Tagged: कविता

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प्रभांशु कुमार की दो कविताएं

लेबर चौराहा और कविता सूर्य की पहली किरण के स्पर्श से पुलकित हो उठती है कविता चल देती है लेबर चौराहे की ओर जहां  मजदूरों की बोली लगती है। होता है श्रम का कारोबार गाँव-देहात से कुछ पैदल कुछ साइकिलों से काम की तलाश में आये मजदूरों की भीड़ में...

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राकेश रोहित की सात कविताएं

जब सब लौट जायेंगे सब जब घर लौट जायेंगे मैं कहाँ जाऊंगा इतनी बड़ी दुनिया में नहीं है मेरा कोई वृक्ष! मेरे जीवन में कुछ कलरव की स्मृतियाँ हैं और एक पुराने स्कूल की जिसकी दीवार ढह गयी थी मास्टर जी की पीठ पर छुट्टी का घंटा बजने पर जहाँ...

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अंजना वाजपेई की कविता ‘ये शेष रह जाएंगे’

कुछ गोलियों की आवाजें बम के धमाके , फैल जाती है खामोशी …नहीं, यह खामोशी नहीं सुहागिनों का ,बच्चों का, मां बाप का करूण विलाप है, मूक रूदन है प्रकृति का , धरती का ,आकाश का ….. जलेंगी चिताएं और विलीन हो जायेंगे शरीर जो सिर्फ शरीर ही नहीं प्यार...

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‘मां’ पर अमरजीत कौंके की सात कविताएं

जो कभी नहीं भूलती  ( दिवंगत माँ के लिए सात कविताएं )  1. बहुत भयानक रात थी ग्लूकोज़ की बोतल से बूँद-बूँद टपक रही थी मौत कमरे में माँ को किसी मगरमच्छ की तरह साँस-साँस निगल रही थी बचपन के बाद मैं माँ को पहली बार इतना समय इतना नज़दीक...

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गौतम कुमार ‘सागर’ की चार कविताएं

एक उम्र  की सुराही से रिस रहा है लम्हा लम्हा बूँद बूँद और हमें मालूम तक नहीं पड़ता कितनी स्मृतियाँ पुरानी किताब के जर्द पन्ने की तरह धूमिल पड़ गई हमें मालूम तक नहीं पड़ता बिना मिले , बिना देखे कितने अनमोल रिश्ते औपचारिकता में तब्दील हो जाते है हमें...

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विभा परमार की दो कविताएं

सवाल आने बंद हो जाएं… मेरे भीतर चलती रहती है सवालों की सीरीज अनवरत गति से जैसे हवा चलती है, पानी बहता है और साँसें चलती हैं सोचती हूँ अक्सर हवा गर रुक जाये तो दम घुटता है पानी रुक जाये तो सड़ने लगता है सवाल आने बंद हो जाएं...

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ओम नागर की चार कविताएं

तुम और मैं तुम मंच पर मैं फर्श पर बैठा हूँ एक सच्चे सामाजिक की तरह तुम्हें चिंता है अपने कलफ़ लगे कुर्ते पर सिलवट उतर आने की मुझे तो मुश्क़िल हो रहीं यह सोचते कि अभी और कितनी खुरदरी करनी हैं तुम्हें तथाकथित तरक्की की राह तुम किस अजाने...

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नीलिमा श्रीवास्तव की दो कविताएं

मै स्त्री मैं स्त्री कभी अपनों ने कभी परायों ने कभी अजनबी सायों ने तंग किया चलती राहों में कभी दर्द में कभी फर्ज में कभी मर्ज में वेदना मिली इस धरती के नरक में कभी शोर में कभी भोर में कभी जोर में संताप सहे अपनी ओर से कभी...

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बेखौफ़ होकर सच बोलतीं कविताएं

पुस्तक समीक्षा सत्येन्द्र प्रसाद श्रीवास्तव रोहित कौशिक के कविता संग्रह ‘इस खंडित समय में’ की समीक्षा जिस समाज में नफ़रत फैलाने वालों को सम्मानित किया जा रहा हो, वह समाज जाहिर तौर अपने पतन के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा होगा। ऐसे समाज में सच बोलने वाले या तो...

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पवन तिवारी की कविता किताबें

अब लोगों के हाथों में किताबें नहीं दिखतीं पर सच यह भी है कि मेरे हाथों में भी किताबें नहीं दिखतीं कुछ दोस्तों के हाथों में कभी-कभी दिखती थीं किताबें पर मेरे हाथों में तो रोज रहती थी किताबें जो रिश्ता था रुहानी सा किताबों से,किताबी हो गया कल जब...

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चंद्र प्रकाश श्रीवास्तव की सात कविताएं

जब कविताएं नहीं होंगी सोचो जरा ऐसे कल के बारे में जब कविताएं नहीं होंगी सोचो जब गीतों में सुर नहीं होंगे सोचो जब आल्हा चैती के स्वर नहीं होंगे सोचो जब ताल, धुन और लय नहीं होंगे सोचो जब किस्से और किस्सागो नहीं होंगे सोचो जब बच्चे सपने देखना...

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संजीव ठाकुर की कविता ‘वे भूल गए’

वे भूल गए वे दिन जब बाढ़ में डूबे गाँव से निकलते थे सतुआ खाकर चिलचिलाती धूप में जाते थे शहर के कॉलेज नंगे पाँव ! अब वे महानगर में माल रोड पर रहते हैं चार कमरों के मकान में ए॰सी॰ में सोए बगैर नहीं निकलता पेट का पाखाना कमोड...

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‘कविता लिखना आसान काम नहीं’

1.कविता के प्रति आपका झुकाव कैसे उत्पन्न हुआ ? शहंशाह आलम : मेरा पूरा समय अभाव में गुज़रा है। होश संभाला तो देखा पिता हम पाँच भाई और तीन बहनों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। पिता बिहार स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कंपनी के मुंगेर प्रतिष्ठान में मामूली ड्राइवर थे। जो...

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अनुपमा शर्मा की कविता ‘अस्तित्व की जड़’

अदृश्य है ,है दृश्य भी, सजीव में है,निर्जीव में भी, ज्ञान में है, अश्रु में है, मुस्कान में है, आवाज़ में है, साज़ में भी, नृत्य की मुद्राओ में भी, अभिनय में भी, शिक्षा में भी, आत्मविश्वास में भी, विश्व की हर काबिलियत में भी, उसकी प्राथमिकता है केवल सम्मान,...

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मनोज चौहान की तीन कविताएं

ऐ कविता   दस्तक देना तुम कभी ऐ कविता दिनभर कमर तोड़ चुके ईंट-भठ्ठे के मजदूरों की उन बास छोड़ती झुग्गियों में बीड़ी के धुंएं और सस्ते देशी ठर्रे के घूंट पीकर जो चाहते हैं मिटा देना थकान और चिंताओं को व भीतर उपजती वेदना को भी और बुनते हैं सपनों...

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आरती आलोक वर्मा की दो कविताएं

मैं आज की नारी हूं ढूंढते रहे हर वक्त खामियां दर खामियां दोष मुझमें था या तुम्हारे नजरिए में नापसन्द थी तुम्हेें हर वो चीज, व्यक्ति या परिस्थितियाँ जो मुझे बेहद पसंद थी । मेरे किसी फैसले तक आने से पूर्व, सुना देते अपना निर्णय या फिर धमकियाँ तलाक की...