Tagged: agitation

0

संजीव ठाकुर की कविता ‘वे भूल गए’

वे भूल गए वे दिन जब बाढ़ में डूबे गाँव से निकलते थे सतुआ खाकर चिलचिलाती धूप में जाते थे शहर के कॉलेज नंगे पाँव ! अब वे महानगर में माल रोड पर रहते हैं चार कमरों के मकान में ए॰सी॰ में सोए बगैर नहीं निकलता पेट का पाखाना कमोड...

0

चन्द्रप्रकाश श्रीवास्तव की छह कविताएं

गतिमान हने दो समय को भागता है समय तो भागने दो समय को कुलाचें भरने दो समय चीखता-चिल्लाता है तो चीखने चिल्लाने दो समय अकुलाता है तो अकुलाने दो समय विलाप करता है तो सुनो समय का विलाप अच्छा है समय का गतिमान रहना कुलाचें भरना चीखना-चिल्लाना हांफना और विलाप...

0

समकालीन कविता का महत्वपूर्ण दस्तावेज : दिल्ली की सेल्फी कविता विशेषांक

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव लड़ना था हमें भय, भूख और भ्रष्टाचार के खिलाफ हम हो रहे थे एकजुट आम आदमी के पक्ष में पर उनलोगों को नहीं था मंजूर यह। उन्होंने फेंके कुछ ऐंठे हुए शब्द हमारे आसपास और लड़ने लगे हम आपस में ही! वे मुस्कुरा रहे हैं दूर खड़े...

0

विजय ‘आरोहण’ की नौ कविताएं

सारंडा, जंगल और आदिवासी,जल, जंगम और प्रतिरोध की कवितायें 1. हमारे पहाड़ों के बच्चे हमारे पहाड़ों के बच्चे गिल्ली-डंडा खेलते है वह छुप्पम-छुपाई खेलते शाल के पेड़ों के पीछे छिप जाते हैं वह तीर-धनुषों से निशाना साध रहे हैं इसके लिए वह एक बिजुका बनाते हैं और दनदनाती आती है...

0

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की कहानी ‘चटकल’

नरेश झुंझला गया। उसे लगा चटकल में बदली मजदूर का काम करना और भीख मांगना बराबर है। पिछले तीन दिनों से लेबर ऑफिस का चक्कर लगा-लगा कर वह हलकान था लेकिन बाबू थे कि काम देने का नाम ही नहीं ले रहे थे। बस एक ही ज़वाब–आज लोक नहीं लागेगा।(आज...

1

मज़दूरों के संघर्ष का देखा-भोगा सच

पुस्तक समीक्षा सुशील कुमार आजादी के इतने सालों बाद भी जब दुनिया के प्रगतिशील देशों में रोटियों के हादसे हो रहे हों तो परिवेश का दबाव कवि को जनाकीर्ण विभीषिका पर कविता लिखने को मजबूर करता है। गोया कि , युवा कवि सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव का पहला काव्य संकलन “रोटियों...

0

नित्यानंद गायेन की पांच कविताएं

उफ़नती  नदी  का  दर्द और तुम्हारे आंसुओं ने बता दिया उफ़नती नदी का दर्द कमजोर आदमी का दावा मेरा यकीन था या भ्रम कि करता रहा दावा तुम्हें जानने का ! यह भरोसा अपने भीतर छिपे उस कमजोर आदमी का दावा था, जो खुद को जान नहीं पाया आज तक...

0

सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘क्या नाम था उसका?’

अब पानी सिर से ऊपर गुज़र चुका था । लिहाज़ा प्रोफ़ेसर सरोज कुमार के नेतृत्व में कॉलेज के शिक्षक अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले गए । धरना-प्रदर्शन शुरू हो गया । प्रोफ़ेसर सरोज कुमार देश के एक ग़रीब और पिछड़े प्रांत के क़स्बे किशन नगर के सरकारी कॉलेज में पिछले पच्चीस...

0

अनिरुद्ध सिन्हा की पांच ग़ज़लें

एक कोई  तस्वीर  धुंधली  सी  ख़यालों में उभरती है मगर वो मजहबी झगड़ों में कुछ कहने से डरती है नए लफ़्ज़ों  के  लहंगे में सियासत जब उतरती  है सहम जाती है हर ख़्वाहिश शराफ़त घुटके मरती है किसी के  इश्क़ में  अपनी कोई  चाहत नहीं होती मुहब्बत  हुक़्म  देती  है ...

