Tagged: home

2

डॉ दिग्विजय शर्मा “द्रोण” की तीन कविताएं

डॉ दिग्विजय शर्मा “द्रोण” शिक्षा- एम ए (हिंदी, भाषाविज्ञान, संस्कृत, पत्रकारिता), एम फिल, पीएच डी,। विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं व वेब मीडिया तथा ई-पत्रिकाओं में अनेक लेख, कविताएँ प्रकाशित। राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों में सहभागिता। अनेक संस्थाओं से सम्मानित। सम्प्रति- अध्यापन, केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा (भारत) में सेवारत। मोबाइल — 8909274612...

0

संजीव ठाकुर की बाल कथा ‘जालिम सिंह’

स्कूल का चपरासी बच्चों को बहुत बदमाश लगता था। बच्चे उसे जालिम सिंह नाम से पुकारते थे। जालिम सिंह स्कूल के बच्चों पर हमेशा लगा ही रहता था। किसी को मैदान में दौड़ते देखता तो गुस्साता, झूले पर अधिक देर झूलते देखता तो गुस्साता। कोई बच्चा फूल तोड़ लेता तब...

0

शहादत ख़ान की कहानी वेलेंटाइन डे

शहादत शिक्षा-           दिल्ली विश्वविद्यालय के भीमराव अंबेडर कॉलेज से बी.ए. (विशेष) हिंदी पत्रकारिता। संप्रीति-         रेख़्ता (ए उर्दू पोएट्री साइट) में कार्यरत। मोबाईल-        7065710789 दिल्ली में निवास। कथादेश, नया ज्ञानोदय, समालोचना, कथाक्रम, स्वर्ग विभा, परिवर्तन, ई-माटी और जनकृति सहित आदि पत्रिकाओं में कहानियां प्रकाशित। वेलेंटाइन-डे...

0

भास्कर चौधुरी की दस कविताएं

भास्कर चौधुरी पता : 1 / बी / 83,        बालको        जिला : कोरबा (छ.ग.)        495684        मोबाइल न. : 9098400682 Bhaskar.pakhi009 @gmail.com परिचय जन्म: 27 अगस्त 1969 रमानुजगंज, सरगुजा (छ.ग.) शिक्षा: एम. ए. (हिंदी एवं अंग्रेजी) बी एड प्रकाशन: एक काव्य संकलन ‘कुछ हिस्सा तो उनका भी...

0

प्रेम नन्दन की पांच कविताएं

 प्रेम नंदन जन्म – 25 दिसम्बर 1980,को फतेहपुर (उ0प्र0) के फरीदपुर गांव में| शिक्षा – एम.ए.(हिन्दी), बी.एड.। पत्रकारिता और जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा। लेखन – कविता, लघुकथा, कहानी, आलोचना । परिचय – लेखन और आजीविका की शुरुआत पत्रकारिता से। दो-तीन वर्षों तक पत्रकारिता करने तथा तीन-चार वर्षों तक भारतीय रेलवे में स्टेशन मास्टरी  के पश्चात...

1

सुरेंद्र भसीन की चार कविताएं

सुरेन्द्र भसीन पेशे से एकाउंटेंट, कई निजी  कंपनियों में काम किया। पता के 1/19A, न्यू पालम  विहार, गुड़गांंव, हरियाणा मो-9899034323 मेरी बेटी /सबकी बेटी मैं जब भी अपनी बीवी की आँखों में देखता हूँ उसमें मेरी बेटी का चेहरा नजर आता है। जो बड़ी होकर अपने पति को जैसे बड़ी उम्मीद से याचक होकर निहार रही है तो मैं बिगड़ नहीं पाता हूँ वहीं ढीला पड़ जाता हूँ। क्रोध नहीं कर पाता उबलता दूध जैसे छाछ हो जाता है. हाथ-पांव शरीर और दिल अवश होकर जकड़ में आ जाता है और आये दिन अख़बारों में पढ़े अच्छे-बुरे समाचारों की सुर्खियाँ याद आ-आकर मुझे दहलाने लगती हैँ। और मेरी पाशविक जिदें, नीच चाहतें बहुत घिनौनी और बौनी होकर मेरा मुँह  चिढ़ाने लगती है। कोई भला ऐसे में कैसे अपने परिवार को भूल अपनी बेटी के भावी सुखों को नजरअंदाज कर अपना सुख चाहता है ? वह ऐसा बबूल कैसे बो सकता है जिसे काटने की सोचते ही उसका कलेजा मुँह  को आता है? तभी जब मैं कुछ कहने को होता हूँ...

