दिनेश शर्मा की दो कविताएं

अशुद्धियों का विधान बच्चा लेता है जन्म किलकारियों के पालने में सूतक घर हो जाता अशुद्ध। एक अर्थी उठती है शोक में डूबा चीखों, आंसूओं व रुंदन का पातक घर अशुद्ध। यौवना सृजन की सम्भावनाओं में खिली हुई मास-दर-मास चढ़ा दी जाती अशुद्धता की सूली। शरीर के अपने ही अंगों...