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अनवर सुहैल की 4 कविताएं

अनवर सुहैल ये कविताएं अनवर सुहैल के कविता संग्रह डरे हुए शब्द से ली गई हैैं। संग्रह किंंडल पर उपलब्ध है। डाउनलोड करने के लिए नीचे क्लिक करें कितना ज़हर है भरा हुआ समय का ये खंड भोगना ज़रूरी था वरना हम जान नहीं पाते कि हमारे दिलों में एक-दूजे...

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रंजना जायसवाल की कहानी ‘कैसे लिखूं उजली कहानी’

रंजना जायसवाल जन्म  : ०३ अगस्त को पूर्वी उत्तर-प्रदेश के पड़रौना जिले में | शिक्षा –गोरखपुर विश्वविद्यालय से “’प्रेमचन्द का साहित्य और नारी-जागरण”’ विषय पर पी-एच.डी | प्रकाशन –आलोचना ,हंस ,वाक् ,नया ज्ञानोदय,समकालीन भारतीय साहित्य,वसुधा,वागर्थ,संवेद सहित राष्ट्रीय-स्तर की सभी पत्रिकाओं तथा जनसत्ता ,राष्ट्रीय सहारा,दैनिक जागरण,हिंदुस्तान इत्यादि पत्रों के राष्ट्रीय,साहित्यिक परिशिष्ठों...

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संजीव ठाकुर की बाल-कथा ‘डरपोक’

संजीव ठाकुर सीतेश पूरे हॉस्टल में बदनाम था। उसकी बदनामी इस बात में थी कि वह न तो कभी ठीक से नहाता था, न ही ढंग से कपड़े पहनता था और न ही बिस्तर ठीक करता था। उसकी किताबें-कापियाँ वगैरह भी जैसे-तैसे ही रहती थीं। वह कभी भी समय पर...

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अर्पण कुमार की 5 कविताएं

अर्पण कुमार दो काव्य संग्रह ‘नदी के पार नदी’ (2002), ‘मैं सड़क हूँ’ (2011) एवं एक उपन्यास ‘पच्चीस वर्ग गज़’ (2017) प्रकाशित एवं चर्चित। कविताएँ एवं कहानियाँ, आकाशावाणी के दिल्ली, जयपुर एवं बिलासपुर केंद्र से प्रसारित। दूरदर्शन के ‘जयपुर’ एवं ‘जगदलपुर’ केंद्रों से कविताओं का प्रसारण एवं कुछ परिचर्चाओं में...

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सुशान्त सुप्रिय की कहानी ‘मिसफिट’

सुशान्त सुप्रिय मार्फ़त श्री एच. बी. सिन्हा , 5174, श्यामलाल बिल्डिंग , बसंत रोड, ( निकट पहाड़गंज ) , नई दिल्ली – 110055 मो:  8512070086 ई-मेल: sushant1968@ gmail.com उसका सिर तेज़ दर्द से फटा जा रहा था । उसने पटरी से कान लगा कर रेलगाड़ी की आवाज़ सुननी चाही । कहीं कुछ नहीं था । उसने जब-जब जो जो चाहा, उसे नहीं  मिला । फिर आज  उसकी  इच्छा   कैसे  पूरी हो सकती थी । पटरी  पर लेटे-लेटे उसने कलाई-घड़ी देखी ।  आधा घंटा ऊपर हो चुका था पर इंटरसिटी एक्सप्रेसका कोई अता-पता  नहीं  था । इंटरसिटी एक्सप्रेस न सही , कोई पैसेंजर गाड़ी ही सही । कोई मालगाड़ी ही सही । मरने वाले को इससे क्या लेना-देना  कि  वह  किस गाड़ी  के  नीचे  कट  कर  मरेगा ।  उसके सिर के भीतर कोई हथौड़े चला रहा था । ट्रेन उसे क्या मारेगी, यह सिर-दर्द ही उसकी जान ले लेगा — उसने सोचा । शोर भरी गली में एक लंबे सिर-दर्द  का नाम ज़िंदगी है । इस ख़्याल से ही उसके मुँह में एक कसैला स्वाद भर गया । मरने के समय मैं भी स्साला फ़िलास्फ़र हो गया हूँ — सोचकर वह पटरी पर लेटे-लेटे ही मुस्कराया । उसका हाथ उसके पतलून की बाईं जेब में गया । एक अंतिम सिगरेट सुलगा लूँ । हाथ विल्स का पैकेट लिए बाहर  आया  पर  पैकेट  ख़ाली  था ।  दफ़्तर से चलने से पहले ही उसने पैकेट की अंतिम सिगरेट पी ली थी — उसे याद आया । उसके होठों पर गाली आते-आते रह गई । आज सुबह से ही दिन जैसे उसका बैरी हो गया था ।सुबह पहले पत्नी से खट-पट हुई । फिर किसी बात पर उसने बेटे को पीट दिया । दफ़्तर के लिए निकला  तो  बस...

