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प्रतिभा चौहान की पांच कविताएं

आज का दिन शताब्दियों ने लिखी है आज अपने वर्तमान की आखिरी पंक्ति आज का दिन व्यर्थ नहीं होगा चुप नहीं रहगी पेड़ पर चिड़िया न खामोश रहेंगी पेड़ों की टहनियाँ न प्यासी गर्म हवा संगीत को पियेगी न धरती की छाती ही फटेगी अंतहीन शुष्कता में न मुरझायेंगे हलों...

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मनीष वैद्य की कहानी ‘एक्वेरियम में मछलियां’

कल दोपहर की ही बात थी। तान्या दरवाजे को ठेलती हुई हवा के झोंके के मानिंद घर में घुसी थी। बस्ता सोफे पर फेंकते हुए पैरों से ही जूते दाएं और बाएं कोनों की ओर उछाल दिए। वह दौड़ते हुए अपनी मम्मी के गले में दोनों हाथ डाले झूलने लगी।...

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प्रतिभा सिंह की पांच कविताएं

1 किसी ने कहा आदमी खूबसूरत है मैंने कहा पेड़ खूबसूरत है… फिर आदमी की कुछ खूबसूरती क्रोध ने, कुछ ईर्ष्या ने, कुछ लोभ ने, कुछ द्वेष ने छीन ली …. फिर छीन ली दिल ख्वाहिशों  ने फिर एक दिन आदमी ने पेड़ के वज़ूद को मिटा डाला खूबसूरती के...

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आनन्द गुप्ता की तीन कविताएं

शब्द शब्दों में ही जन्मा हूँ शब्दों में ही पला मैं शब्दों में जीता हूँ शब्द ओढ़ता बिछाता हूँ। जैसे सभ्यता के भीतर सरपट दौड़ता है इतिहास सदियों का सफर तय करते हुए ये शब्द मेरे लहू में दौड़ रहे हैं मैं शब्दों की यात्रा करते हुए खुद को आज...