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नूर मुहम्मद नूर की पांच ग़ज़लें

एक क्या पता क्यों खुशी सी होती है ज़िन्दगी ज़िन्दगी सी होती है ऐ अंधेरो! अभी जरा ठहरो मुझमें कुछ रौशनी सी होती है किससे पुछूं, कोई बतलाए क्यों? दोस्ती दुश्मनी सी होती है दिल भी घबरा रहा है हैरत से उसमें कुछ आशिक़ी सी होती है कौन बतालाए शायरी...

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मनी यादव की एक ग़ज़ल

तेरी यादों का अभी दिल पर असर बाकी है जो करेंगे साथ में तय वो सफ़र बाकी है यूँ तो अश्क़ों से मुकम्मल हो चुका है दरिया फिर भी दरिया में मुहब्बत की लहर बाकी है कुछ तो डर खुद से या मौला से तू आदम तेरा तुझ पर ही...

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अनिरुद्ध सिन्हा की पांच ग़ज़लें

एक राह की  दुश्वारियों  के रुख  बदलकर देखते जिस्म घायल ही सही कुछ दूर चलकर देखते   नींद में ही मोम बनकर ख़्वाब से की गुफ्तगू दोपहर की  धूप में  थोड़ा  पिघलकर  देखते   कुछ तजुर्बों के  लिए  ही दोस्तो इस दौर में देश की मिट्टी कभी  माथे पे मलकर ...

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डाॅ. अजय पाठक के दस गीत

मजदूर-कटारों की कौन यहाॅ सुनता है हम मजदूर-कहारों की। खून पेर कर, करें पसीना क्या गर्मी-सर्दी हक मांगो तो लाठी मारे हमको ही वर्दी जुल्म जबर झेला करते है हम सरकारों की मेहनत अपनी, हुकुम तुम्हारा मालिक तुम हुक्काम बारह घंटे भठ्ठी झोंके फिर भी नमक हराम! नीयत हम भी...

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शहंशाह आलम की कविता ‘यक्षिणी’

एक यह आकाश जो कोरा है तुम्हारी छुअन की प्रतीक्षा में शताब्दियों-शताब्दियों से   अंतरिक्ष की सीढ़ियाँ पकड़कर अपने यक्षपति से छुप-छुपाकर तुम उतरते हो सखियों के संग-साथ और बादलों को सियाही बनाकर लिखते हो कोरे आकाश पर प्रेम की अमर कथाएँ मेरे लिए   अपार दिनों से पसरा मेरे...

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कृष्ण सुकुमार की सात कविताएं

(1) बचा हुआ हूँ शेष जितना नम आँखों में विदा गीत ! बची हुई है जिजीविषा जितनी किसी की प्रतीक्षा में पदचापों की झूठी आहट ! बची हुई है मुस्कान जितना मुर्झाने से पूर्व फूल ! बचा हुआ है सपना जितना किसी मरणासन्न के मुँह में डाला गंगाजल ! बचा...

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नवनीत शर्मा की पांच ग़ज़लें

एक कुछ मेरा उस पार जिंदा है अभी जब कि ये दीवार जिंदा है अभी मेरी हां मजबूरियों का ढोल है दिल में तो इनकार जि़ंदा है अभी हर तरफ है धुंध नफरत की मगर इस जहां में प्‍यार जिंदा है अभी खुदकुशी कर ली कबीले ने मगर एक अदद...

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सुरेश शर्मा की तीन कविताएं

भयावह दिनों में भरोसे की कविता ( एक ) हम परास्त करेंगे उस काले-दैत्य को ! जो लाल, हरे व भगवा रंगों में आता है और सपनों में मीरा व मरियम को डराता है ताकि हो सके तय कि भरोसा, भय पर भारी है जंग हर लम्हा जारी है….!! (दो)...

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केशव शरण की 15 कविताएं

क्या कहूंगा क्या मैं कह सकूंगा मालिक ने अच्छा नहीं किया अगर किसी ने मेरे सामने माइक कर दिया क्या मैं भी वही कहूंगा जो सभी कह रहे हैं बावजूद सब दुर्दशा के जो वे सह रहे हैं और मैं भी क्या मैं भी यही कहूंगा कि आगे बेहतरीन परिवर्तन...

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ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” की दो लघुकथाएं

अँधा “अरे बाबा ! आप किधर जा रहे है ?,” जोर से चींखते हुए बच्चे ने बाबा को खींच लिया. बाबा खुद को सम्हाल नहीं पाए. जमीन पर गिर गए. बोले ,” बेटा ! आखिर इस अंधे को गिरा दिया.” “नहीं बाबा, ऐसा मत बोलिए ,”बच्चे ने बाबा को हाथ...

