कश्यप का कविता-पाठ शहंशाह आलम की रिपोर्ट    ‘गूलर के फूल नहीं खिलते’, ‘लेकिन उदास है पृथ्वी’, नीम रोशनी में’, ‘कुरुज’ और ‘दूर तक चुप्पी’ जैसे महत्वपूर्ण कविता-संग्रहों के कवि मदन कश्यप की कविताओं का पाठ पटना में स्थित ‘टेक्नो हैराल्ड’...

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चन्द्रप्रकाश श्रीवास्तव की छह कविताएं

गतिमान हने दो समय को भागता है समय तो भागने दो समय को कुलाचें भरने दो समय चीखता-चिल्लाता है तो चीखने चिल्लाने दो समय अकुलाता है तो अकुलाने दो समय विलाप करता है तो सुनो समय का विलाप अच्छा है समय का गतिमान रहना कुलाचें भरना चीखना-चिल्लाना हांफना और विलाप...

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कृष्णधर शर्मा की चार कविताएं

नदी और औरत किसी झरने का नदी बन जाना ठीक वैसे ही तो जैसे किसी लड़की का औरत बन जाना जैसे एकवचन से बहुवचन हो जाना जैसे अपने लिए जीना छोड़कर दुनिया के लिए जीना जैसे दूसरों को अमृत पिला खुद जहर पीना अद्भुत सी समानताएं हैं नदी और औरत...

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ललित शर्मा की दो कविताएं

 बिजूका जानते नहीं , क्या होता, बिजूका? एक टाँग , पर खड़ा हुआ, बाँहें पसारे, मटकी का सिर लटकाये, सदा मुस्कराये, पराली का शरीर, चीथड़े लगा कोट, खेत जैसे इसका हो। कौआ भगाने को, लगाया इसको, चिड़िया तक नहीं , भागती, चूहे भी, कुतर जाते टाँग , इसी की, कभी...

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डॉ भावना की तीन कविताएं

उस रात उस रात जब बेला ने खिलने से मना कर दिया था तो ख़ुशबू उदास हो गयी थी उस रात जब चाँदनी ने फेर ली अपनी नज़रें चाँद को देखकर तो रो पड़ा था आसमान उस रात जब नदी ने बिल्कुल शांत हो रोक ली थी अपनी धाराएँ तो...