Tagged: book

0

पवन तिवारी की कविता किताबें

अब लोगों के हाथों में किताबें नहीं दिखतीं पर सच यह भी है कि मेरे हाथों में भी किताबें नहीं दिखतीं कुछ दोस्तों के हाथों में कभी-कभी दिखती थीं किताबें पर मेरे हाथों में तो रोज रहती थी किताबें जो रिश्ता था रुहानी सा किताबों से,किताबी हो गया कल जब...

0

दीपक अरोड़ा स्‍मृति पांडुलिपि प्रकाशन योजना-2017 हेतु पांडुलिपियां आमंत्रित

कवि दीपक अरोड़ा की स्‍मृति में शुरु की गई पांडुलिपि प्रकाशन सहयोग योजना के दूसरे वर्ष के लिए बोधि प्रकाशन की ओर से हिन्‍दी कविता पुस्‍तकों की पांडुलिपियां सादर आमंत्रित हैं। पहले वर्ष में पांच पुस्‍तकों का चयन किया गया था- जिनका प्रकाशन हो चुका है। इस वर्ष तथा आने...

1

‘कविता लिखना आसान काम नहीं’

1.कविता के प्रति आपका झुकाव कैसे उत्पन्न हुआ ? शहंशाह आलम : मेरा पूरा समय अभाव में गुज़रा है। होश संभाला तो देखा पिता हम पाँच भाई और तीन बहनों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। पिता बिहार स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कंपनी के मुंगेर प्रतिष्ठान में मामूली ड्राइवर थे। जो...

0

दरकते सामाजिक तानेबाने की कहानी है ‘विघटन’

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव इस ‘विघटन’ से बचना मुश्किल है हम एक ऐसे समाज में रह रहे हैं, जिसमें स्वार्थपरता हावी है। आदमी अपना स्वार्थ पूरा करने के इस हद तक नीचे गिरने को तैयार है, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। नीचता की इस पराकाष्टा के चलते ही सामाजिक...

0

দিল্লিতে বাংলা বইয়ের মেলা

বর্ণালী চন্দ দিল্লি বেঙ্গল অ্যাসোসিয়েশনের আয়োজিত বইমেলাটি এবারে ষোড়শী হলেন । চারিদিকে শুধু বাংলাবই দেখা আর পছন্দসই বই কেনা,এযেন এক স্বপ্নপূরণের গল্প!দিল্লির বুকে এমণ এক আয়োজনের জন্য অবশ্যই সাধুবাদ প্রাপ্য বেঙ্গল অ্যাসোসিয়েশনের । আমার মতো যারা বাংলার বাইরে বাস করেন অথচ বাংলা বই পড়ার জন্য মুখিয়ে থাকেন তাদের জন্য নিউ...

0

ज़िन्दगी का जश्न मनातीं कविताएं

सुषमा सिन्हा के कविता संग्रह ‘बहुत दिनों के बाद’ की समीक्षा सत्येन्द्र प्रसाद श्रीवास्तव ताउम्र सिलती रहीं मां अपनी कटी-फटी उघड़ी ज़िन्दगी को और फैलती रही खुशबू की तरह घर के हर एक कोने में (कविता : ‘मां- दो’) कविता की इन पांच पंक्तियां में पूरी ज़िन्दगी सिमटी है। ज़िन्दगी,...

0

समकालीन कविता का महत्वपूर्ण दस्तावेज : दिल्ली की सेल्फी कविता विशेषांक

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव लड़ना था हमें भय, भूख और भ्रष्टाचार के खिलाफ हम हो रहे थे एकजुट आम आदमी के पक्ष में पर उनलोगों को नहीं था मंजूर यह। उन्होंने फेंके कुछ ऐंठे हुए शब्द हमारे आसपास और लड़ने लगे हम आपस में ही! वे मुस्कुरा रहे हैं दूर खड़े...

0

वीणा भाटिया की कविता ‘ख़ाली पन्ना’

किताब को पलटते हुए यकायक ख़ाली पन्ना बीच में आ गया प्रिंटिंग की भूल थी भूल जैसी लगी नहीं चौंका गया सुखद अहसास भी दे गया ख़ाली पन्ना चुटकी बजा कर जगा गया ख़ाली पन्ना चुनौती की तरह हाज़िर हो सवाल करता क्या सोच रहे थे ? आगे क्या सोचा...

0

जीवन के क्रूर अनुभवों की जीवन्त कथा यात्रा है ‘कल्लन चतुर्वेदी’

पुस्तक समीक्षा शहंशाह आलम एक कहानीकार का आदमी की ज़िंदगी के साथ गहरा रिश्ता होता है। इसलिए कि एक कहानीकार ख़ुद आदमी होता है और जिसमें ज़िंदगी भी होती है। और एक कहानीकार ख़ुद ज़िंदगी से गुत्थमगुत्था करता रहा होता है, संघर्ष करता रहा होता है, नक़ली चमत्कारों की पोल...

0

कमलेश भारतीय की चार लघुकथाएं

राजनीति के कान ‘मंत्री जी, आपने बड़ा कहर ढाया है’ ‘किस मामले में भाई ?’ ‘अपने इलाके के एक मास्टर का ट्रांसफर करके’ ‘अरे , वह मास्टर ? वह तो विरोधी दल के लिए भाग दौड़….’ ‘क्या कहते हैं , हुजूर ?’ ‘उस पर यही इल्जाम हैं ।’ ‘जरा चल...

