Tagged: DEMOCRACY

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मार्टिन जॉन की दो कविताएं

मैं ईश्वर की शपथ लेता हूँ   उसने शपथ ली , “मैं ईश्वर की शपथ लेता हूँ ……….” और वह राजा बन गया   इसके पहले मज़हबी क़िताबों की कसमें खा चुका है कई कांडों को सरअंजाम देने के मामले में .   ईश्वर सर्वशक्तिमान है ईश्वर उसे शक्ति देगा...

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नवनीत शर्मा की पांच ग़ज़लें

एक कुछ मेरा उस पार जिंदा है अभी जब कि ये दीवार जिंदा है अभी मेरी हां मजबूरियों का ढोल है दिल में तो इनकार जि़ंदा है अभी हर तरफ है धुंध नफरत की मगर इस जहां में प्‍यार जिंदा है अभी खुदकुशी कर ली कबीले ने मगर एक अदद...

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विजयानन्द विजय की दो लघुकथाएं

पेंटिंग ट्रेन का एसी कोच — जिसमें आम तौर पर सम्पन्न लोग ही यात्रा करते हैं।आमजनों के लिए तो यह शीशे-परदे और बंद दरवाजों के अंदर की वो रहस्यमयी दुनिया है, जिसके बारे में वे जानते तक नहीं हैं। एक परिवार आमने-सामने की छ: सीटों पर अपने पूरे कुनबे के...

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आदमियत की दुखती रग के निर्दोष राग ढूंढ़ने का नया तरीक़ा

पुस्तक समीक्षा किताब :  चाक पर रेत ( जाबिर हुसेन ) शहंशाह आलम मेरा मानना है कि हर लेखक किसी पहाड़ी कबीले का सदस्य होता है। तभी तो हर लेखक जीवन को, जीवन से जुड़े संघर्ष को इतने निकट से देख पाता है। यह सही भी है। एक सच्चे लेखक...

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पंकज चौधरी की चार कविताएं

दिल्ली दिल्ली में समाज नहीं है दिल्ली में व्यक्ति ही व्यक्ति है दिल्ली में राम का नाम नहीं है दिल्ली में सुबह और शाम काम ही काम है दिल्ली में श्रम का दाम नहीं है दिल्ली में श्रम ही श्रम है दिल्ली में प्यार नहीं है दिल्ली में तिज़ारत ही...

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पद्मश्री स्वर्गीय बेकल उत्साही को श्रद्धांजलि

एक इक दिन ऐसा भी आएगा होंठ-होंठ पैमाने होंगे मंदिर-मस्जिद कुछ नहीं होंगे घर-घर में मयख़ाने होंगे जीवन के इतिहास में ऐसी एक किताब लिखी जाएगी जिसमें हक़ीक़त औरत होगी मर्द सभी अफ़्साने होंगे राजनीति व्यवसाय बनेगी संविधान एक नाविल होगा चोर उचक्के सब कुर्सी पर बैठ के मूँछें ताने...

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘क्या नाम था उसका?’

अब पानी सिर से ऊपर गुज़र चुका था । लिहाज़ा प्रोफ़ेसर सरोज कुमार के नेतृत्व में कॉलेज के शिक्षक अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले गए । धरना-प्रदर्शन शुरू हो गया । प्रोफ़ेसर सरोज कुमार देश के एक ग़रीब और पिछड़े प्रांत के क़स्बे किशन नगर के सरकारी कॉलेज में पिछले पच्चीस...

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शहंशाह आलम की पांच कविताएं

पेंटिंग : शहंशाह आलम   खोलना खोलने की जहाँ तक बात है लगता है रहस्य का रहस्य आश्चर्य का आश्चर्य तक खोल डाला है किसी परिचित जैसा   लेकिन मेरे जैसे झूठे ने उस घर का द्वार खोला तो लगा कितना कुछ खोलना बाक़ी रह गया है अभी भी  ...

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भरत प्रसाद की कहानी ‘देख तमाशा पानी का’

यह पानी भी न, कमाल का मायावी है भाई। पूछो तो कहाँ नहीं घुसा हुआ है ? जीव में, जानवर में, मिट्टी और पत्थर पेड़-पालों, बंजर-धरती, आकाश यहाँ तक कि हवा का भी पीछा नहीं छोड़ता। होगी हवा उड़नछू, पानी उसका भी बाप है। वैसे पानी है बेरंगा, मगर इसके...

