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मीनू परियानी की लघुकथा ‘कन्यापूजन’

  मीनू परियानी कल ही बड़ी बहू को चेक अप के लिए हॉस्पिटल ले गये थे , डॉक्टर ने बड़ी मुश्किल  से हाँ की थी, लिंग परीक्षण कानूनन अपराध जो था आजकल . एक पोती पहले से ही थी इसलिए सेठ जी इस बार पोता ही चाहते थे. रिपोर्ट और डॉक्टर...

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भावना सिन्हा की तीन कविताएं

  डॉ भावना सिन्हा जन्म तिथि -19 जुलाई शिक्षा – पीएचडी (अर्थशास्त्र ) निवास – गया ,बिहार ईमेल — sbhawana190@ gmail.com प्रकाशित कृतियां– यथावत, अंतिम जन, पुस्तक संस्कृति आदि कुछ पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित । 1. पांच बज गए पांच बज गएअभी तक नहीं आए पापा पापा  अब तक क्यों नहीं आएकहीं...

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दीप्ति शर्मा की पांच कविताएं

दीप्ति शर्मा दिल्ली काले तिल वाली लड़की कल तुम जिससे मिलीं फोन आया था वहाँ से तुम तिल भूल आयी हो सुनो लडकियो! ये तिल बहुत आवारा होते हैं चन्द्र ग्रहण की तरह काला तिल आनाज नहीं होता ये पूरी दुनिया होता है जिससे मिलो सँभल कर मिलो ये मिलना...

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जया यशदीप घिल्डियाल की तीन कविताएं

जया यशदीप घिल्डियाल मूल निवासी – पौड़ी गढ़वाल ,उत्तराखंड स्नातकोत्तर रसायन विज्ञान रसायन विज्ञान अध्यापिका पुणे ,महाराष्ट्र कातिलों के बच्चे कातिलों  के बच्चे  उम्र  भर कत्ल  होते हैं सहम जाते लोकल अखबारों  से , खाकी वर्दी से दरवाज़े पर इक हल्की सी भी आहट दहला देती उन्हें घर में आँखों...

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सुरेंद्र भसीन की चार कविताएं

सुरेन्द्र भसीन पेशे से एकाउंटेंट, कई निजी  कंपनियों में काम किया। पता के 1/19A, न्यू पालम  विहार, गुड़गांंव, हरियाणा मो-9899034323 मेरी बेटी /सबकी बेटी मैं जब भी अपनी बीवी की आँखों में देखता हूँ उसमें मेरी बेटी का चेहरा नजर आता है। जो बड़ी होकर अपने पति को जैसे बड़ी उम्मीद से याचक होकर निहार रही है तो मैं बिगड़ नहीं पाता हूँ वहीं ढीला पड़ जाता हूँ। क्रोध नहीं कर पाता उबलता दूध जैसे छाछ हो जाता है. हाथ-पांव शरीर और दिल अवश होकर जकड़ में आ जाता है और आये दिन अख़बारों में पढ़े अच्छे-बुरे समाचारों की सुर्खियाँ याद आ-आकर मुझे दहलाने लगती हैँ। और मेरी पाशविक जिदें, नीच चाहतें बहुत घिनौनी और बौनी होकर मेरा मुँह  चिढ़ाने लगती है। कोई भला ऐसे में कैसे अपने परिवार को भूल अपनी बेटी के भावी सुखों को नजरअंदाज कर अपना सुख चाहता है ? वह ऐसा बबूल कैसे बो सकता है जिसे काटने की सोचते ही उसका कलेजा मुँह  को आता है? तभी जब मैं कुछ कहने को होता हूँ...

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भास्कर चौधुरी की दस कविताएं

भास्कर चौधुरी जन्म: 27 अगस्त 1969 रमानुजगंज, सरगुजा (छ.ग.) शिक्षा: एम. ए. (हिंदी एवं अंग्रेजी) बी एड प्रकाशन: एक काव्य संकलन ‘कुछ हिस्सा तो उनका भी है’ एवं गद्य संकलन (यात्रा वृतांत) ‘बस्तर में तीन दिन’ प्रकाशित। लघु पत्रिका ‘संकेत’ का छ्टा अंक कविताओं पर केंद्रित. कविता, संस्मरण, समीक्षा आदि...

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डाॅ. मृणालिका ओझा की कहानी ‘पिता, जाने के बाद’

  उस वक्त भैया गए थे, पिता जी के साथ, उनके अंतिम प्रवास पर। नाव पर नाविक भी था और जीजा जी भी। आज बीच संगम, नदियों के मंझधार, वे पिताजी को पूरी तरह छोड़ आएंगे। अब वे पिताजी की अत्यधिक पानी खर्चने की आदत से परेशान नहीं होंगे। बीच...

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अंजना वाजपेई की कविता ‘ये शेष रह जाएंगे’

कुछ गोलियों की आवाजें बम के धमाके , फैल जाती है खामोशी …नहीं, यह खामोशी नहीं सुहागिनों का ,बच्चों का, मां बाप का करूण विलाप है, मूक रूदन है प्रकृति का , धरती का ,आकाश का …..जलेंगी चिताएं और विलीन हो जायेंगे शरीर जो सिर्फ शरीर ही नहीं प्यार है...

