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‘कड़वी हवा’ के बहाने कुछ कड़वी बातें

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव बंजारे लगते हैं मौसम मौसम बेघर होने लगे हैं  जिस देश में हर साल औसतन 12,000 किसान खुदकुशी कर लेते हों, उस देश में मौसम के बेघर हो जाने पर सवाल उठना लाजिमी है। ‘कड़वी हवा’ (रिलीज डेट 24 नवंबर) फिल्म के क्लाइमेक्स पर गुलजार की धीर-गंभीर...

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दो बीघा ज़मीन —किसान पीड़ा का जीवंत दस्तावेज

डॉ संगीता गांधी भारतीय किसान के वास्तविक दर्द को पर्दे पर उकेरने वाली फिल्म थी -दो बीघा जमीन ।’दो बीघा ज़मीन’ हृदय-स्पर्शी और परिष्कृत रूप से एक बेदखल किसान का जीवंत चित्रण है। एक किसान के बहाने देखा जाए, तो यह फ़िल्म सम्पूर्ण भारतीय किसान-समाज का सबसे मानवीय चित्रण प्रस्तुत...

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“नो मीन्स नो”, “नहीं मतलब नहीं”, लड़कों को ना सुनने की आदत डालनी होगी

संदीप श्याम शर्मा “नो मीन्स नो”, “नहीं मतलब नहीं”, लड़की की ना को ना ही मानना। ये बात समझना, लड़कों के लिए ज़रा मुश्किल है, लेकिन ये ही सत्य है, उन किवंदतियों से लड़कों को निकल जाना चाहिए जिनमें कहा जाता है कि “इश्क़ में, इन्कार में भी हाँ छिपा...