Tagged: Dream

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प्रतिभा चौहान की पांच कविताएं

||हमारे फूल -तुम्हारे नक्शे|| तुम्हें उलझे हुए आदमी हो तुम सुलझा नहीं  सके समय की लट को तुमने नहीं सीखा खुशियों से खेलना तुम्हें नहीं आता सीधे सरल सवालों का जवाब देना तुमने तो यह भी नहीं समझा कि डूबते हुए आदमी को तिनके का सहारा होता है तुमने नहीं...

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सुशांत सुप्रिय की छह कविताएं

1. लौट आऊँगा मैं क़लम में रोशनाई-सा पृथ्वी पर अन्न के दाने-सा कोख में जीवन के बीज-सा लौट आऊँगा मैं आकाश में इंद्रधनुष-सा धरती पर मीठे पानी के कुएँ-सा ध्वंस के बाद नव-निर्माण-सा लौट आऊँगा मैं लौट आऊँगा मैं आँखों में नींद-सा जीभ में स्वाद-सा थनों में दूध-सा ठूँठ हो...

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अनिरुद्ध सिन्हा की पांच ग़ज़लें

एक राह की  दुश्वारियों  के रुख  बदलकर देखते जिस्म घायल ही सही कुछ दूर चलकर देखते   नींद में ही मोम बनकर ख़्वाब से की गुफ्तगू दोपहर की  धूप में  थोड़ा  पिघलकर  देखते   कुछ तजुर्बों के  लिए  ही दोस्तो इस दौर में देश की मिट्टी कभी  माथे पे मलकर ...

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মৌমিতা গুঁইর কবিতা ‘নীলস্বপ্ন’

আমার দুঃখের সূর্য ঝলমল করে আকাশে রাতের তারারা মিটিমিটি চায় ভাবসম্প্রসারণের চাঁদ হোক যতই ঝলসানো রুটি, রুটিতে যে বড্ড অরুচি। মেঘ যদি পিওন হয়, দমকা হাওয়া নিয়ে আসে উড়োচিঠি – বসন্ত চাই না আমি, অপেক্ষা করছি কালবৈশাখী। উড়ে যাবে ছাতা, আমি কিন্তু ইষ্টনাম জপতে জপতে ভাবব ডুবল বুঝি তরী –...

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সৌমেন দত্তর কবিতা ‘পরিণীতা’,

প্রহর গুলো অরুণা জালে ঘিরেছে, অভ্যাসের চিলেকোঠার বদ্ধতা থেকে, তোমার টানে কিনারাহীন কিনারায় পদার্পন। রজনীগন্ধা নেই,বকুল গাছও নেই, তবুও ঘরছাড়া এ মন। মিথ্যে মুখে সত্যির স্নো পাউডারে শহরটা চকচকে, কান্না আর হাহাকারের নিত্য আনাগোনা। কষ্টের দহনে,দগ্ধ আর্তনাদ, এতো কোলাহল আর্তনাদের মাঝে শান্তি খুঁজি। রঙিন জৌলুশে ঠাসা, চতুর্দিক উনকোটি চৌষট্টি কর্মে...

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मीनू परियानी की लघुकथा ‘मज़बूरी’

आज राधा को कुछ ज्यादा ही देर हो गयी थी मै दो बार बाहर जा कर देख आई थी पर उसका दूर दूर तक पता नही था. राधा मेरी कामवाली बाई थी जो कभी कभी अपनी बेटी को भी काम पर ले आती थी। रानी उसकी बेटी जिसकी उसने छोटी उम्र में...

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सुधीर कुमार सोनी की छह कविताएं

बेमिसाल मुहब्बत पानी के गहरे तल में पत्थर है पत्थर के गहरे तल में पानी है पानी है पत्थर है अटूट प्रेम है यह शायद कोई नहीं जानता कि इनके प्रेम की मिसाल दी जाए धीरे-धीरे कटकर प्रेम में सब कुछ मिटा देना पत्थर के सिवाय कोई नहीं जानता युगों-युगों से...

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शहंशाह आलम की कविता ‘यक्षिणी’

एक यह आकाश जो कोरा है तुम्हारी छुअन की प्रतीक्षा में शताब्दियों-शताब्दियों से   अंतरिक्ष की सीढ़ियाँ पकड़कर अपने यक्षपति से छुप-छुपाकर तुम उतरते हो सखियों के संग-साथ और बादलों को सियाही बनाकर लिखते हो कोरे आकाश पर प्रेम की अमर कथाएँ मेरे लिए   अपार दिनों से पसरा मेरे...

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कृष्ण सुकुमार की सात कविताएं

(1) बचा हुआ हूँ शेष जितना नम आँखों में विदा गीत ! बची हुई है जिजीविषा जितनी किसी की प्रतीक्षा में पदचापों की झूठी आहट ! बची हुई है मुस्कान जितना मुर्झाने से पूर्व फूल ! बचा हुआ है सपना जितना किसी मरणासन्न के मुँह में डाला गंगाजल ! बचा...

