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मनी यादव की दो ग़ज़लें

एकतल्खियां खून की विरासत हैछोड़ ना यार ये सियासत हैमुफ़लिसी जा रही है महफ़िल मेंमुफ़लिसी को कफ़न की दावत हैहुस्न तेरा मिटा के दम लूंगासांस तुझसे मेरी बगावत हैवाकया ये समझ नहीं आतारात को दिन से क्यों शिकायत हैभागता क्यों है तू “मनी” ग़म सेग़म तो अल्लाह की इबादत हैदोमुकद्दर...

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मनी यादव की एक ग़ज़ल

टूटे मकाँ में रहता तो गुलदान बुरा है ग़ुरबत में मुहब्बत का भी अंजाम बुरा है भूखा था वो मासूम जिसे चोर कहा तुमने खुद का तेरा भी झांक गिरेबान बुरा है था आसरा मुझको भी बहुत अच्छे दिनों का अच्छा भी सियासत में तो पैगाम बुरा है कोशिश न...

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मनी यादव की चार ग़जलें

एक ख़ुशबू तेरी पयाम लायी है फिर फ़िज़ा में बहार आयी है बेवफ़ा मैं नहीं, न ही तुम हो फ़ितरते इश्क़ बेवफ़ाई है इत्र चुपके से कान में बोला खुशबू दिलदार से चुरायी है कोई मंज़र नहीं रहा ग़म का आज शायद वो मुस्करायी है पहना ज्यों ही लिबास यादों...

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अनिरुद्ध सिन्हा की चार ग़ज़लें

एक जाँ बदन से जुदा  है रहने दे ये जो मुझसे खफ़ा है रहने दे एक न एक रोज़ हादसा है यहाँ अब वहाँ क्या हुआ है रहने  दे छोड़ अब  हुस्न-इश्क़  की बातें ये  फसाना  सुना  है  रहने दे अपनी सूरत से मत डरा मुझको सामने  आईना   है  रहने ...

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नूर मुहम्मद ‘नूर’ की दो भोजपुरी ग़ज़लें

एक आदमिन के ढ़हान, चारू ओर उठि रहल बा मकान चारू ओर एगो बस जी रहल बा नेतवे भर मू  रहल  बा  किसान चारू ओर अब के पोछी हो लोर, ए, दादा रो रहल, समबिधान चारु ओर ई अन्हरिया, बड़ा पुरनिया  हो कब ले  होई  बिहान चारू ओर जे बा...

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अजमेर अंसारी ‘कशिश’ की एक ग़ज़ल

पस्ती में जिसने माना के तदबीर इश्क़ है पहुँचा बुलन्दियों पे तो तक़दीर इश्क़ है ! क्यों देखूँ इस जहान कीं रंगीनियाँ तमाम मेरी नज़र में यार की तस्वीर इश्क़ है हर लम्हा आता–जाता बताता है दोस्तो दुनिया है एक ख़्वाब तो ताबीर इश्क़ है मुझ सा कोई गनी नहीं...

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नूर मुहम्मद नूर की पांच ग़ज़लें

एक क्या पता क्यों खुशी सी होती है ज़िन्दगी ज़िन्दगी सी होती है ऐ अंधेरो! अभी जरा ठहरो मुझमें कुछ रौशनी सी होती है किससे पुछूं, कोई बतलाए क्यों? दोस्ती दुश्मनी सी होती है दिल भी घबरा रहा है हैरत से उसमें कुछ आशिक़ी सी होती है कौन बतालाए शायरी...

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शशांक मिश्रा की एक ग़ज़ल

वो क्या लोग थे साक़ी, क्या अजब मंज़र था। वही मुस्कुरा के मिले जिनके हाथों में खंजर था। राज कितने मुस्कुराते लबों ने छुपा लिए। किसे कब पता था कि आँखों में समंदर था। साक़ी दिखाते भी तो कैसे दिखाते तुझको। घाव जो भी था सीने के अंदर था। नशा-ए-शोहरत...

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मनीष कुमार ‘मुसाफिर’ की एक ग़ज़ल

हरेक दर्द से अब तो गुजर जाना है करके खुद से वादा मुकर जाना है । जानते है कि जख्म जीने नही देंगे दर्दे जिगर में थोड़ा उतर जाना है । जीने के बहाने कब तक ढूंढते फिरे मौत आयेगी और हमें मर जाना है । क्या जानेगा बेदर्द जमाना...

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मनी यादव की एक ग़ज़ल

तेरी यादों का अभी दिल पर असर बाकी है जो करेंगे साथ में तय वो सफ़र बाकी है यूँ तो अश्क़ों से मुकम्मल हो चुका है दरिया फिर भी दरिया में मुहब्बत की लहर बाकी है कुछ तो डर खुद से या मौला से तू आदम तेरा तुझ पर ही...

