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भावना सिन्हा की तीन कविताएं

  डॉ भावना सिन्हा जन्म तिथि -19 जुलाई शिक्षा – पीएचडी (अर्थशास्त्र ) निवास – गया ,बिहार ईमेल — sbhawana190@ gmail.com प्रकाशित कृतियां– यथावत, अंतिम जन, पुस्तक संस्कृति आदि कुछ पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित । 1. पांच बज गए पांच बज गएअभी तक नहीं आए पापा पापा  अब तक क्यों नहीं आएकहीं...

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परमानन्द रमन की चार कविताएं

परमानन्द रमन जन्मतिथि : 20/12/1983 जन्म-स्थान : जमशेदपुर(तात्कालीन बिहार, वर्तमान झारखण्ड) ग्राम: करहसी, जिला- रोहतास (बिहार) आरंभिक शिक्षा बारहवीं तक जमशेदपुर में ही, तत्पश्चात कला शिक्षा में स्नातक के लिये इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय के दृश्य कला संकाय के मूर्तिकला विभाग में दाखिला। स्नातकोत्तर की शिक्षा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय  के...

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বর্নালী চন্দর গল্প ‘নতুন অধ‍্যায়’

            বর্নালী চন্দ ঘুম থেকে উঠে রাতুল দেখল বেশ বেলা হয়ে গিয়েছে। ঘড়ির দিকে চোখ পড়তেই লাফিয়ে উঠল, বাপ্ রে আটটা বেজে গিয়েছে। সকাল ছটার অ্যালার্ম দিয়েছিল মোবাইলে, কখন যে বেজে বেজে বন্ধ হয়ে গিয়েছে, বুঝতেই পারে নি। আসলে মায়ের ডাক শুনে উঠতে অভ‍্যস্ত ও,...

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सुरेंद्र भसीन की चार कविताएं

सुरेन्द्र भसीन पेशे से एकाउंटेंट, कई निजी  कंपनियों में काम किया। पता के 1/19A, न्यू पालम  विहार, गुड़गांंव, हरियाणा मो-9899034323 मेरी बेटी /सबकी बेटी मैं जब भी अपनी बीवी की आँखों में देखता हूँ उसमें मेरी बेटी का चेहरा नजर आता है। जो बड़ी होकर अपने पति को जैसे बड़ी उम्मीद से याचक होकर निहार रही है तो मैं बिगड़ नहीं पाता हूँ वहीं ढीला पड़ जाता हूँ। क्रोध नहीं कर पाता उबलता दूध जैसे छाछ हो जाता है. हाथ-पांव शरीर और दिल अवश होकर जकड़ में आ जाता है और आये दिन अख़बारों में पढ़े अच्छे-बुरे समाचारों की सुर्खियाँ याद आ-आकर मुझे दहलाने लगती हैँ। और मेरी पाशविक जिदें, नीच चाहतें बहुत घिनौनी और बौनी होकर मेरा मुँह  चिढ़ाने लगती है। कोई भला ऐसे में कैसे अपने परिवार को भूल अपनी बेटी के भावी सुखों को नजरअंदाज कर अपना सुख चाहता है ? वह ऐसा बबूल कैसे बो सकता है जिसे काटने की सोचते ही उसका कलेजा मुँह  को आता है? तभी जब मैं कुछ कहने को होता हूँ...

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कमलेश भारतीय की दो कविताएं

एक जादूगर नहीं थे पिता पर किसी जादूगर से कम भी नहीं थे सुबह घर से निकलते समय हम जो जो फरमाइशें करते शाम को आते ही अपने थैले से सबको मनपसंद चीजें हंस हंस कर सौंपते जैसे किसी जादूगर का थैला हो अब पिता बन जाने पर समझ में...

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समीर कुमार ठाकुर की कहानी “लव यू डैड”

समीर कुमार ठाकुर समीर नवोदित कथाकार हैं। लिटरेचर प्वाइंट में उनकी ये पहली कहानी प्रकाशित हो रही है। उम्मीद है वो और बेहतर लिखेंगे। ‘पापा..पाप..’ राहुल गुस्से में चिल्लाते हुए पापा केे कमरे में आया, ‘नेट क्यों नहीं चल रहा है पाप? मैंने आप से कहा था कि आप ठीक...

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डाॅ. मृणालिका ओझा की कहानी ‘पिता, जाने के बाद’

  उस वक्त भैया गए थे, पिता जी के साथ, उनके अंतिम प्रवास पर। नाव पर नाविक भी था और जीजा जी भी। आज बीच संगम, नदियों के मंझधार, वे पिताजी को पूरी तरह छोड़ आएंगे। अब वे पिताजी की अत्यधिक पानी खर्चने की आदत से परेशान नहीं होंगे। बीच...

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मुसाफ़िर बैठा की चार कविताएं

पिता की निर्ब्याज याद बचपन में गुजर गए पिता की याद का कोई ठोस मूलधन भी नहीं है मेरे पास जिस पर यादों का कोई ब्याज जोड़-अरज पाऊं मैं   पिता के बारे में अलबत्ता मां के बयानों को कूट-छांटकर मेरे मन ने जो इक छवि गढ़ी है पिता की...

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राज्यवर्द्धन की नौ कविताएं

कागज की कश्ती कागज की नाव बचपन की अब भी तैर रही है पानी में फर्क सिर्फ इतना है कि उसमें मैं नहीं मेरे बच्चे सवार हैं इसलिए मैं किसी से कागज की कश्ती लौटाने की जिद नहीं करता प्रतीक्षा किसी सुबह आप उठते हैं और बारिश की गंध महसूस...

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यशपाल निर्मल की दो लघुकथाएं

गर्व   ” घर में कोई है क्या?” सरपंच अवतार सिंह ने आवाज़ लगाई ही थी कि फकीर चंद  दौड़ते हुए दरवाज़े पर पहुँचा । उसने भय और घबराहट से कहा,” मालिक आपने क्यों कष्ट किया? मुझे बुला लेते। ” “क्यों फकीर चंद, हम तुम्हारे घर भी नहीं आ सकते...