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पल्लवी मिश्रा की दो कविताएं

  पल्लवी मिश्रा असिस्टेंट प्रोफेसर राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, डोईवाला, देहरादून एक पन्नों पर कलम दर्ज़ करती है, दिनों की बर्खास्तगी रातों के बदलते मायने, पन्नों की तारीखें बयाँ करती हैं – दिनों के दस्तावेज़ो में कमतर होती रोशनी और महसूस होती है कलम की मायूसी l पन्नों पर बने फूल,चिड़ियाँ,तारे...

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दीप्ति शर्मा की पांच कविताएं

दीप्ति शर्मा दिल्ली काले तिल वाली लड़की कल तुम जिससे मिलीं फोन आया था वहाँ से तुम तिल भूल आयी हो सुनो लडकियो! ये तिल बहुत आवारा होते हैं चन्द्र ग्रहण की तरह काला तिल आनाज नहीं होता ये पूरी दुनिया होता है जिससे मिलो सँभल कर मिलो ये मिलना...

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जया यशदीप घिल्डियाल की तीन कविताएं

जया यशदीप घिल्डियाल मूल निवासी – पौड़ी गढ़वाल ,उत्तराखंड स्नातकोत्तर रसायन विज्ञान रसायन विज्ञान अध्यापिका पुणे ,महाराष्ट्र कातिलों के बच्चे कातिलों  के बच्चे  उम्र  भर कत्ल  होते हैं सहम जाते लोकल अखबारों  से , खाकी वर्दी से दरवाज़े पर इक हल्की सी भी आहट दहला देती उन्हें घर में आँखों...

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विष्णु कुमार की कहानी ‘भैंस चोर’

रात का अंधेरा चारों तरफ, फैल चुका था, गांव के सभी लोग सो चुके थे।…चारों तरफ झींगुरों और मेंढकों की आवांजें गूंज रही थीं। मैं भी अपनी चारपाई पर गहरी नींद में सो रहा था, लेकिन मेरी आदत है कि सोने से पहले पानी न पी लूं तो रात को...

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भास्कर चौधुरी की दस कविताएं

भास्कर चौधुरी पता : 1 / बी / 83,        बालको        जिला : कोरबा (छ.ग.)        495684        मोबाइल न. : 9098400682 Bhaskar.pakhi009 @gmail.com परिचय जन्म: 27 अगस्त 1969 रमानुजगंज, सरगुजा (छ.ग.) शिक्षा: एम. ए. (हिंदी एवं अंग्रेजी) बी एड प्रकाशन: एक काव्य संकलन ‘कुछ हिस्सा तो उनका भी...

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सुरेंद्र भसीन की चार कविताएं

सुरेन्द्र भसीन पेशे से एकाउंटेंट, कई निजी  कंपनियों में काम किया। पता के 1/19A, न्यू पालम  विहार, गुड़गांंव, हरियाणा मो-9899034323 मेरी बेटी /सबकी बेटी मैं जब भी अपनी बीवी की आँखों में देखता हूँ उसमें मेरी बेटी का चेहरा नजर आता है। जो बड़ी होकर अपने पति को जैसे बड़ी उम्मीद से याचक होकर निहार रही है तो मैं बिगड़ नहीं पाता हूँ वहीं ढीला पड़ जाता हूँ। क्रोध नहीं कर पाता उबलता दूध जैसे छाछ हो जाता है. हाथ-पांव शरीर और दिल अवश होकर जकड़ में आ जाता है और आये दिन अख़बारों में पढ़े अच्छे-बुरे समाचारों की सुर्खियाँ याद आ-आकर मुझे दहलाने लगती हैँ। और मेरी पाशविक जिदें, नीच चाहतें बहुत घिनौनी और बौनी होकर मेरा मुँह  चिढ़ाने लगती है। कोई भला ऐसे में कैसे अपने परिवार को भूल अपनी बेटी के भावी सुखों को नजरअंदाज कर अपना सुख चाहता है ? वह ऐसा बबूल कैसे बो सकता है जिसे काटने की सोचते ही उसका कलेजा मुँह  को आता है? तभी जब मैं कुछ कहने को होता हूँ...

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मनी यादव की एक ग़ज़ल

टूटे मकाँ में रहता तो गुलदान बुरा है ग़ुरबत में मुहब्बत का भी अंजाम बुरा है भूखा था वो मासूम जिसे चोर कहा तुमने खुद का तेरा भी झांक गिरेबान बुरा है था आसरा मुझको भी बहुत अच्छे दिनों का अच्छा भी सियासत में तो पैगाम बुरा है कोशिश न...

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राकेश रोहित की सात कविताएं

जब सब लौट जायेंगे सब जब घर लौट जायेंगे मैं कहाँ जाऊंगा इतनी बड़ी दुनिया में नहीं है मेरा कोई वृक्ष! मेरे जीवन में कुछ कलरव की स्मृतियाँ हैं और एक पुराने स्कूल की जिसकी दीवार ढह गयी थी मास्टर जी की पीठ पर छुट्टी का घंटा बजने पर जहाँ...

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अंजना वाजपेई की कविता ‘ये शेष रह जाएंगे’

कुछ गोलियों की आवाजें बम के धमाके , फैल जाती है खामोशी …नहीं, यह खामोशी नहीं सुहागिनों का ,बच्चों का, मां बाप का करूण विलाप है, मूक रूदन है प्रकृति का , धरती का ,आकाश का …..जलेंगी चिताएं और विलीन हो जायेंगे शरीर जो सिर्फ शरीर ही नहीं प्यार है...

