Tagged: book review

0

वर्जनाओं को तोड़ती कहानियों का संग्रह ‘इश्क़ की दुकान बंद है’

पुस्तक समीक्षा सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव जिस्म मुहब्बत की प्रेरक तत्व है। जब किसी को देखकर दिल धड़क उठता है, उसकी मुहब्बत में पागल हो जाता है तो इसका मतलब है कि आंखों ने जिस खूबसूरती को देखा, दिल उसका दीवाना हो गया। इस बात से इनकार करना सच्चाई को नकारना...

0

बेखौफ़ होकर सच बोलतीं कविताएं

पुस्तक समीक्षा सत्येन्द्र प्रसाद श्रीवास्तव रोहित कौशिक के कविता संग्रह ‘इस खंडित समय में’ की समीक्षा जिस समाज में नफ़रत फैलाने वालों को सम्मानित किया जा रहा हो, वह समाज जाहिर तौर अपने पतन के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा होगा। ऐसे समाज में सच बोलने वाले या तो...

0

दीपक अरोड़ा स्‍मृति पांडुलिपि प्रकाशन योजना-2017 हेतु पांडुलिपियां आमंत्रित

कवि दीपक अरोड़ा की स्‍मृति में शुरु की गई पांडुलिपि प्रकाशन सहयोग योजना के दूसरे वर्ष के लिए बोधि प्रकाशन की ओर से हिन्‍दी कविता पुस्‍तकों की पांडुलिपियां सादर आमंत्रित हैं। पहले वर्ष में पांच पुस्‍तकों का चयन किया गया था- जिनका प्रकाशन हो चुका है। इस वर्ष तथा आने...

0

दरकते सामाजिक तानेबाने की कहानी है ‘विघटन’

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव इस ‘विघटन’ से बचना मुश्किल है हम एक ऐसे समाज में रह रहे हैं, जिसमें स्वार्थपरता हावी है। आदमी अपना स्वार्थ पूरा करने के इस हद तक नीचे गिरने को तैयार है, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। नीचता की इस पराकाष्टा के चलते ही सामाजिक...

0

ज़िन्दगी का जश्न मनातीं कविताएं

सुषमा सिन्हा के कविता संग्रह ‘बहुत दिनों के बाद’ की समीक्षा सत्येन्द्र प्रसाद श्रीवास्तव ताउम्र सिलती रहीं मां अपनी कटी-फटी उघड़ी ज़िन्दगी को और फैलती रही खुशबू की तरह घर के हर एक कोने में (कविता : ‘मां- दो’) कविता की इन पांच पंक्तियां में पूरी ज़िन्दगी सिमटी है। ज़िन्दगी,...

0

समकालीन कविता का महत्वपूर्ण दस्तावेज : दिल्ली की सेल्फी कविता विशेषांक

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव लड़ना था हमें भय, भूख और भ्रष्टाचार के खिलाफ हम हो रहे थे एकजुट आम आदमी के पक्ष में पर उनलोगों को नहीं था मंजूर यह। उन्होंने फेंके कुछ ऐंठे हुए शब्द हमारे आसपास और लड़ने लगे हम आपस में ही! वे मुस्कुरा रहे हैं दूर खड़े...

0

जीवन के क्रूर अनुभवों की जीवन्त कथा यात्रा है ‘कल्लन चतुर्वेदी’

पुस्तक समीक्षा शहंशाह आलम एक कहानीकार का आदमी की ज़िंदगी के साथ गहरा रिश्ता होता है। इसलिए कि एक कहानीकार ख़ुद आदमी होता है और जिसमें ज़िंदगी भी होती है। और एक कहानीकार ख़ुद ज़िंदगी से गुत्थमगुत्था करता रहा होता है, संघर्ष करता रहा होता है, नक़ली चमत्कारों की पोल...

0

वहाँ पानी नहीं है : दर्द को जुबान देती कविताएँ

पुस्तक समीक्षा वीणा भाटिया ‘वहाँ पानी नहीं है’ दिविक रमेश का नवीनतम कविता-संग्रह है। इसके पूर्व इनके नौ कविता-संग्रह आ चुके हैं। ‘गेहूँ घर आया है’ इनकी चुनी हुई कविताओं का प्रतिनिधि संग्रह है। गत वर्ष ‘माँ गाँव में है’ संग्रह आया और बहुचर्चित हुआ। प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह ने...

0

आदमियत की दुखती रग के निर्दोष राग ढूंढ़ने का नया तरीक़ा

पुस्तक समीक्षा किताब :  चाक पर रेत ( जाबिर हुसेन ) शहंशाह आलम मेरा मानना है कि हर लेखक किसी पहाड़ी कबीले का सदस्य होता है। तभी तो हर लेखक जीवन को, जीवन से जुड़े संघर्ष को इतने निकट से देख पाता है। यह सही भी है। एक सच्चे लेखक...

1

मज़दूरों के संघर्ष का देखा-भोगा सच

पुस्तक समीक्षा सुशील कुमार आजादी के इतने सालों बाद भी जब दुनिया के प्रगतिशील देशों में रोटियों के हादसे हो रहे हों तो परिवेश का दबाव कवि को जनाकीर्ण विभीषिका पर कविता लिखने को मजबूर करता है। गोया कि , युवा कवि सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव का पहला काव्य संकलन “रोटियों...

0

गर्म राख में सुबकती ग़ज़लों में आक्रोश का तेवर

अदम गोंडवी की ग़ज़ल- पुस्तक “समय से मुठभेड़” की समीक्षा दीप नारायण ठाकुर जब कोई पाठक किसी रचना को पढ़ता है और यह महसूस करता है कि यह तो उसके आसपास की है , उसकी ज़िंदगी से , लोगों की ज़िंदगियों से जुड़ी हुई है तो समझना चाहिए कि रचनाकार...