0

भास्कर चौधुरी की दस कविताएं

भास्कर चौधुरी जन्म: 27 अगस्त 1969 रमानुजगंज, सरगुजा (छ.ग.) शिक्षा: एम. ए. (हिंदी एवं अंग्रेजी) बी एड प्रकाशन: एक काव्य संकलन ‘कुछ हिस्सा तो उनका भी है’ एवं गद्य संकलन (यात्रा वृतांत) ‘बस्तर में तीन दिन’ प्रकाशित। लघु पत्रिका ‘संकेत’ का छ्टा अंक कविताओं पर केंद्रित. कविता, संस्मरण, समीक्षा आदि...

1

डाॅ. मृणालिका ओझा की कहानी ‘पिता, जाने के बाद’

  उस वक्त भैया गए थे, पिता जी के साथ, उनके अंतिम प्रवास पर। नाव पर नाविक भी था और जीजा जी भी। आज बीच संगम, नदियों के मंझधार, वे पिताजी को पूरी तरह छोड़ आएंगे। अब वे पिताजी की अत्यधिक पानी खर्चने की आदत से परेशान नहीं होंगे। बीच...

0

भावना की तीन कविताएं

संवेदनाओं का पौधा अधिकांश औरतें जब व्यस्त होती हैं खरीदने में साड़ी और सलवार सूट तो लेखिकाएं खरीदती हैं अपने लिए कुछ किताबें ,पत्रिकाएॅ और कलम अधिकांश औरतें जब ढूंढती हैं इन्टरनेट पर फैशन का ट्रेंड तो लेखिकाएं तलाशती हैं ऑनलाइन किताबों की लिस्ट अधिकांश औरतें जब नाखून में नेलपाॅलिश...

0

राकेश रोहित की सात कविताएं

जब सब लौट जायेंगे सब जब घर लौट जायेंगे मैं कहाँ जाऊंगा इतनी बड़ी दुनिया में नहीं है मेरा कोई वृक्ष! मेरे जीवन में कुछ कलरव की स्मृतियाँ हैं और एक पुराने स्कूल की जिसकी दीवार ढह गयी थी मास्टर जी की पीठ पर छुट्टी का घंटा बजने पर जहाँ...

1

अंजना वाजपेई की कविता ‘ये शेष रह जाएंगे’

कुछ गोलियों की आवाजें बम के धमाके , फैल जाती है खामोशी …नहीं, यह खामोशी नहीं सुहागिनों का ,बच्चों का, मां बाप का करूण विलाप है, मूक रूदन है प्रकृति का , धरती का ,आकाश का …..जलेंगी चिताएं और विलीन हो जायेंगे शरीर जो सिर्फ शरीर ही नहीं प्यार है...

0

गौतम कुमार ‘सागर’ की चार कविताएं

एक उम्र  की सुराही से रिस रहा है लम्हा लम्हा बूँद बूँद और हमें मालूम तक नहीं पड़ता कितनी स्मृतियाँ पुरानी किताब के जर्द पन्ने की तरह धूमिल पड़ गई हमें मालूम तक नहीं पड़ता बिना मिले , बिना देखे कितने अनमोल रिश्ते औपचारिकता में तब्दील हो जाते है हमें...

0

सविता मिश्रा की दो लघुकथाएं

एक “क्या हुआ बेटा ? तेरी आवाज क्यों काँप-सी रही हैं ? जल्दी से बता ..हुआ क्या ..?” “माँ वो गिर गया था सुबह-सुबह…।” “कैसे, कहाँ गिरा, ज्यादा लगी तो नहीं ? डॉक्टर को दिखाया! क्या बताया डॉक्टर ने ?” “न माँ ज्यादा तो नहीं लगी, पर डॉक्टर कह रहे...

0

डॉ संगीता गांधी की लघुकथा ‘गंवार’

“ए, ये क्या कर रहा है ?” खेत के कोने में दीर्घशंका को  बैठे रमेश को देख  चौधरी साहब ने कहा । चौधरी साहब  मुम्बई में रहते थे ।गांव में भी घर था तो दो -चार साल में गांव का चक्कर लगा लेते थे । ……….गांव वाले उनकी नज़र में...

0

संजीव ठाकुर की कविता ‘वे भूल गए’

वे भूल गए वे दिन जब बाढ़ में डूबे गाँव से निकलते थे सतुआ खाकर चिलचिलाती धूप में जाते थे शहर के कॉलेज नंगे पाँव ! अब वे महानगर में माल रोड पर रहते हैं चार कमरों के मकान में ए॰सी॰ में सोए बगैर नहीं निकलता पेट का पाखाना कमोड...