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सुशान्त सुप्रिय की 5 कविताएं

सुशान्त सुप्रिय A-5001, गौड़ ग्रीन सिटी, वैभव खंड, इंदिरापुरम, ग़ाज़ियाबाद – 201014 ( उ.प्र. ) मो : 8512070086 ई-मेल : sushant1968@gmail.com बचपन  दशकों पहले एक बचपन था बचपन उल्लसित, किलकता हुआ सूरज, चाँद और सितारों के नीचे एक मासूम उपस्थिति बचपन चिड़िया का पंख था बचपन आकाश में शान से उड़ती रंगीन पतंगें थीं बचपन माँ का दुलार था बचपन पिता की गोद का प्यार था समय के साथ चिड़ियों के पंख कहीं खो गए सभी पतंगें कट-फट गईं माँ सितारों में जा छिपी पिता सूर्य में समा गए बचपन अब एक लुप्तप्राय जीव है जो केवल स्मृति के अजायबघर में पाया जाता है वह एक खो गई उम्र है जब क्षितिज संभावनाओं से भरा था एकदिन  एक दिन मैंने कैलेंडर से कहा — आज मैं मौजूद नहीं हूँ और अपने मन की करने लगा एक दिन मैंने कलाई-घड़ी से कहा — आज मैं मौजूद नहीं हूँ और खुद में खो गया एक दिन मैंने बटुए से कहा — आज मैं मौजूद नहीं हूँ और बाज़ार को अपने सपनों से निष्कासित कर दिया एक दिन मैंने आईने से कहा — आज मैं मौजूद नहीं हूँ और पूरे दिन उसकी शक्ल नहीं देखी एक दिन मैंने अपनी बनाईं...

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पल्लवी मुखर्जी की 5 कविताएं

पल्लवी मुखर्जी एक आओ सुनते है एक दूसरे की धड़कनों को धड़कनेंधड़कती हैं जैसेघड़ी की सुईटिक-टिक करती और ले जाती हैं हमेंं उम्र के उस दौर मेंजहाँ न मैं….मैं रहती हूँन तुम….तुम रहते हो हम एक हो जाते हैंउम्मीदों का हरापन लेकर  दो तुम एक पुल होजिस पर सेतमाम रिश्ते गुज़र रहे हैंधड़ाधड़ जैसे गुज़रती...

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उदयराज की कहानी ‘विश्वास-यात्रा’

उदयराज रितेश और मोहिनी बड़ी सतर्कता से प्लेटफॉर्म पर पहुंच एक कोने में दुबकने के अंदाज़ में बैठ गए। दिल्ली के लिए टिकट आते ही ले लिया था। उनकी नज़रें निरंतर प्लेटफॉर्म पर आने के सभी प्रवेश द्वारों पर घूम रही थीं और कान अनाउंसमेंट पर लगा हुआ था। यूं...

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पुष्कर बन्धु की 5 कविताएं

पुष्कर बन्धु काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातक व परास्नातक ( हिन्दी साहित्य ) 2017 । सोशल मीडिया पर कविताओं का प्रकाशन । साहित्य , समाज और राजनीति में  गहरी रुचि । पता – हौसला सिंह लॉज, नसीरपुर, सुसुवाहि , हैदराबाद गेट , BHU चयन और प्रस्तुति : विहाग वैभव  ...

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नदी पर रोहित ठाकुर की 4 कविताएं

रोहित ठाकुर जन्म तिथि – 06/12/ 1978 शैक्षणिक योग्यता  –   परा-स्नातक राजनीति विज्ञान,विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित, विभिन्न कवि सम्मेलनों में काव्य पाठ   वृत्ति  –   सिविल सेवा परीक्षा हेतु शिक्षण   रूचि : – हिन्दी-अंग्रेजी साहित्य अध्ययन  पत्राचार :- जयंती- प्रकाश बिल्डिंग, काली मंदिर रोड,संजय गांधी नगर, कंकड़बाग , पटना-800020, बिहार  मोबाइल...

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भास्कर चौधुरी की 10 कविताएं

1 माँ का आना माँ के आते ही मैं असहज हो जाता हूँ हो जाती है पत्नी असहज हम दोनों के कान खड़े छोटी-छोटी बातों को पकड़ लेने की क्षमता एक-ब-एक दुगुनी-तिगुनी हो जाती है   माँ के आते ही खुश हो जाती है हमारी चार साल की बिटिया वह...

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रमेश शर्मा की पांच कविताएं

  रमेश शर्मा जन्म: 06.6.1966, रायगढ़ छत्तीसगढ़ में . शिक्षा: एम.एस.सी. (गणित) , बी.एड. सम्प्रति: व्याख्याता सृजन: एक कहानी संग्रह मुक्ति 2013 में बोधि प्रकाशन जयपुर से प्रकाशित . छह खंड में प्रकाशित कथा मध्यप्रदेश के छठवें खंड में कहानी सम्मिलित . *कहानियां: समकालीन भारतीय साहित्य , परिकथा, हंस ,पाठ...