0

पीड़ा और प्रेम की अजस्र धारा वाली ‘एक नदी जामुनी सी’

पुस्तक समीक्षा सुशील कुमार मालिनी गौतम अंग्रेजी साहित्य की प्राध्यापिका होते हुए हिंदी में लिखती हैं जो हिंदी के लिए एक बड़ी अच्छी बात है। गजल-संग्रह के बाद बोधि प्रकाशन से 2016 में उनकी एक कविता की किताब *एक नदी जामुनी सी* आई है। पूरे संग्रह से गुजरने पर मुझे...

0

हिन्दी साहित्य का बाजारकाल

भरत प्रसाद                                                        नयी सदी, नया जमीन, नयी आकाश, नया लक्ष्य, नयी उम्मीदें, नयी आकांक्षाएँ। यकीनन मौजूदा सदी ने मनुष्य और उसके जीवन के प्रत्येक पहलू को नयेपन की आँधी में उलट-पलट कर रख दिया है। परम्परागत मूल्य, मान्यताएँ, रिवाज, संस्कार और तौर-तरीके विलुप्त प्रजातियों की नियति प्राप्त करने वाले...

1

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की पांच कविताएं

सिस्टम रास्ता रोका है मज़दूरों ने क्योंकि उन्हें रोटी की जरूरत है पुलिस ने बरसाए हैं डंडे क्योंकि भूख उन्हें भी  लगती है भूख दीवानी है मैंने ठंडे चूल्हे में मुहब्बत को दम तोड़ते देखा है भूख दीवानी है किसी को नहीं छोड़ती दूसरा पहलू पहली बार  उसे डर लगा...

0

कविता के नए प्रदेश की नए महत्व की कविताएँ

पुस्तक-समीक्षा शहंशाह आलम हिंदी कविता की नई ज़मीन जिस तेज़ी से बड़ी हो रही है, विकसित हो रही है, यह देखकर कविता के इतिहासकारों को प्रसन्नता ज़रूर होनी चाहिए, कविता के उन इतिहासकारों को, जो कविता-इतिहास-लेखन के समय ईमानदार बने रहते हैं। मेरे विचार से कविता की ऐतिहासिकता इसी बात...

0

हमारे समय के अँधेरे को रौशन करनेवाले शायर इब्राहीम ‘अश्क’ का ‘सरमाया’

पुस्तक-समीक्षा शहंशाह आलम इब्राहीम ‘अश्क’ की पहचान उन शायरों में है, जिनका गहरा ताल्लुक़ फ़िल्मी दुनिया से है। ‘कहो न प्यार है’, ‘कोई मिल गया’, ‘कृश’, ‘दस कहानियाँ’, ‘वेलकम’, ‘ब्लैक एण्ड व्हाइट’, ‘जाँनशीन’, ‘कोई मेरे दिल से पूछे’, ‘ये तेरा घर ये मेरा घर’ आदि कितनी ही फ़िल्में हैं, जो...

0

आदमी के युगपत से मुठभेड़ करातीं शंभु पी. सिंह की कहानियां

पुस्तक-समीक्षा शहंशाह आलम यह स्पष्ट है कि आदमी का वर्तमानकाल जितना जटिल है, उतना ही संदिग्ध भी है। आदमी का आज इन्हीं अटकलों में बीत जा रहा है कि कल का दिन नितान्त अभाव से भरा था लेकिन आज का दिन ज़रूर ख़ुशियों भरा गुज़रेगा। इसे आदमी की ऐतिहासिक परंपरा...

0

इस निपात समय को जवान बरगद का पेड़ सौंपते कवि की कविताएँ

पुस्तक-समीक्षा शहंशाह आलम सुल्तान अहमद समकालीन कविता के वैसे कवियों में शुमार किए जाते रहे हैं, जिनकी कविताएँ हमारे समय की अवनति को, ह्रास को, अध:पतन को को चिह्नित करके जवान, हरियल, उन्नति से भरे पत्ते फागुन और चैत माह को सौंपते रहे हैं। यानी जिस माह में सभी वृक्षों...

0

आदमी की दुनिया को विस्तार देतीं अनिरुद्ध सिन्हा की ग़ज़लें

पुस्तक-समीक्षा शहंशाह आलम समकालीन हिंदी साहित्य में ग़ज़ल का प्रभाव बढ़ा है, क़द बढ़ा है, स्वीकृति का दायरा बढ़ा है। ग़ज़ल के लिए इस सर्वव्यापकता के पीछे जिन महत्वपूर्ण ग़ज़लकारों का सद्प्रयास रहा है, उनमें समकालीन ग़ज़ल के चर्चित शायर अनिरुद्ध सिन्हा की भूमिका जानी बूझी हुई है। इसलिए कि...

0

तलवार की धार पर खरबूजे की तरह रखी दुनिया में आप कैसे सो सकते हैं

अरविंद श्रीवास्तव ’तुम्हें सोने नहीं देगी’ सरला माहेश्वरी की दूसरी काव्य-कृति है।  संग्रह की तमाम कविताएं साम्राज्यवादी सामंती सोच को बेनकाब करती है। ये कविताएं जहाँ आदमी में धंस रही जड़ता, अकर्मण्यता एवं लिज़लिजेपन को झकझोरती हैं वहीं सत्ता को और अधिक मानवीय बनाने की बात करती है। नई सदी...