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अनिरुद्ध सिन्हा की पांच ग़ज़लें

एक राह की  दुश्वारियों  के रुख  बदलकर देखते जिस्म घायल ही सही कुछ दूर चलकर देखते   नींद में ही मोम बनकर ख़्वाब से की गुफ्तगू दोपहर की  धूप में  थोड़ा  पिघलकर  देखते   कुछ तजुर्बों के  लिए  ही दोस्तो इस दौर में देश की मिट्टी कभी  माथे पे मलकर ...

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विशाल मौर्य विशु की तीन ग़ज़लें

एक यार अब  तो ऐसा  आलम  हो गया है मेरा हर इक जख्म मरहम हो गया है कुछ दिनों से वो नज़र आया नहीं के तनहा तनहा सा ये मौसम हो गया है हसते हैं सब, खुश मगर कोई नहीं है आदमी का आँसू हमदम हो गया है ये भी...

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नवनीत शर्मा की पांच ग़ज़लें

एक कुछ मेरा उस पार जिंदा है अभी जब कि ये दीवार जिंदा है अभी मेरी हां मजबूरियों का ढोल है दिल में तो इनकार जि़ंदा है अभी हर तरफ है धुंध नफरत की मगर इस जहां में प्‍यार जिंदा है अभी खुदकुशी कर ली कबीले ने मगर एक अदद...

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मनी यादव की दो ग़ज़लें

एक अहले-दिल में कुछ छुपे आज़ार निकले हर शहर में इश्क़ के बीमार निकले कुछ सही पर रोशनी देता तो है जब जुगनुओं का काफिला हर बार निकले यूँ तो क़ातिल मर गया खंजर से उसके गिनने में उतने ही फिर हर बार निकले दास्ताँ सबकी कही तुमने मनी पर...

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सुधेश की एक ग़ज़ल

खिडकी मेँ इक चाँद उगा है अच्छा लगता है उस से मुहब्बत हो जाएगी ऐसा लगता है । इस दुनिया के मेले मेँ तो खूब तमाशे हैँ फिर भी क्योँ हर शख्स  अकेला लगता है । क्या है जिस को ढूँढ रहा हूँ भूल भुलैया मेँ. जिस को देखा हर...

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डॉ. राकेश जोशी की चार ग़ज़लें

1 आदमी के लिए ज़िंदगानी तो लिख धूप कोई कभी आसमानी तो लिख छुट्टियों में भला, जाएं बच्चे कहाँ हर किसी के लिए एक नानी तो लिख हो शहर में कोई एक ऐसी नदी जिसमें सबको मिले, थोड़ा पानी तो लिख आज फिर बैठकर कोई कविता सुना और जनता हुई...

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‘ऐनुल’ बरौलीवी की दो ग़ज़लें

एक जो लगी है आग़ दिल में आज बुझनी चाहिए ज़िन्दगी अब तो मुहब्बत से बदलनी चाहिए मुश्क़िलें बढ़ती गई अब ज़िन्दगी कटती नहीं या खुदा मेरी अभी किस्मत सँवरनी चाहिए दुश्मनों ने इस क़दर वीरान कर डाला मकाँ आग़ नफ़रत की नहीं फिर से सुलगनी चाहिए प्यार का दामन...

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डॉ भावना कुमारी की पांच ग़ज़लें

1 कैसा अपना है ये सफ़र मालिक कुछ न आता है अब नज़र मालिक लूट लाते हैं, कूट खाते हैं कर रहे हैं गुजर -बसर मालिक चोट जब भी लगी है सीने पर टूटने लगती है कमर मालिक आ ही जाता है सबके चेहरे पर बीतती उम्र का असर मालिक...

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मनी यादव की एक ग़ज़ल

मेरा मुकद्दर ग़म की कालिखों में उलझ गया चराग-ए-मोहब्बत जलने से पहले बुझ गया मुस्कराने ही वाला था आंसुओं की सम्त देखकर उससे पहले ही खुशियों का कारवां गुज़र गया वाकया-ए-ज़िन्दगी में ग़ुरबत एक अभिशाप है जो उलझा था सवाल आज वो सुलझ गया ज़माने से तेरी अदावत पहले ही...

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हंसराज की चार ग़ज़लें

एक जब से सुना कि माँ बीमार पड़ गई हम भाइयों के बीच दरार पड़ गई सबसे बड़ा नुकसान  बंटवारे का ये हुआ, मां आधी इस पार, आधी उस पार पड़ गई उम्रों की जमापूंजी थी रिश्तों की ये दौलत, आज वो ही सरेआम  तार-तार पड़ गई मशरूफ हैं हम...