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नवनीत शर्मा की पांच ग़ज़लें

एक कुछ मेरा उस पार जिंदा है अभी जब कि ये दीवार जिंदा है अभी मेरी हां मजबूरियों का ढोल है दिल में तो इनकार जि़ंदा है अभी हर तरफ है धुंध नफरत की मगर इस जहां में प्‍यार जिंदा है अभी खुदकुशी कर ली कबीले ने मगर एक अदद...

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सुरेश शर्मा की तीन कविताएं

भयावह दिनों में भरोसे की कविता ( एक ) हम परास्त करेंगे उस काले-दैत्य को ! जो लाल, हरे व भगवा रंगों में आता है और सपनों में मीरा व मरियम को डराता है ताकि हो सके तय कि भरोसा, भय पर भारी है जंग हर लम्हा जारी है….!! (दो)...

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मल्लिका मुखर्जी की तीन कविताएं

सामंजस्य कितना सामंजस्य है सपनों और वृक्षों में ! दोनों पंक्तियों में सजना पसंद करते हैं । कितना भी काटो-छाँटों उनकी टहनियाँ, तोड़ लो सारे फल चाहे नोंच लो सारी पत्तियाँ, मसल दो फूल और कलियाँ; फिर भी पनपते रहते हैं असीम जिजीविषा के साथ जब तक उन्हें जड़ से...

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केशव शरण की 15 कविताएं

क्या कहूंगा क्या मैं कह सकूंगा मालिक ने अच्छा नहीं किया अगर किसी ने मेरे सामने माइक कर दिया क्या मैं भी वही कहूंगा जो सभी कह रहे हैं बावजूद सब दुर्दशा के जो वे सह रहे हैं और मैं भी क्या मैं भी यही कहूंगा कि आगे बेहतरीन परिवर्तन...

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वेद प्रकाश की तीन प्रेम कविताएं

एक लंबी प्रेम कविता तुम धूप में अपने काले लंबे बाल जब-जब सुखाती हो सूरज का सीना फूल जाता है और पूरे आकाश पर छा जाता है मैंने देखा है गुलमुहर के नीचे बस का इंतजार करते हुए बस आए या न आए तुम्हारी छाया गुलमुहर को चटख कर देती...

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डॉ हरविंदर सिंह बक्शी की तीन कविताएं

विनाश निकट खड़ा है यह धरा पर क्या घटित हो रहा है जाग रहा बाज़ार, इंसान सो रहा है। दागदार करता प्रकृति का आंचल बीज विनाश के मानव बो रहा है। सुरसा जैसी बढ़ रही  सड़कों पर गाड़ियां लील रही लोलुपता वृक्ष, वन और झाड़ियां। तप रहे पर्वत, पिघलती हिम-शिलाएं...

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आकांक्षा यादव की तीन कविताएँ 

21वीं सदी की बेटी जवानी की दहलीज पर कदम रख चुकी बेटी को माँ ने सिखाये उसके कर्तव्य ठीक वेैसे ही जैसे सिखाया था उनकी माँ ने पर उन्हें क्या पता ये इक्कीसवीं सदी की बेटी है जो कर्तव्यों की गठरी ढोते-ढोते अपने आँसुओं को चुपचाप पीना नहीं जानती है...

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अमरजीत कौंके की पांच कविताएं

साहित्य अकादमी, दिल्ली ने पंजाबी के कवि , संपादक और अनुवादक डा. अमरजीत कौंके सहित 23 भाषाओँ के लेखकों को वर्ष 2016 के लिए अनुवाद पुरस्कार देने की घोषणा की है. अमरजीत कौंके को यह पुरस्कार पवन करन की पुस्तक ” स्त्री मेरे भीतर ” के पंजाबी अनुवाद ” औरत मेरे...

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डॉ छवि निगम की पांच कविताएं

स्वतंत्रता एक भेड़ के पीछे पीछे खड्ढे में गिरती जाती अंधाधुंध पूरी कतार को भाईचारे को मिमियाती पूरी इस कौम इतनी सारी ‘मैं’ हम न हो पायीं जिनकी अब तक, उनको… चंहु ओर होते परिवर्तन से बेखबर चाबुक खाते आधी आँखों पे पड़े  परदे से सच आंकते झिर्री भर साम्यवाद...

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सय्यदैन ज़ैदी की कविता ‘वो जो है ख़्वाब सा…’

वो जो है ख्वाब सा ख़याल सा धड़कन सा सिरहन सा सोंधी खुशबू सा नर्म हवाओं सा सर्द झोकों सा मद्धम सी रौशनी सा लहराती सी बर्क़ सा बिस्तर की सिलवटों सा बाहों में लिपटे तकिए सा जिस्म की बेतरतीब चादर सा सुबहों की ख़ुमारी सा शाम की बेक़रारी सा...

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विजय ‘आरोहण’ की नौ कविताएं

सारंडा, जंगल और आदिवासी,जल, जंगम और प्रतिरोध की कवितायें 1. हमारे पहाड़ों के बच्चे हमारे पहाड़ों के बच्चे गिल्ली-डंडा खेलते है वह छुप्पम-छुपाई खेलते शाल के पेड़ों के पीछे छिप जाते हैं वह तीर-धनुषों से निशाना साध रहे हैं इसके लिए वह एक बिजुका बनाते हैं और दनदनाती आती है...