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शहंशाह आलम की पांच कविताएं

  शहंशाह आलम जन्म : 15 जुलाई, 1966, मुंगेर, बिहार शिक्षा : एम. ए. (हिन्दी) प्रकाशन : ‘गर दादी की कोई ख़बर आए’, ‘अभी शेष है पृथ्वी-राग’, ‘अच्छे दिनों में ऊंटनियों का कोरस’, ‘वितान’, ‘इस समय की पटकथा’ पांच कविता-संग्रह प्रकाशित। सभी संग्रह चर्चित। आलोचना की पहली किताब ‘कवि का...

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प्यार की रगड़ वाला कवि नीलकमल

  शहंशाह आलम मेरे पास एक माचिस की डिबिया है माचिस की डिबिया में कविता नहीं है माचिस की डिबिया में तीलियाँ हैं माचिस की तीलियों में कविता नहीं है तीलियों की नोक पर है रत्ती भर बारूद रत्ती भर बारूद में भी कहीं नहीं है कविता आप तो जानते...

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अनिरुद्ध सिन्हा की छह ग़ज़लें

  अनिरुद्ध सिन्हा नाम –अनिरुद्ध सिन्हा जन्म -2 मई 1957 शिक्षा –स्नातकोत्तर प्रकाशित कृतियाँ ——————– -(1)नया साल (2)दहेज (कविता-संग्रह ) (3)और वे चुप हो गए (कहानी-संग्रह)  (4)तिनके भी डराते हैं  (5)तपिश  (6)तमाशा (7)तड़प  (8)तो ग़लत क्या है (ग़ज़ल-संग्रह) (9)हिन्दी-ग़ज़ल सौंदर्य और यथार्थ (10)हिन्दी-ग़ज़ल का यथार्थवादी दर्शन(11)उद्भ्रांत की ग़ज़लों का सौंदर्यात्मक...

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गांव पर डी एम मिश्र की पांच ग़ज़लें

  डी एम मिश्र एक नम मिट्टी पत्थर हो जाये ऐसा कभी न हो मेरा गाँव, शहर हो जाये ऐसा कभी न हो। हर इंसान में थोड़ी बहुत तो कमियाँ होती हैं वो बिल्कुल ईश्वर हो जाये ऐसा कभी न हो। बेटा, बाप से आगे हो तो अच्छा लगता है...

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भावना सिन्हा की तीन कविताएं

  डॉ भावना सिन्हा जन्म तिथि -19 जुलाई शिक्षा – पीएचडी (अर्थशास्त्र ) निवास – गया ,बिहार ईमेल — sbhawana190@ gmail.com प्रकाशित कृतियां– यथावत, अंतिम जन, पुस्तक संस्कृति आदि कुछ पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित । 1. पांच बज गए पांच बज गएअभी तक नहीं आए पापा पापा  अब तक क्यों नहीं आएकहीं...

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आनन्द विश्वास के चार गीत

  आनन्द विश्वास जन्म तारीखः– 01- 07-1949 जन्म एवं शिक्षा- शिकोहाबाद (उत्तर प्रदेश) अध्यापन- अहमदाबाद (गुजरात) और अब- स्वतंत्र लेखन (नई दिल्ली) प्रकाशित कृतियाँ- *देवम* (बाल-उपन्यास) (वर्ष-2012) डायमंड बुक्स दिल्ली। *मिटने वाली रात नहीं* (कविता संकलन) (वर्ष-2012) डायमंड बुक्स दिल्ली। *पर-कटी पाखी* (बाल-उपन्यास) (वर्ष-2014) डायमंड बुक्स दिल्ली। 4.*बहादुर बेटी* (बाल-उपन्यास)...

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पल्लवी मिश्रा की दो कविताएं

  पल्लवी मिश्रा असिस्टेंट प्रोफेसर राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, डोईवाला, देहरादून एक पन्नों पर कलम दर्ज़ करती है, दिनों की बर्खास्तगी रातों के बदलते मायने, पन्नों की तारीखें बयाँ करती हैं – दिनों के दस्तावेज़ो में कमतर होती रोशनी और महसूस होती है कलम की मायूसी l पन्नों पर बने फूल,चिड़ियाँ,तारे...

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अंशू सिंह की कविता ‘अंतहीन भूख’

                  अंशू सिंह जन्म 30 अक्टूबर 1987 वाराणसी   काशी हिन्दू वि वि  से स्नातक एवं   स्नातकोत्तर मिट न सकी अंतहीन भूखअभ्यंतर से मेरे अभ्यंतर से बार बार पुनःजन्म हुआचाहिये मुझकोभरपाईतृप्त भरपाई संकीर्ण से अनंततक की प्यास पुनः बुझानी है कालविजयी दशाओं मेंअक्सर भूखा थाउस रोज़ और प्यासा था जब फूटती थीएक...