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मनोज चौहान की तीन कविताएं

ऐ कविता   दस्तक देना तुम कभी ऐ कविता दिनभर कमर तोड़ चुके ईंट-भठ्ठे के मजदूरों की उन बास छोड़ती झुग्गियों में बीड़ी के धुंएं और सस्ते देशी ठर्रे के घूंट पीकर जो चाहते हैं मिटा देना थकान और चिंताओं को व भीतर उपजती वेदना को भी और बुनते हैं सपनों...

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘विवशता’

जब सुबह झुनिया वहाँ पहुँची तो बंगला रात की उमस में लिपटा हुआ गर्मी में उबल रहा था । सुबह सात बजे की धूप में तल्ख़ी थी । वह तल्ख़ी उसे मेम साहब की तल्ख़ ज़बान की याद दिला रही थी । बाहरी गेट खोल कर वह जैसे ही अहाते...

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मीनू परियानी की लघुकथा ‘मज़बूरी’

आज राधा को कुछ ज्यादा ही देर हो गयी थी मै दो बार बाहर जा कर देख आई थी पर उसका दूर दूर तक पता नही था. राधा मेरी कामवाली बाई थी जो कभी कभी अपनी बेटी को भी काम पर ले आती थी। रानी उसकी बेटी जिसकी उसने छोटी उम्र में...

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हाशिेए पर अब और नहीं

महिला दिवस पर विशेष डाॅ. मृणालिका ओझा अगस्त सन् 1910 में अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाना तय हो चुका था। महिलाओं को समानता, अधिकार व सम्मान प्राप्त हो सके इसके लिए कोपेन हेगेन में कुछ समाजवादी राष्ट्रों के सम्मेलन में इसे तय किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य सामाजिक रूप से...

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आकांक्षा यादव की तीन कविताएँ 

21वीं सदी की बेटी जवानी की दहलीज पर कदम रख चुकी बेटी को माँ ने सिखाये उसके कर्तव्य ठीक वेैसे ही जैसे सिखाया था उनकी माँ ने पर उन्हें क्या पता ये इक्कीसवीं सदी की बेटी है जो कर्तव्यों की गठरी ढोते-ढोते अपने आँसुओं को चुपचाप पीना नहीं जानती है...

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कमलेश भारतीय की चार कविताएं

एक दिन जब थक जाता है तब रात उसे थाम लेती है दिन और रात की सुख और दुख की जुगलबंदी का नाम ही जिंदगी है, मित्रो । दो वसंत तुम आए हो तुम्हारा स्वागत् है पर मैं तुम्हारे फूलों का क्या करूं? किसी शहर में आगजनी किसी में लगा...

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दिनेश शर्मा की दो कविताएं

अशुद्धियों का विधान बच्चा लेता है जन्म किलकारियों के पालने में सूतक घर हो जाता अशुद्ध। एक अर्थी उठती है शोक में डूबा चीखों, आंसूओं व रुंदन का पातक घर अशुद्ध। यौवना सृजन की सम्भावनाओं में खिली हुई मास-दर-मास चढ़ा दी जाती अशुद्धता की सूली। शरीर के अपने ही अंगों...

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रेखा श्रीवास्तव की कविता ‘पुरुष’

कविता लिखना है सोच रही हूँ कि क्या लिखूँ न जाने क्यों सबसे पहले औरत, लड़की और उससे जुड़े मामले ही मन में आते हैं फिर सोचती हूँ कि बहुत लिखा हमने औरतों पर, बहुत चर्चा कर ली हमने लड़कियों पर उनकी आदतों पर, आचरणों पर उनकी बंदिशों पर, उनके...

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कमलेश भारतीय की चार लघुकथाएं

राजनीति के कान ‘मंत्री जी, आपने बड़ा कहर ढाया है’ ‘किस मामले में भाई ?’ ‘अपने इलाके के एक मास्टर का ट्रांसफर करके’ ‘अरे , वह मास्टर ? वह तो विरोधी दल के लिए भाग दौड़….’ ‘क्या कहते हैं , हुजूर ?’ ‘उस पर यही इल्जाम हैं ।’ ‘जरा चल...