2

शहंशाह आलम की पांच कविताएं

पेंटिंग : शहंशाह आलम   खोलना खोलने की जहाँ तक बात है लगता है रहस्य का रहस्य आश्चर्य का आश्चर्य तक खोल डाला है किसी परिचित जैसा   लेकिन मेरे जैसे झूठे ने उस घर का द्वार खोला तो लगा कितना कुछ खोलना बाक़ी रह गया है अभी भी  ...

0

प्रसिद्ध नाइजीरियाई कथाकार चिनुआ अचेबे की कहानी ” डेड मेन्स पाथ “

अंग्रेज़ी से  हिन्दी में अनुवाद मृतकों का मार्ग मूल लेखक: चिनुआ अचेबे अनुवाद: सुशांत सुप्रिय अपेक्षा से कहीं पहले माइकेल ओबी की इच्छा पूरी हो गई । जनवरी , 1949 में उसकी नियुक्ति नड्यूम केंद्रीय विद्यालय के प्रधानाचार्य के पद पर कर दी गई । यह विद्यालय हमेशा से पिछड़ा...

2

तीन युवा कवि, तीन कविताएं

मैंने सहेजा है तुम्हें गौरव भारती मैंने सहेजा है तुम्हें ज्यों पत्तियां सहेजती हैं धूप माटी सहेजती है बारिश फूल सहेजता है खुशबू चाँद सहेजता है चांदनी ज्यों माँ सहेजती है बच्चों के लिबास संग लिपटी यादें मैंने सहेजा है तुम्हें जैसे बचपन की बदमाशियां नानी की कहानियां माँ के...

0

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की पांच ग़ज़लें

एक धीरे धीरे ही सही बदल रहा हूं मैं दुनिया के सांचे में ढल रहा हूं मैं। सिसकती है रात, सिसकती रहे सुबह के लिए मचल रहा हूं मैं। अंधेरे के बाद उजाला ही आएगा उम्मीद झूठी है, उछल रहा हूं मैं। इंसां था, जाने कब सांप बन गया आदमी...

1

नंदना पंकज की कविता ‘कौवे की व्यथा’

मैंने तिनका- तिनका चुना बड़े जतन से घोंसला बुना अपना संसार बसाया दे अंडे परिवार बढ़ाया तन का गर्मी दे सेती रही माँ की ममता देती रही कवच तोड़ चूजे निकल आये मैं रही कलेजे से लगाये अपनी चोंच से खिलाया निवाला आँखों के तारों सा पाला धूप, बारिश, तूफान...

1

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की कविता ‘रोटियों के हादसे’

एक मरियल कुत्ता और एक मरियल आदमी कूड़ेदान में पड़ी एक सूखी रोटी के लिए झगड़ पड़े। कुत्ते ने कहा– मैंने देखा है पहले हक मेरा बनता है। आदमी चिल्लाया–नहीं! नहीं कर सकते तुम उल्लंघन मानवाधिकारों का रोटी पहले मैंने देखी है इस पर मेरा अधिकार बनता है। आदमी ने...

0

जंतर तो है पर मंतर अब काम नहीं करता

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव दिल्ली होने का मतलब क्या है? सत्ता का केंद्र? ताक़त और पॉवर का गलियारा या इसी सत्ता के लिए बार-बार रक्तरंजित होने वाली एक बेबस-लाचार नगरी? या फिर बार-बार उजड़ कर बस जाने के हौसले का नाम है दिल्ली? अगर ये हौसले का नाम है तो फिर...

0

अनवर सुहैल की तीन कविताएं

एक नफरतों से पैदा नहीं होगा इंक़लाब लेना-देना नहीं कुछ नफ़रत का किसी इंक़लाब से नफ़रत की कोख से कोई इंक़लाब होगा नहीं पैदा मेरे दोस्त ताने, व्यंग्य, लानतें और गालियाँ पत्थर, खंज़र, गोला-बारूद या कत्लो-गारत यही तो हैं फसलें नफ़रत की खेती की… तुम सोचते हो कि नफ़रत के...