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भास्कर चौधुरी की दस कविताएं

भास्कर चौधुरी जन्म: 27 अगस्त 1969 रमानुजगंज, सरगुजा (छ.ग.) शिक्षा: एम. ए. (हिंदी एवं अंग्रेजी) बी एड प्रकाशन: एक काव्य संकलन ‘कुछ हिस्सा तो उनका भी है’ एवं गद्य संकलन (यात्रा वृतांत) ‘बस्तर में तीन दिन’ प्रकाशित। लघु पत्रिका ‘संकेत’ का छ्टा अंक कविताओं पर केंद्रित. कविता, संस्मरण, समीक्षा आदि...

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मनोज चौहान की तीन कविताएं

ऐ कविता   दस्तक देना तुम कभी ऐ कविता दिनभर कमर तोड़ चुके ईंट-भठ्ठे के मजदूरों की उन बास छोड़ती झुग्गियों में बीड़ी के धुंएं और सस्ते देशी ठर्रे के घूंट पीकर जो चाहते हैं मिटा देना थकान और चिंताओं को व भीतर उपजती वेदना को भी और बुनते हैं सपनों...

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प्रतिभा चौहान की पांच कविताएं

||हमारे फूल -तुम्हारे नक्शे|| तुम्हें उलझे हुए आदमी हो तुम सुलझा नहीं  सके समय की लट को तुमने नहीं सीखा खुशियों से खेलना तुम्हें नहीं आता सीधे सरल सवालों का जवाब देना तुमने तो यह भी नहीं समझा कि डूबते हुए आदमी को तिनके का सहारा होता है तुमने नहीं...

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘विवशता’

जब सुबह झुनिया वहाँ पहुँची तो बंगला रात की उमस में लिपटा हुआ गर्मी में उबल रहा था । सुबह सात बजे की धूप में तल्ख़ी थी । वह तल्ख़ी उसे मेम साहब की तल्ख़ ज़बान की याद दिला रही थी । बाहरी गेट खोल कर वह जैसे ही अहाते...

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तरसेम कौर की कहानी ‘खूबसूरत घाव’

कहानी एक बड़ा सा आलीशान पुराना घर था। वहाँ चालीस बरस की एक औरत अपने पति,  एक बेटे और एक बेटी के साथ रहती थी। उसके चेहरे पर हमेशा एक मुस्कान धरी रहती थी । सुन्दर सी साड़ी और उससे मैचिंग करती बिंदी और हल्के से गुलाबी रंग की लिपिस्टक...

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सुधीर कुमार सोनी की छह कविताएं

बेमिसाल मुहब्बत पानी के गहरे तल में पत्थर है पत्थर के गहरे तल में पानी है पानी है पत्थर है अटूट प्रेम है यह शायद कोई नहीं जानता कि इनके प्रेम की मिसाल दी जाए धीरे-धीरे कटकर प्रेम में सब कुछ मिटा देना पत्थर के सिवाय कोई नहीं जानता युगों-युगों से...

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मीनू परियानी की कविता ‘मां’

    कष्ट हजारों सहकर,अपनी जान ज़ोखिम में डाल कर     जन्म हमें जो देती है, कोई और होती नहीं     वो औरत  सिर्फ माँ होती है     शक्ल सूरत पर जाती नहीं मेरी, कलेज़े से लगा कर रखती है     अपंग अपाहिज बच्चे को भी,...

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कृष्ण कुमार यादव की पाँच कविताएंं

प्रेयसी छोड़ देता हूँ निढाल अपने को उसकी बाँहों में बालों में अंगुलियाँ फिराते-फिराते हर लिया है हर कष्ट को उसने। एक शिशु की तरह सिमटा जा रहा हूँ उसकी जकड़न में कुछ देर बाद खत्म हो जाता है द्वैत का भाव। गहरी साँसों के बीच उठती-गिरती धड़कनें खामोश हो...

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सुधा चौरसिया की तीन कविताएं

संस्कार के कीड़े! जिया तुमने हजारों साल जिस मिथकीय इतिहास में रेंगता है खून में वह तुम्हारे आज भी निकल नहीं पायी अभी तक तुम अपने आदर्श ‘सीता’ के जाल से बोल लेती हो बहुत लिख भी लेती हो बहुत पर झेलती हो अभी तक उस भीषण आग को मत...

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डॉ छवि निगम की पांच कविताएं

स्वतंत्रता एक भेड़ के पीछे पीछे खड्ढे में गिरती जाती अंधाधुंध पूरी कतार को भाईचारे को मिमियाती पूरी इस कौम इतनी सारी ‘मैं’ हम न हो पायीं जिनकी अब तक, उनको… चंहु ओर होते परिवर्तन से बेखबर चाबुक खाते आधी आँखों पे पड़े  परदे से सच आंकते झिर्री भर साम्यवाद...