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रेखा श्रीवास्तव की कविता ‘एक स्त्री की दिनचर्या’

एक स्त्री की  दिनचर्या पिछले कई दिनों लड़ाई चल रही है एक स्त्री और एक पत्नी के बीच स्त्री ने कसम खाई है कि वह अपनी आत्मरक्षा, सम्मान के लिए अब नहीं झुकेगी पत्नी का दिल पिघलता है, वैसे ही जैसे पिघलता  आ रहा है कई सालों से अपने दर्द...

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लड़की : सुशील कुमार की पांच कविताएं

एक लड़की के रूप की रजनीगंघा खिली है अभी-अभी उमंग जगी है उसमें अभी-अभी जीवन का रंग चटका है वहाँ अभी–अभी   जरूर उसका मकरंद पुरखों के संस्कार माँ की ममता, पिता के साहस भाई के पसीने और दादी-नानी के दुलार से बना होगा   देखो, कितना टटका दिख रहा वह फूल...

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प्रतिभा चौहान की पांच कविताएं

आज का दिन शताब्दियों ने लिखी है आज अपने वर्तमान की आखिरी पंक्ति आज का दिन व्यर्थ नहीं होगा चुप नहीं रहगी पेड़ पर चिड़िया न खामोश रहेंगी पेड़ों की टहनियाँ न प्यासी गर्म हवा संगीत को पियेगी न धरती की छाती ही फटेगी अंतहीन शुष्कता में न मुरझायेंगे हलों...

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘कबीरदास’

यह काल्पनिक कहानी नहीं है , सच्ची घटना है । पिछले साल गर्मी की छुट्टियों में मैं अपने मामा के यहाँ रहने के लिए आया । वहीं मामाजी ने मुझे यह सत्य-कथा सुनाई । पिछले कई सालों से शहर के इलाक़े रामपुरा शरीफ़ में एक अर्द्ध-विक्षिप्त बूढ़ा भटकता हुआ दिख...

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‘पिंक’ से दो कदम आगे है ‘पार्च्ड’

संदीप श्याम शर्मा “पार्च्ड” का मतलब बंजर, शुष्क, जला हुआ, भुना हुआ, सूखा आदि है लेकिन लीना यादव द्वारा लिखित-निर्देशित यह फ़िल्म इतनी हरी-भरी और ख़ूूबसूरत है कि अंत तक आते-आते सबकी बांछे खिल उठेंगी, हर तरफ़ हरियाली दिखाई देगी। सभी किरदार अपनी-अपनी कहानी लेकर चलते हैं, आगे बढ़ते हैं...

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महावीर राजी की कहानी ‘पंच’

रेलवे स्टेशन के गर्भ से नाल की तरह निकल कर ऐश्वर्या राय की कमर की तरह छुई मुई सी “स्टेशन सरणी ” शहर के बीचों बीच से गुजरने वाले अजगरनुमा ‘शेर शाह सूरी मार्ग ‘ को जिस स्थान पर लम्बवत क्रॉस करती आगे बढ़ जाती है, वह जगह शहर के...

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सुप्रिया सिन्हा की दो कविताएं

 माँ     मुझे    आने    तो  दे माँ   मैं  एक   कली   हूँ फूल  बनकर अपनी ‘खुशबू’ बिखेरने   तो   दे,,,,,, माँ,, मैं  एक  नन्हीं सी पंछी हूँ खुली  सृष्टि में अपने स्वप्नों का पंख  फैलाने  तो  दे । माँ  मुझे आने तो दे । मैं ही बहन,, मैं ही बेटी हर रूप में ...

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बेटा, बेटी और बख्शीश

शैलेंद्र सिंह ऑपरेशन थिएटर में ऑपरेशन चल रहा है , बाहर परिजन आशंकित है | ऐसे में कोई आ के कह दे, जच्चा और बच्चा दोनों सुरक्षित हैं तो, चेहरे खिल उठते हैं | परिजन अब लालायित हैं ये जानने के लिए कि  लड़का है या लड़की | ओ० टी०के...

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आरती तिवारी की तीन कविताएं

आरती तिवारी छाले माँ आँतों में छाले पाले जाने कैसे जीती रही बरसों हथेली में उगाती रही सरसों हम रहे अनभिज्ञ उसकी खामोश कराहों से दर्द फूलता रहा खमीर सा वो चढ़ाये रहती खोखली हँसी की परतें माँ का जिन्दा होना ही आश्वस्ति थी,हमारी खुशियों की हमारे लिए ही वो...