0

मनोज चौहान की तीन कविताएं

ऐ कविता   दस्तक देना तुम कभी ऐ कविता दिनभर कमर तोड़ चुके ईंट-भठ्ठे के मजदूरों की उन बास छोड़ती झुग्गियों में बीड़ी के धुंएं और सस्ते देशी ठर्रे के घूंट पीकर जो चाहते हैं मिटा देना थकान और चिंताओं को व भीतर उपजती वेदना को भी और बुनते हैं सपनों...

0

आरती आलोक वर्मा की दो कविताएं

मैं आज की नारी हूं ढूंढते रहे हर वक्त खामियां दर खामियां दोष मुझमें था या तुम्हारे नजरिए में नापसन्द थी तुम्हेें हर वो चीज, व्यक्ति या परिस्थितियाँ जो मुझे बेहद पसंद थी । मेरे किसी फैसले तक आने से पूर्व, सुना देते अपना निर्णय या फिर धमकियाँ तलाक की...

0

नूर मुहम्मद नूर की पांच ग़ज़लें

एक क्या पता क्यों खुशी सी होती है ज़िन्दगी ज़िन्दगी सी होती है ऐ अंधेरो! अभी जरा ठहरो मुझमें कुछ रौशनी सी होती है किससे पुछूं, कोई बतलाए क्यों? दोस्ती दुश्मनी सी होती है दिल भी घबरा रहा है हैरत से उसमें कुछ आशिक़ी सी होती है कौन बतालाए शायरी...

0

शिवदयाल की कहानी ‘मुन्ना बैंडवाले उस्ताद’