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वेद प्रकाश की तीन प्रेम कविताएं

एक लंबी प्रेम कविता तुम धूप में अपने काले लंबे बाल जब-जब सुखाती हो सूरज का सीना फूल जाता है और पूरे आकाश पर छा जाता है मैंने देखा है गुलमुहर के नीचे बस का इंतजार करते हुए बस आए या न आए तुम्हारी छाया गुलमुहर को चटख कर देती...

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डॉ किरण मिश्रा की पांच कविताएं

एक उदास मौसम और गुलाम इच्छाओं की सारी कविताएं भेज दी गईंं प्रश्नों के साथ जबकि जरुरत थी कापते हांथोंं लड़खड़ाते पैरोंं को उनकी कोहालाल में वो कहानियां भी नहीं ठहरीं जिनमे बचा था सच कहना घाटियों ,दर्रों ,पहाड़ियों में घूमती गज़लों ने धूएं की महक सूंघने से किया इंकार...

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समकालीन कविता का महत्वपूर्ण दस्तावेज : दिल्ली की सेल्फी कविता विशेषांक

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव लड़ना था हमें भय, भूख और भ्रष्टाचार के खिलाफ हम हो रहे थे एकजुट आम आदमी के पक्ष में पर उनलोगों को नहीं था मंजूर यह। उन्होंने फेंके कुछ ऐंठे हुए शब्द हमारे आसपास और लड़ने लगे हम आपस में ही! वे मुस्कुरा रहे हैं दूर खड़े...

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अमरजीत कौंके की पांच कविताएं

साहित्य अकादमी, दिल्ली ने पंजाबी के कवि , संपादक और अनुवादक डा. अमरजीत कौंके सहित 23 भाषाओँ के लेखकों को वर्ष 2016 के लिए अनुवाद पुरस्कार देने की घोषणा की है. अमरजीत कौंके को यह पुरस्कार पवन करन की पुस्तक ” स्त्री मेरे भीतर ” के पंजाबी अनुवाद ” औरत मेरे...

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सुधा चौरसिया की तीन कविताएं

संस्कार के कीड़े! जिया तुमने हजारों साल जिस मिथकीय इतिहास में रेंगता है खून में वह तुम्हारे आज भी निकल नहीं पायी अभी तक तुम अपने आदर्श ‘सीता’ के जाल से बोल लेती हो बहुत लिख भी लेती हो बहुत पर झेलती हो अभी तक उस भीषण आग को मत...

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शहंशाह आलम की छह कविताएं

हमला हम गहरे, बेहद गहरे अँधकार भरे युग को जी रहे हैं जिसमें हम प्रेम करते हैं तो हम पर हमले किए जाते हैं एक सफल हत्या एक सफल बलात्कार के लिए सम्मानित अब उनके शब्दों के वर्ण विन्यास, अर्थ, प्रयोग, व्युपत्ति, पर्याय यही थे कि उन्हें भेड़ों के साथ...

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सय्यदैन ज़ैदी की कविता ‘वो जो है ख़्वाब सा…’

वो जो है ख्वाब सा ख़याल सा धड़कन सा सिरहन सा सोंधी खुशबू सा नर्म हवाओं सा सर्द झोकों सा मद्धम सी रौशनी सा लहराती सी बर्क़ सा बिस्तर की सिलवटों सा बाहों में लिपटे तकिए सा जिस्म की बेतरतीब चादर सा सुबहों की ख़ुमारी सा शाम की बेक़रारी सा...

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विजय ‘आरोहण’ की नौ कविताएं

सारंडा, जंगल और आदिवासी,जल, जंगम और प्रतिरोध की कवितायें 1. हमारे पहाड़ों के बच्चे हमारे पहाड़ों के बच्चे गिल्ली-डंडा खेलते है वह छुप्पम-छुपाई खेलते शाल के पेड़ों के पीछे छिप जाते हैं वह तीर-धनुषों से निशाना साध रहे हैं इसके लिए वह एक बिजुका बनाते हैं और दनदनाती आती है...

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डॉ भावना कुमारी की पांच ग़ज़लें

1 कैसा अपना है ये सफ़र मालिक कुछ न आता है अब नज़र मालिक लूट लाते हैं, कूट खाते हैं कर रहे हैं गुजर -बसर मालिक चोट जब भी लगी है सीने पर टूटने लगती है कमर मालिक आ ही जाता है सबके चेहरे पर बीतती उम्र का असर मालिक...

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सपना मांगलिक के दस हाइकू

1 जितना जिया लिखा बस उतना लिखूं क्या आगे ? 2 मन अन्दर दुःख का समंदर उठे क्यूँ ज्वाला ? । 3 चीखे खामोशी द्वंद नाद दिल में सुने न कोई । 4 मति भ्रमित ह्रदय कुरुक्षेत्र खुलें न नेत्र । 5 फूटी रुलाई भरी सूखी जग की ताल तलाई...