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मनोज चौहान की तीन कविताएं

ऐ कविता   दस्तक देना तुम कभी ऐ कविता दिनभर कमर तोड़ चुके ईंट-भठ्ठे के मजदूरों की उन बास छोड़ती झुग्गियों में बीड़ी के धुंएं और सस्ते देशी ठर्रे के घूंट पीकर जो चाहते हैं मिटा देना थकान और चिंताओं को व भीतर उपजती वेदना को भी और बुनते हैं सपनों...

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘विवशता’

जब सुबह झुनिया वहाँ पहुँची तो बंगला रात की उमस में लिपटा हुआ गर्मी में उबल रहा था । सुबह सात बजे की धूप में तल्ख़ी थी । वह तल्ख़ी उसे मेम साहब की तल्ख़ ज़बान की याद दिला रही थी । बाहरी गेट खोल कर वह जैसे ही अहाते...

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मीनू परियानी की लघुकथा ‘मज़बूरी’

आज राधा को कुछ ज्यादा ही देर हो गयी थी मै दो बार बाहर जा कर देख आई थी पर उसका दूर दूर तक पता नही था. राधा मेरी कामवाली बाई थी जो कभी कभी अपनी बेटी को भी काम पर ले आती थी। रानी उसकी बेटी जिसकी उसने छोटी उम्र में...

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हाशिेए पर अब और नहीं

महिला दिवस पर विशेष डाॅ. मृणालिका ओझा अगस्त सन् 1910 में अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाना तय हो चुका था। महिलाओं को समानता, अधिकार व सम्मान प्राप्त हो सके इसके लिए कोपेन हेगेन में कुछ समाजवादी राष्ट्रों के सम्मेलन में इसे तय किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य सामाजिक रूप से...

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आकांक्षा यादव की तीन कविताएँ 

21वीं सदी की बेटी जवानी की दहलीज पर कदम रख चुकी बेटी को माँ ने सिखाये उसके कर्तव्य ठीक वेैसे ही जैसे सिखाया था उनकी माँ ने पर उन्हें क्या पता ये इक्कीसवीं सदी की बेटी है जो कर्तव्यों की गठरी ढोते-ढोते अपने आँसुओं को चुपचाप पीना नहीं जानती है...

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कमलेश भारतीय की चार कविताएं

एक दिन जब थक जाता है तब रात उसे थाम लेती है दिन और रात की सुख और दुख की जुगलबंदी का नाम ही जिंदगी है, मित्रो । दो वसंत तुम आए हो तुम्हारा स्वागत् है पर मैं तुम्हारे फूलों का क्या करूं? किसी शहर में आगजनी किसी में लगा...

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दिनेश शर्मा की दो कविताएं

अशुद्धियों का विधान बच्चा लेता है जन्म किलकारियों के पालने में सूतक घर हो जाता अशुद्ध। एक अर्थी उठती है शोक में डूबा चीखों, आंसूओं व रुंदन का पातक घर अशुद्ध। यौवना सृजन की सम्भावनाओं में खिली हुई मास-दर-मास चढ़ा दी जाती अशुद्धता की सूली। शरीर के अपने ही अंगों...

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रेखा श्रीवास्तव की कविता ‘पुरुष’

कविता लिखना है सोच रही हूँ कि क्या लिखूँ न जाने क्यों सबसे पहले औरत, लड़की और उससे जुड़े मामले ही मन में आते हैं फिर सोचती हूँ कि बहुत लिखा हमने औरतों पर, बहुत चर्चा कर ली हमने लड़कियों पर उनकी आदतों पर, आचरणों पर उनकी बंदिशों पर, उनके...

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कमलेश भारतीय की चार लघुकथाएं

राजनीति के कान ‘मंत्री जी, आपने बड़ा कहर ढाया है’ ‘किस मामले में भाई ?’ ‘अपने इलाके के एक मास्टर का ट्रांसफर करके’ ‘अरे , वह मास्टर ? वह तो विरोधी दल के लिए भाग दौड़….’ ‘क्या कहते हैं , हुजूर ?’ ‘उस पर यही इल्जाम हैं ।’ ‘जरा चल...

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रेखा श्रीवास्तव की कविता ‘एक स्त्री की दिनचर्या’

एक स्त्री की  दिनचर्या पिछले कई दिनों लड़ाई चल रही है एक स्त्री और एक पत्नी के बीच स्त्री ने कसम खाई है कि वह अपनी आत्मरक्षा, सम्मान के लिए अब नहीं झुकेगी पत्नी का दिल पिघलता है, वैसे ही जैसे पिघलता  आ रहा है कई सालों से अपने दर्द...

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लड़की : सुशील कुमार की पांच कविताएं

एक लड़की के रूप की रजनीगंघा खिली है अभी-अभी उमंग जगी है उसमें अभी-अभी जीवन का रंग चटका है वहाँ अभी–अभी   जरूर उसका मकरंद पुरखों के संस्कार माँ की ममता, पिता के साहस भाई के पसीने और दादी-नानी के दुलार से बना होगा   देखो, कितना टटका दिख रहा वह फूल...

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प्रतिभा चौहान की पांच कविताएं

आज का दिन शताब्दियों ने लिखी है आज अपने वर्तमान की आखिरी पंक्ति आज का दिन व्यर्थ नहीं होगा चुप नहीं रहगी पेड़ पर चिड़िया न खामोश रहेंगी पेड़ों की टहनियाँ न प्यासी गर्म हवा संगीत को पियेगी न धरती की छाती ही फटेगी अंतहीन शुष्कता में न मुरझायेंगे हलों...