0

वहाँ पानी नहीं है : दर्द को जुबान देती कविताएँ

पुस्तक समीक्षा वीणा भाटिया ‘वहाँ पानी नहीं है’ दिविक रमेश का नवीनतम कविता-संग्रह है। इसके पूर्व इनके नौ कविता-संग्रह आ चुके हैं। ‘गेहूँ घर आया है’ इनकी चुनी हुई कविताओं का प्रतिनिधि संग्रह है। गत वर्ष ‘माँ गाँव में है’ संग्रह आया और बहुचर्चित हुआ। प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह ने...

0

आदमियत की दुखती रग के निर्दोष राग ढूंढ़ने का नया तरीक़ा

पुस्तक समीक्षा किताब :  चाक पर रेत ( जाबिर हुसेन ) शहंशाह आलम मेरा मानना है कि हर लेखक किसी पहाड़ी कबीले का सदस्य होता है। तभी तो हर लेखक जीवन को, जीवन से जुड़े संघर्ष को इतने निकट से देख पाता है। यह सही भी है। एक सच्चे लेखक...

0

गरीब-शोषितों के लेखक थे गुरदयाल सिंह

वीणा भाटिया गुरदयाल सिंह भारतीय साहित्य की यथार्थवादी परंपरा के ऐसे साहित्यकार हैं जिन्होंने पूरी दुनिया में पंजाबी उपन्यास और कथा साहित्य को एक विशिष्ट पहचान दिलाई। विश्व साहित्य में इन्हें प्रेमचंद, गोर्की और लू शुन के समकक्ष माना जाता है। प्रेमचंद के बाद शायद ही किसी भारतीय साहित्यकार को दुनिया...

1

मज़दूरों के संघर्ष का देखा-भोगा सच

पुस्तक समीक्षा सुशील कुमार आजादी के इतने सालों बाद भी जब दुनिया के प्रगतिशील देशों में रोटियों के हादसे हो रहे हों तो परिवेश का दबाव कवि को जनाकीर्ण विभीषिका पर कविता लिखने को मजबूर करता है। गोया कि , युवा कवि सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव का पहला काव्य संकलन “रोटियों...

0

गर्म राख में सुबकती ग़ज़लों में आक्रोश का तेवर

अदम गोंडवी की ग़ज़ल- पुस्तक “समय से मुठभेड़” की समीक्षा दीप नारायण ठाकुर जब कोई पाठक किसी रचना को पढ़ता है और यह महसूस करता है कि यह तो उसके आसपास की है , उसकी ज़िंदगी से , लोगों की ज़िंदगियों से जुड़ी हुई है तो समझना चाहिए कि रचनाकार...

0

पीड़ा और प्रेम की अजस्र धारा वाली ‘एक नदी जामुनी सी’

पुस्तक समीक्षा सुशील कुमार मालिनी गौतम अंग्रेजी साहित्य की प्राध्यापिका होते हुए हिंदी में लिखती हैं जो हिंदी के लिए एक बड़ी अच्छी बात है। गजल-संग्रह के बाद बोधि प्रकाशन से 2016 में उनकी एक कविता की किताब *एक नदी जामुनी सी* आई है। पूरे संग्रह से गुजरने पर मुझे...

0

सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘अपना शहर’

( उन सभी को समर्पित जिन्हें  ‘ अपना शहर ‘ छोड़ना पड़ा ) ” लीजिए , आपका शहर आ गया , ” पत्नी ने कार का शीशा नीचे करते हुए कहा । कार शहर के बाहरी इलाक़ों से गुज़र रही थी । ” पापा , आप यहीं बड़े हुए थे...

0

हिन्दी साहित्य का बाजारकाल

भरत प्रसाद                                                        नयी सदी, नया जमीन, नयी आकाश, नया लक्ष्य, नयी उम्मीदें, नयी आकांक्षाएँ। यकीनन मौजूदा सदी ने मनुष्य और उसके जीवन के प्रत्येक पहलू को नयेपन की आँधी में उलट-पलट कर रख दिया है। परम्परागत मूल्य, मान्यताएँ, रिवाज, संस्कार और तौर-तरीके विलुप्त प्रजातियों की नियति प्राप्त करने वाले...

0

कविता के नए प्रदेश की नए महत्व की कविताएँ

पुस्तक-समीक्षा शहंशाह आलम हिंदी कविता की नई ज़मीन जिस तेज़ी से बड़ी हो रही है, विकसित हो रही है, यह देखकर कविता के इतिहासकारों को प्रसन्नता ज़रूर होनी चाहिए, कविता के उन इतिहासकारों को, जो कविता-इतिहास-लेखन के समय ईमानदार बने रहते हैं। मेरे विचार से कविता की ऐतिहासिकता इसी बात...

0

राज्यवर्द्धन की नौ कविताएं

कागज की कश्ती कागज की नाव बचपन की अब भी तैर रही है पानी में फर्क सिर्फ इतना है कि उसमें मैं नहीं मेरे बच्चे सवार हैं इसलिए मैं किसी से कागज की कश्ती लौटाने की जिद नहीं करता प्रतीक्षा किसी सुबह आप उठते हैं और बारिश की गंध महसूस...