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डॉ दिग्विजय शर्मा “द्रोण” की तीन कविताएं

डॉ दिग्विजय शर्मा “द्रोण” शिक्षा- एम ए (हिंदी, भाषाविज्ञान, संस्कृत, पत्रकारिता), एम फिल, पीएच डी,। विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं व वेब मीडिया तथा ई-पत्रिकाओं में अनेक लेख, कविताएँ प्रकाशित। राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों में सहभागिता। अनेक संस्थाओं से सम्मानित। सम्प्रति- अध्यापन, केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा (भारत) में सेवारत। मोबाइल — 8909274612...

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प्रेरणा शर्मा ‘प्रेेरणा’ की सात प्रेम कविताएं

प्रेरणा शर्मा ‘प्रेरणा’ पेशे से अध्यापिका विभिन्न पत्र – पत्रिकाओं , समाचार पत्रों  में लेख, कविताएं प्रकाशित बोधि प्रकाशन द्वारा  प्रकाशित पुस्तक ‘ स्त्री होकर सवाल करती है ‘  में कविताएं प्रकाशित  हो चुकी हैं । एक प्रभात  के आगमन  से .. निशा  के अवसान  तक .. घूमती  रहती  हूँ...

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सुरेंद्र भसीन की चार कविताएं

सुरेन्द्र भसीन पेशे से एकाउंटेंट, कई निजी  कंपनियों में काम किया। पता के 1/19A, न्यू पालम  विहार, गुड़गांंव, हरियाणा मो-9899034323 मेरी बेटी /सबकी बेटी मैं जब भी अपनी बीवी की आँखों में देखता हूँ उसमें मेरी बेटी का चेहरा नजर आता है। जो बड़ी होकर अपने पति को जैसे बड़ी उम्मीद से याचक होकर निहार रही है तो मैं बिगड़ नहीं पाता हूँ वहीं ढीला पड़ जाता हूँ। क्रोध नहीं कर पाता उबलता दूध जैसे छाछ हो जाता है. हाथ-पांव शरीर और दिल अवश होकर जकड़ में आ जाता है और आये दिन अख़बारों में पढ़े अच्छे-बुरे समाचारों की सुर्खियाँ याद आ-आकर मुझे दहलाने लगती हैँ। और मेरी पाशविक जिदें, नीच चाहतें बहुत घिनौनी और बौनी होकर मेरा मुँह  चिढ़ाने लगती है। कोई भला ऐसे में कैसे अपने परिवार को भूल अपनी बेटी के भावी सुखों को नजरअंदाज कर अपना सुख चाहता है ? वह ऐसा बबूल कैसे बो सकता है जिसे काटने की सोचते ही उसका कलेजा मुँह  को आता है? तभी जब मैं कुछ कहने को होता हूँ...

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भास्कर चौधुरी की दस कविताएं

भास्कर चौधुरी जन्म: 27 अगस्त 1969 रमानुजगंज, सरगुजा (छ.ग.) शिक्षा: एम. ए. (हिंदी एवं अंग्रेजी) बी एड प्रकाशन: एक काव्य संकलन ‘कुछ हिस्सा तो उनका भी है’ एवं गद्य संकलन (यात्रा वृतांत) ‘बस्तर में तीन दिन’ प्रकाशित। लघु पत्रिका ‘संकेत’ का छ्टा अंक कविताओं पर केंद्रित. कविता, संस्मरण, समीक्षा आदि...

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प्यार करना रचनाकार होना है

  वेद प्रकाश प्यार एक सहज व्यक्ति की सहज अभिव्यक्ति है । हम इसे श्रेणियों में विभक्त नहीं कर सकते । एक मन से दूसरे मन की आभासी बातचीत जब रूपाकार होने लगती है, तो प्रेम का स्वरूप तैयार होने लगता है । यह किसी को बताया नहीं जाता और...