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘विरासत’

श्रीकांत जिस दिन अठारह साल का हुआ , उसी दिन उन्मादियों ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिरा दी । देश में जगह-जगह दंगे शुरू हो गए जिनमें निर्दोष लोग मारे जाने लगे । उस दिन श्रीकांत देर तक रेडियो और टी.वी. पर ख़बरें देखता-सुनता रहा । आज़ाद भारत के इतिहास...

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कमलेश भारतीय की चार कविताएं

एक दिन जब थक जाता है तब रात उसे थाम लेती है दिन और रात की सुख और दुख की जुगलबंदी का नाम ही जिंदगी है, मित्रो । दो वसंत तुम आए हो तुम्हारा स्वागत् है पर मैं तुम्हारे फूलों का क्या करूं? किसी शहर में आगजनी किसी में लगा...

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कमलेश भारतीय की चार लघुकथाएं

राजनीति के कान ‘मंत्री जी, आपने बड़ा कहर ढाया है’ ‘किस मामले में भाई ?’ ‘अपने इलाके के एक मास्टर का ट्रांसफर करके’ ‘अरे , वह मास्टर ? वह तो विरोधी दल के लिए भाग दौड़….’ ‘क्या कहते हैं , हुजूर ?’ ‘उस पर यही इल्जाम हैं ।’ ‘जरा चल...

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विजयानन्द विजय की दो लघुकथाएं

पेंटिंग ट्रेन का एसी कोच — जिसमें आम तौर पर सम्पन्न लोग ही यात्रा करते हैं।आमजनों के लिए तो यह शीशे-परदे और बंद दरवाजों के अंदर की वो रहस्यमयी दुनिया है, जिसके बारे में वे जानते तक नहीं हैं। एक परिवार आमने-सामने की छ: सीटों पर अपने पूरे कुनबे के...

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डॉ भावना कुमारी की पांच ग़ज़लें

1 कैसा अपना है ये सफ़र मालिक कुछ न आता है अब नज़र मालिक लूट लाते हैं, कूट खाते हैं कर रहे हैं गुजर -बसर मालिक चोट जब भी लगी है सीने पर टूटने लगती है कमर मालिक आ ही जाता है सबके चेहरे पर बीतती उम्र का असर मालिक...

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संजीव ठाकुर की तीन बाल कविताएं

 दाना दे दो          दाना दे दो चिड़िया को ओ! मेरी नानी और वहीं डालो बर्तन में थोड़ा-सा पानी। आएगी तो खाएगी चिड़ियों की रानी खुश होकर उड़ जाएगी पीकर वह पानी। फिर भेजेगी औरों को वह लेने दाना, पानी खुश हो जाओगी, देखोगी उनको पीते पानी! दीपों का त्योहार दीपों...

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वीणा भाटिया की चार कविताएं

प्रकृति से… 1. नदी की धारा में हाथ डालना छूना महसूस करना कितनी बातें करती है नदी हमसे   जाने कब से है धरती पर कहाँ-कहाँ से गुज़र कर कितने तट कितने रास्ते पार करती बहती जा रही है   सबसे सरल सृजन है बचपन के बनाए चित्रों में जो...

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सपना मांगलिक के दस हाइकू

1 जितना जिया लिखा बस उतना लिखूं क्या आगे ? 2 मन अन्दर दुःख का समंदर उठे क्यूँ ज्वाला ? । 3 चीखे खामोशी द्वंद नाद दिल में सुने न कोई । 4 मति भ्रमित ह्रदय कुरुक्षेत्र खुलें न नेत्र । 5 फूटी रुलाई भरी सूखी जग की ताल तलाई...

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टॉयलेट में घर : दिनेश शर्मा की तीन कविताएं

टॉयलेट में घर (1) जब हम घर की दर्प की दीवारों को कर रहे थे ऊँचा देख रहे थे फर्श के शीशे में अपनी उपलब्धियों का चेहरा खुशियों के आँगन में लगा रहे थे स्वामित्व की बाड़ कपड़ों गाड़ियों मशीनों को सहेजते आत्म मुग्धा में बौराई जब हमारी दुनिया सुलभ...

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निर्मल गुप्त की दो कविताएं

मेरे बचपन का कलकत्ता  कलकत्ता कोलकाता हो गया बचपन स्मृति  लिए बाबा गुलाम रसूल की खुरदरी अंगुली थामे हुगली किनारे आज भी वहाँ हुमकता है. बाबा की सुनाई कहानी के आलसी बौने और उदास मसखरे आज भी फोर्ट विलियम्स में अलगोजे पर उदास धुन बजाते द्वितीय विश्व युद्ध की यादें...