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दो बीघा ज़मीन —किसान पीड़ा का जीवंत दस्तावेज

डॉ संगीता गांधी भारतीय किसान के वास्तविक दर्द को पर्दे पर उकेरने वाली फिल्म थी -दो बीघा जमीन ।’दो बीघा ज़मीन’ हृदय-स्पर्शी और परिष्कृत रूप से एक बेदखल किसान का जीवंत चित्रण है। एक किसान के बहाने देखा जाए, तो यह फ़िल्म सम्पूर्ण भारतीय किसान-समाज का सबसे मानवीय चित्रण प्रस्तुत...

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नूर मुहम्मद ‘नूर’ की दो भोजपुरी ग़ज़लें

एक आदमिन के ढ़हान, चारू ओर उठि रहल बा मकान चारू ओर एगो बस जी रहल बा नेतवे भर मू  रहल  बा  किसान चारू ओर अब के पोछी हो लोर, ए, दादा रो रहल, समबिधान चारु ओर ई अन्हरिया, बड़ा पुरनिया  हो कब ले  होई  बिहान चारू ओर जे बा...

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रोहित कौशिक की पांच कविताएं

चुप है  किसान खेत में हल जोतता  किसान और तैयार बगुलूे चुनने को कीड़े-मकोड़े कीड़े-मकोड़े/जो मिटा सकते हैं बगुलों की भूख और हानिकारक हैं फसल के लिए इसलिए चुप है  किसान इसी व्यवस्था के बीच बगुलों का भोजन बन रही है केंचुओं की जमात भी। और अब किसान मजबूर है...

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सुशांत सुप्रिय की तीन कविताएं

1. स्त्रियाँ हरी-भरी फ़सलों-सी प्रसन्न है उनकी देह मैदानों में बहते जल-सा अनुभवी है उनका जीवन पुरखों के गीतों-सी खनकती है उनकी हँसी रहस्यमयी नीहारिकाओं-सी आकर्षक हैं उनकी आँखें प्रकृति में ईश्वर-सा मौजूद है उनका मेहनती वजूद दुनिया से थोड़ा और जुड़ जाते हैं हम उनके ही कारण 2. वह...

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रवि सुतार की तीन कविताएं

पासपोर्ट स्विट्ज़रलैंड हो जैसे गाँव का बस स्टैंड खेत से गाँव की दूरी जितनी है उतनी ही दूर तेरे लिए सिडनी है डिनर दुबई में ब्रेकफास्ट के लिए इटली है स्लिम सा ड्रिंक हैबिट तेरी यार तेरा काश्तकार अमली है अंग्रेजन पट गई तू कैसे..?? घास नहीं डालती मुझे गाँव...

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यशपाल निर्मल की दो लघुकथाएं

गर्व   ” घर में कोई है क्या?” सरपंच अवतार सिंह ने आवाज़ लगाई ही थी कि फकीर चंद  दौड़ते हुए दरवाज़े पर पहुँचा । उसने भय और घबराहट से कहा,” मालिक आपने क्यों कष्ट किया? मुझे बुला लेते। ” “क्यों फकीर चंद, हम तुम्हारे घर भी नहीं आ सकते...