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नूर मुहम्मद नूर की पांच ग़ज़लें

एक क्या पता क्यों खुशी सी होती है ज़िन्दगी ज़िन्दगी सी होती है ऐ अंधेरो! अभी जरा ठहरो मुझमें कुछ रौशनी सी होती है किससे पुछूं, कोई बतलाए क्यों? दोस्ती दुश्मनी सी होती है दिल भी घबरा रहा है हैरत से उसमें कुछ आशिक़ी सी होती है कौन बतालाए शायरी...

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मनी यादव की एक ग़ज़ल

तेरी यादों का अभी दिल पर असर बाकी है जो करेंगे साथ में तय वो सफ़र बाकी है यूँ तो अश्क़ों से मुकम्मल हो चुका है दरिया फिर भी दरिया में मुहब्बत की लहर बाकी है कुछ तो डर खुद से या मौला से तू आदम तेरा तुझ पर ही...

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अनिरुद्ध सिन्हा की पांच ग़ज़लें

एक राह की  दुश्वारियों  के रुख  बदलकर देखते जिस्म घायल ही सही कुछ दूर चलकर देखते   नींद में ही मोम बनकर ख़्वाब से की गुफ्तगू दोपहर की  धूप में  थोड़ा  पिघलकर  देखते   कुछ तजुर्बों के  लिए  ही दोस्तो इस दौर में देश की मिट्टी कभी  माथे पे मलकर ...

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डाॅ. अजय पाठक के दस गीत

मजदूर-कटारों की कौन यहाॅ सुनता है हम मजदूर-कहारों की। खून पेर कर, करें पसीना क्या गर्मी-सर्दी हक मांगो तो लाठी मारे हमको ही वर्दी जुल्म जबर झेला करते है हम सरकारों की मेहनत अपनी, हुकुम तुम्हारा मालिक तुम हुक्काम बारह घंटे भठ्ठी झोंके फिर भी नमक हराम! नीयत हम भी...

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शहंशाह आलम की कविता ‘यक्षिणी’

एक यह आकाश जो कोरा है तुम्हारी छुअन की प्रतीक्षा में शताब्दियों-शताब्दियों से   अंतरिक्ष की सीढ़ियाँ पकड़कर अपने यक्षपति से छुप-छुपाकर तुम उतरते हो सखियों के संग-साथ और बादलों को सियाही बनाकर लिखते हो कोरे आकाश पर प्रेम की अमर कथाएँ मेरे लिए   अपार दिनों से पसरा मेरे...

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कृष्ण सुकुमार की सात कविताएं

(1) बचा हुआ हूँ शेष जितना नम आँखों में विदा गीत ! बची हुई है जिजीविषा जितनी किसी की प्रतीक्षा में पदचापों की झूठी आहट ! बची हुई है मुस्कान जितना मुर्झाने से पूर्व फूल ! बचा हुआ है सपना जितना किसी मरणासन्न के मुँह में डाला गंगाजल ! बचा...

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नवनीत शर्मा की पांच ग़ज़लें

एक कुछ मेरा उस पार जिंदा है अभी जब कि ये दीवार जिंदा है अभी मेरी हां मजबूरियों का ढोल है दिल में तो इनकार जि़ंदा है अभी हर तरफ है धुंध नफरत की मगर इस जहां में प्‍यार जिंदा है अभी खुदकुशी कर ली कबीले ने मगर एक अदद...

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सुरेश शर्मा की तीन कविताएं

भयावह दिनों में भरोसे की कविता ( एक ) हम परास्त करेंगे उस काले-दैत्य को ! जो लाल, हरे व भगवा रंगों में आता है और सपनों में मीरा व मरियम को डराता है ताकि हो सके तय कि भरोसा, भय पर भारी है जंग हर लम्हा जारी है….!! (दो)...

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केशव शरण की 15 कविताएं

क्या कहूंगा क्या मैं कह सकूंगा मालिक ने अच्छा नहीं किया अगर किसी ने मेरे सामने माइक कर दिया क्या मैं भी वही कहूंगा जो सभी कह रहे हैं बावजूद सब दुर्दशा के जो वे सह रहे हैं और मैं भी क्या मैं भी यही कहूंगा कि आगे बेहतरीन परिवर्तन...

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ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” की दो लघुकथाएं

अँधा “अरे बाबा ! आप किधर जा रहे है ?,” जोर से चींखते हुए बच्चे ने बाबा को खींच लिया. बाबा खुद को सम्हाल नहीं पाए. जमीन पर गिर गए. बोले ,” बेटा ! आखिर इस अंधे को गिरा दिया.” “नहीं बाबा, ऐसा मत बोलिए ,”बच्चे ने बाबा को हाथ...

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वेद प्रकाश की तीन प्रेम कविताएं

एक लंबी प्रेम कविता तुम धूप में अपने काले लंबे बाल जब-जब सुखाती हो सूरज का सीना फूल जाता है और पूरे आकाश पर छा जाता है मैंने देखा है गुलमुहर के नीचे बस का इंतजार करते हुए बस आए या न आए तुम्हारी छाया गुलमुहर को चटख कर देती...