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भावना की तीन कविताएं

संवेदनाओं का पौधा अधिकांश औरतें जब व्यस्त होती हैं खरीदने में साड़ी और सलवार सूट तो लेखिकाएं खरीदती हैं अपने लिए कुछ किताबें ,पत्रिकाएॅ और कलम अधिकांश औरतें जब ढूंढती हैं इन्टरनेट पर फैशन का ट्रेंड तो लेखिकाएं तलाशती हैं ऑनलाइन किताबों की लिस्ट अधिकांश औरतें जब नाखून में नेलपाॅलिश...

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राकेश रोहित की सात कविताएं

जब सब लौट जायेंगे सब जब घर लौट जायेंगे मैं कहाँ जाऊंगा इतनी बड़ी दुनिया में नहीं है मेरा कोई वृक्ष! मेरे जीवन में कुछ कलरव की स्मृतियाँ हैं और एक पुराने स्कूल की जिसकी दीवार ढह गयी थी मास्टर जी की पीठ पर छुट्टी का घंटा बजने पर जहाँ...

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मनी यादव की चार ग़जलें

एक ख़ुशबू तेरी पयाम लायी है फिर फ़िज़ा में बहार आयी है बेवफ़ा मैं नहीं, न ही तुम हो फ़ितरते इश्क़ बेवफ़ाई है इत्र चुपके से कान में बोला खुशबू दिलदार से चुरायी है कोई मंज़र नहीं रहा ग़म का आज शायद वो मुस्करायी है पहना ज्यों ही लिबास यादों...

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प्रतिभा चौहान की पांच कविताएं

||हमारे फूल -तुम्हारे नक्शे|| तुम्हें उलझे हुए आदमी हो तुम सुलझा नहीं  सके समय की लट को तुमने नहीं सीखा खुशियों से खेलना तुम्हें नहीं आता सीधे सरल सवालों का जवाब देना तुमने तो यह भी नहीं समझा कि डूबते हुए आदमी को तिनके का सहारा होता है तुमने नहीं...

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सुशांत सुप्रिय की छह कविताएं

1. लौट आऊँगा मैं क़लम में रोशनाई-सा पृथ्वी पर अन्न के दाने-सा कोख में जीवन के बीज-सा लौट आऊँगा मैं आकाश में इंद्रधनुष-सा धरती पर मीठे पानी के कुएँ-सा ध्वंस के बाद नव-निर्माण-सा लौट आऊँगा मैं लौट आऊँगा मैं आँखों में नींद-सा जीभ में स्वाद-सा थनों में दूध-सा ठूँठ हो...

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अनिरुद्ध सिन्हा की पांच ग़ज़लें

एक राह की  दुश्वारियों  के रुख  बदलकर देखते जिस्म घायल ही सही कुछ दूर चलकर देखते   नींद में ही मोम बनकर ख़्वाब से की गुफ्तगू दोपहर की  धूप में  थोड़ा  पिघलकर  देखते   कुछ तजुर्बों के  लिए  ही दोस्तो इस दौर में देश की मिट्टी कभी  माथे पे मलकर ...

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মৌমিতা গুঁইর কবিতা ‘নীলস্বপ্ন’

আমার দুঃখের সূর্য ঝলমল করে আকাশে রাতের তারারা মিটিমিটি চায় ভাবসম্প্রসারণের চাঁদ হোক যতই ঝলসানো রুটি, রুটিতে যে বড্ড অরুচি। মেঘ যদি পিওন হয়, দমকা হাওয়া নিয়ে আসে উড়োচিঠি – বসন্ত চাই না আমি, অপেক্ষা করছি কালবৈশাখী। উড়ে যাবে ছাতা, আমি কিন্তু ইষ্টনাম জপতে জপতে ভাবব ডুবল বুঝি তরী –...