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘हमला’

बाईसवीं सदी में एक दिन देश में ग़ज़ब हो गया । सुबह लोग सो कर उठे तो देखा कि चारो ओर तितलियाँ ही तितलियाँ हैं । गाँवों , क़स्बों , शहरों , महानगरों में जिधर देखो उधर तितलियाँ ही तितलियाँ थीं । घरों में तितलियाँ थीं । बाज़ारों में तितलियाँ...

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गोपाल प्रसाद की दो कविताएं

ग़ालिब गूंगे और बलबलाते लोगों के बीच एक जीभ वाला राजा था अपने खजानों और तहखानों में वक्रोक्तियों को सिर्फ़ छिपाए ही नहीं रहा वो दुनिया को बांटता रहा वक्त बेवक्त एक बहुत बड़ी भीड़ से उगा था वह और सारी जिंदगी खुद को उसी से जोड़ता काटता रहा सतह...

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आदमी की दुनिया को विस्तार देतीं अनिरुद्ध सिन्हा की ग़ज़लें

पुस्तक-समीक्षा शहंशाह आलम समकालीन हिंदी साहित्य में ग़ज़ल का प्रभाव बढ़ा है, क़द बढ़ा है, स्वीकृति का दायरा बढ़ा है। ग़ज़ल के लिए इस सर्वव्यापकता के पीछे जिन महत्वपूर्ण ग़ज़लकारों का सद्प्रयास रहा है, उनमें समकालीन ग़ज़ल के चर्चित शायर अनिरुद्ध सिन्हा की भूमिका जानी बूझी हुई है। इसलिए कि...

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘एक गुम-सी चोट’

सुशांत सुप्रिय कैसा समय है यह जब बौने लोग डाल रहे हैं लम्बी परछाइयाँ — ( अपनी ही डायरी से ) —————————————————————————————- बचपन में मुझे ऊँचाई से , अँधेरे से , छिपकली से , तिलचट्टे से और आवारा कुत्तों से बहुत डर लगता था । उन्हें देखते ही मैं छिप...

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राज्यवर्द्धन की तीन कविताएं

राज्यवर्द्धन एकांत भीड़  में एकांत की तलाश एकांत में एक अदद चेहरे की ललक अकुलाने लगते हैं शब्द नि:शब्द में स्मृतिहीन कैसे बन जाऊँ वह भी तो संचित सम्पदा है कलकल छलछल की अहिर्निश ध्वनि बीच सुनना चाहता है कान किसी चिर -परिचित की मधुर तान खेल चॊर सिपाही मंत्री...

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बुद्धिलाल पाल की तीन कविताएं

बुद्धिलाल पाल असंतोष जनता का असंतोष राजा के राज्य में पानी के बुलबुलों-सा उठता …… फुस्स हो जाता राजा जनता को स्वामी-भक्ति सिखाता उसकी जड़ों में मठा डालता जनता से हाय-हलो, कैसे हो कहता दारू वालों को दारू भीख वालों को भीख निकम्मे ज्ञानवादियों को दान अपने सूबेदारों को सूबे...

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हमारे समय की पटकथा

राजकिशोर राजन   हम ऐसे समय में जी रहे हैं जब साहित्य भी बाजारवाद के ढाँचे में समाहित हो रहा है। प्रतिरोध के स्वर नेपथ्य में जा रहे हैं। वैसे में एक कविता ही है जो सबसे ज्यादा बेचैन है, चूँकि उसका सपना संसार को सुन्दर, कलात्मक, भय-भूख और शोषण...

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चोट करतीं कविताएं

रामस्वार्थ ठाकुर   जनतंत्र जिन्दा है गुंबज पर ध्वज फहरा रहा है संसद चिल्ला रही है सरहद पर भौंक रही हैं संगीनें ‘जनतंत्र जिन्दा है’   बोलो मत बोलो मत शब्द को शीत लग जाएगा अथवा चीनी या जापानी इन्सेफ्लाइटिस का संक्रमण अथवा सांप्रदायिक उन्माद में कोई उसे छूरा भोंक...