Tagged: Delhi

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विजय ‘आरोहण’ की नौ कविताएं

सारंडा, जंगल और आदिवासी,जल, जंगम और प्रतिरोध की कवितायें 1. हमारे पहाड़ों के बच्चे हमारे पहाड़ों के बच्चे गिल्ली-डंडा खेलते है वह छुप्पम-छुपाई खेलते शाल के पेड़ों के पीछे छिप जाते हैं वह तीर-धनुषों से निशाना साध रहे हैं इसके लिए वह एक बिजुका बनाते हैं और दनदनाती आती है...

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तन्वी सिंह की कहानी ‘छोटी सी मुलाक़ात’

आज अगर लास्ट मेट्रो मिल जाए बस। कल से कैसे भी जल्दी निकालूँगा। चाहे साला बॉस कुछ भी कहे। लोग वैलेंटाइन वीक मनाने में बिज़ी है। हम साला गर्ल्फ़्रेंड की जगह बॉस को पटा रहे है। ज़िन्दगी ही ख़राब है। दीपक मन ही बड़बड़ता और भागता हुआ मेट्रो स्टेशन के...

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पंकज चौधरी की चार कविताएं

दिल्ली दिल्ली में समाज नहीं है दिल्ली में व्यक्ति ही व्यक्ति है दिल्ली में राम का नाम नहीं है दिल्ली में सुबह और शाम काम ही काम है दिल्ली में श्रम का दाम नहीं है दिल्ली में श्रम ही श्रम है दिल्ली में प्यार नहीं है दिल्ली में तिज़ारत ही...

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प्रवीण कुमार की दो कविताएं

पेंसिल, कलम, गुलाब वाले बच्चे ‘क’ से कलम नहीं जानता वह ‘प’ से पेंसिल मायने भी नहीं समझता शायद गुलाब जैसा खुद रहा होगा कभी शायद जन्म लेने के वक्त या कुछ महीनों बाद तक पर अब हो गया है सूखकर कांटे जैसा स्कूल का मुंह नहीं देखा लेकिन कर...

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महावीर राजी की कहानी ‘पंच’

रेलवे स्टेशन के गर्भ से नाल की तरह निकल कर ऐश्वर्या राय की कमर की तरह छुई मुई सी “स्टेशन सरणी ” शहर के बीचों बीच से गुजरने वाले अजगरनुमा ‘शेर शाह सूरी मार्ग ‘ को जिस स्थान पर लम्बवत क्रॉस करती आगे बढ़ जाती है, वह जगह शहर के...

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जंतर तो है पर मंतर अब काम नहीं करता

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव दिल्ली होने का मतलब क्या है? सत्ता का केंद्र? ताक़त और पॉवर का गलियारा या इसी सत्ता के लिए बार-बार रक्तरंजित होने वाली एक बेबस-लाचार नगरी? या फिर बार-बार उजड़ कर बस जाने के हौसले का नाम है दिल्ली? अगर ये हौसले का नाम है तो फिर...

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राज्यवर्द्धन की चार कविताएं

पक्ष जो लेखक,कलाकार,वैज्ञानिक,अधिकारी उद्योगपति एवं बुद्धिजीवी हिन्दू हैं और हमारे पक्ष में नहीं हैं वे कम्युनिस्ट हैं या फिर दरबारी हैं कांग्रेस के …और जो मुस्लिम हैं हमारे पक्ष में नहीं हैं वे पाकिस्तानी हैं सिर्फ मेरी ही विचारधारा देश की सभ्यता से जुड़ी है पवित्र है देश की संस्कृति...

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इस संसार को देखने की समझ देती कविताएँ

पुस्तक-समीक्षा शहंशाह आलम हर कवि अपने समय को गहराई में जाकर सुनता है, तब अपने सुने हुए समय को एकदम विलक्षण प्रकट करता है। सच्चाई यही है, कवि के समय में जो कुछ घटित हुआ होता है, हर कवि उसी घटे हुए के प्रभाव में होता हुआ ख़ुद को रचनारत...

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सुशांत सुप्रिय की तीन कविताएं

सुशांत सुप्रिय इस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं देह में फाँस-सा यह समय है जब अपनी परछाईं भी संदिग्ध है ‘ हमें बचाओ , हम त्रस्त हैं ‘ — घबराए हुए लोग चिल्ला रहे हैं किंतु दूसरी ओर केवल एक रेकॉर्डेड आवाज़ उपलब्ध है — ‘ इस रूट की...