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সৌমেন দত্তর কবিতা ‘পরিণীতা’,

প্রহর গুলো অরুণা জালে ঘিরেছে, অভ্যাসের চিলেকোঠার বদ্ধতা থেকে, তোমার টানে কিনারাহীন কিনারায় পদার্পন। রজনীগন্ধা নেই,বকুল গাছও নেই, তবুও ঘরছাড়া এ মন। মিথ্যে মুখে সত্যির স্নো পাউডারে শহরটা চকচকে, কান্না আর হাহাকারের নিত্য আনাগোনা। কষ্টের দহনে,দগ্ধ আর্তনাদ, এতো কোলাহল আর্তনাদের মাঝে শান্তি খুঁজি। রঙিন জৌলুশে ঠাসা, চতুর্দিক উনকোটি চৌষট্টি কর্মে...

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मीनू परियानी की लघुकथा ‘मज़बूरी’

आज राधा को कुछ ज्यादा ही देर हो गयी थी मै दो बार बाहर जा कर देख आई थी पर उसका दूर दूर तक पता नही था. राधा मेरी कामवाली बाई थी जो कभी कभी अपनी बेटी को भी काम पर ले आती थी। रानी उसकी बेटी जिसकी उसने छोटी उम्र में...

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सुधीर कुमार सोनी की छह कविताएं

बेमिसाल मुहब्बत पानी के गहरे तल में पत्थर है पत्थर के गहरे तल में पानी है पानी है पत्थर है अटूट प्रेम है यह शायद कोई नहीं जानता कि इनके प्रेम की मिसाल दी जाए धीरे-धीरे कटकर प्रेम में सब कुछ मिटा देना पत्थर के सिवाय कोई नहीं जानता युगों-युगों से...

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शहंशाह आलम की कविता ‘यक्षिणी’

एक यह आकाश जो कोरा है तुम्हारी छुअन की प्रतीक्षा में शताब्दियों-शताब्दियों से   अंतरिक्ष की सीढ़ियाँ पकड़कर अपने यक्षपति से छुप-छुपाकर तुम उतरते हो सखियों के संग-साथ और बादलों को सियाही बनाकर लिखते हो कोरे आकाश पर प्रेम की अमर कथाएँ मेरे लिए   अपार दिनों से पसरा मेरे...

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कृष्ण सुकुमार की सात कविताएं

(1) बचा हुआ हूँ शेष जितना नम आँखों में विदा गीत ! बची हुई है जिजीविषा जितनी किसी की प्रतीक्षा में पदचापों की झूठी आहट ! बची हुई है मुस्कान जितना मुर्झाने से पूर्व फूल ! बचा हुआ है सपना जितना किसी मरणासन्न के मुँह में डाला गंगाजल ! बचा...

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नवनीत शर्मा की पांच ग़ज़लें

एक कुछ मेरा उस पार जिंदा है अभी जब कि ये दीवार जिंदा है अभी मेरी हां मजबूरियों का ढोल है दिल में तो इनकार जि़ंदा है अभी हर तरफ है धुंध नफरत की मगर इस जहां में प्‍यार जिंदा है अभी खुदकुशी कर ली कबीले ने मगर एक अदद...

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सुरेश शर्मा की तीन कविताएं

भयावह दिनों में भरोसे की कविता ( एक ) हम परास्त करेंगे उस काले-दैत्य को ! जो लाल, हरे व भगवा रंगों में आता है और सपनों में मीरा व मरियम को डराता है ताकि हो सके तय कि भरोसा, भय पर भारी है जंग हर लम्हा जारी है….!! (दो)...

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मल्लिका मुखर्जी की तीन कविताएं

सामंजस्य कितना सामंजस्य है सपनों और वृक्षों में ! दोनों पंक्तियों में सजना पसंद करते हैं । कितना भी काटो-छाँटों उनकी टहनियाँ, तोड़ लो सारे फल चाहे नोंच लो सारी पत्तियाँ, मसल दो फूल और कलियाँ; फिर भी पनपते रहते हैं असीम जिजीविषा के साथ जब तक उन्हें जड़ से...