इतनी सी बारात पार्टी और इतना विलम्ब! कुल पचास साठ से ज्यादा लोग नहीं रहे होंगे। जमाने के हिसाब से यों बाराती कुछ संकोची और गम्भीर दिखते थे। हम वधू पक्षवाले कोई घंटे भर से उनके सत्कार के लिए खड़े थे, बल्कि थक गये थे। कई लोग तो नौ बजे के बाद घर लौटने लगे थे। मेरा भी यही विचार था। मैंने पत्नी को बताया तो कहने लगी- मौसी बुरा मानेंगी।  कम से कम बारात लगने तक तो रुकना पड़ेगा। शादी पत्नी की मौसेरी बहन की थी, गो सीधी मौसेरी बहन नहीं, उसकी माँ की चचेरी बहन की लड़की। मरता क्या न करता, मुझे खड़ा रहना पड़ा। अब जब कि बारात लग ही रही थी तो मैं बहुत राहत महसूस कर रहा था। बारात पार्टी के कुछ नौजवान सदस्यों में जोश था। वे आत्ममुग्ध से क्लैरिनेट और ड्रम की बीट्स पर मटक रहे थे। बारात है, बाजा है तो नाच है। कुछ महिलाएँ भी बारातियों में शामिल थीं और उनमें से कुछ तालियाँ बजा-बजाकर नाचनेवालों का उत्साह बढ़ा रही थीं। मेरे सबसे नजदीक सोजोफोन लिये एक बाजावाला खड़ा था। मुझे इसका गुमान तब हुआ जबकि उसकी भारी और कर्कश आवाज ने मुझे बुरी तरह चौंका दिया। जैसे बकरियों की मिमियाहट के बीच सहसा शेर ने दहाड़ मारी हो। ड्रम तेज होकर अचानक खामोश हो गया – ढन्-ढना-ढन-ढन्! कुछ ही क्षणों बाद क्लैरिनेट की सुरीली आवाज फिज़ा में उभरी। मालूम पड़ता था कि इस नयी धुन के खामोश होने के बाद ही बाराती-घराती गले मिल पाएँगे। मुझे बहुत ताज्जुब हो रहा था। नयी धुन पुराने फिल्मी गाने की थी-“पंख होते तो उड़ आती रे … ”, मैं उस उत्सव भरे माहौल से जैसे ऊपर उठ गया – हवा में। पहले तो लगा मानो बहुत दूर कहीं यह धुन बज रही है, फिर लगा यह धुन मेरे ही अन्दर बज रही है, जाने कब से बज रही है-बरसों से। मुझे आश्यर्च वैसे इस बात पर भी हो रहा था कि आज के इस ’राॅक’ और ’पाॅप’ के दौर में बाजेवाले इतनी हिम्मत का काम कैसे कर बैठे कि ’पंख होते तो  उड़ आती रे……’ बजा लें। मेरी दिलचस्पी अब बारातियों की बजाय बाजावालों में थी। पोशाक उनकी अच्छी थी। लाल, हरे, सुनहरे रंग की यूनिफार्म में वे सजे-धजे थे लेकिन क्लैरिनेट वाला आदमी यानी मास्टर पतलून-कमीज में था। धुन मुश्किल थी। वह जब बाजे में फूँक मारता तो उसके गाल छोटे-छोटे गुब्बारों की तरह फूल जाते और गर्दन का रेशा-रेशा ऐसा तन जाता कि मानो अब फटा कि तब। जबकि चेहरा पसीने से तर-ब-तर जिस पर वह अवकाश मिलने पर रूमाल फिरा लेता। ड्रमवाला कहीं प्रफुल्लित दिखता था। नौजवान था सत्रह-अठारह का, गोरा, खूबसूरत। ड्रम ठोकते हुए बार-बार उस्ताद को देख लेता था। एक बार किंचित् तेज ठोक बैठा हो, उस्ताद ने झट उसकी ओर कड़ी नजरों से देखा और हाथ से इशारा किया-हौले से, आहिस्ता से। “पंख होते तो उड़ आती रे …….।” मैं बाजेवाले को देख रहा था और कभी-कभी फूलों से सजी धजी कार के अन्दर बैठे दूल्हे को भी देख लेता था, जो गर्मी से परेशान दिखता था। लेकिन मेरा मन न जाने कहाँ, किन दिशाओं में भटक रहा था। पता नहीं मैं क्या भूल रहा था और क्या याद कर रहा था। तभी ड्रमवाले ने शायद फिर गलती की। उस्ताद इस बार फिर गुर्राये। वह झेंपकर हँसने लगा, जैसे अपनी गलती मान ली हो। उस्ताद अब बिल्कुल मेरे सामने खड़े थे। गहरा साँवला परेशान चेहरा, उभरी हुई कनपटियों की नसें, तलवार-कट मूँछें, किन्हीं सोच में दाखिल आँखों के ऊपर छोटी भवें, लम्बी-सी नाक और अधपके बाल छोटे-छोटे। बायीं गाल पर नाक की जड़ के पास एक बड़ा सा मस्सा भी दूधिया रोशनी में दिखने से बच न सका। “अजीज मियाँ….” बेसाख्ता मेरे मुँह से निकला। ’अरे, यह तो अजीज मियाँ हैं’- मैंने अपने आप से कहा। अजीज मियाँ ने अपने आस-पास देखा लेकिन मुझे नहीं और अपने साथियों को एक ओर जाने को कहकर खुद भी उनके पीछे हो लिये। अब द्वार-पूजा हो रही थी, मंगल-गान गाती स्त्रियों में थोड़ी आपाधापी थी। “अजीज मियाँ? आप अजीज मियाँ हैं न?” मैंने उन्हें पीछे से पुकारा। वे रुक गये और पीछे मुड़कर मुझे देखा, अपरिचित निगाहों से। “मुझे पहचाना? मैं सूरज! आप तो बूढ़े हो गये एकदम?” मैं हँसने लगा। वे मुस्कराये लेकिन जैसे अभी मुझे पहचान नहीं पाये थे। “याद आया? मैं सूरज …….. भरत बाबू का लड़का ………?” “अरे बाबू आप? आप तो इतने कद्दावर और सयाने हो गये हैं। मैंने तो सच ही नहीं पहचाना।” “मेरे रिश्तेदार की बेटी की शादी है। मैंने तो आपको पहचान लिया। आपने ऐसी धुन ही बजायी जो और कोई बजा ही नहीं सकता। ” मैं फिर हँसने लगा। “आप तो नाहक मुझे बना रहे हैं। और सुनाइए, सब खैरियत तो है? बाबूजी कैसे हैं? चाची कैसी हैं?” “सब लोग ठीक हैं लेकिन आपने ये आप-आप क्या लगा रखी है? मैं तो वही पुराना सूरज हूँ अजीज मियाँ।’’ “आपका बड़प्पन है बाबू आप इतने बड़े हो गये तो आपको तो आप ही कहूँगा न।” “अच्छा नहीं लगता।” “अच्छा बाबा क्या हो रहा है इन दिनों ? शादी-ब्याह किया कि नहीं?” “नौकरी हो रही है। शादी हुए तीन साल हुए। साल भर का एक बच्चा भी है अब तो ।” “खुदा सलामत रखे, बरकत दे। खूब फूलो-फलो …….” “और आप कैसे हैं? बाल-बच्चे सब कैसे हैं?” अजीज मियाँ हँसे, मुँह उठाकर। मुझे कुछ समझ में नहीं आया। तब तक ट्रे में नाश्ता चला आया। मैंने उन्हें पकड़ाया। मैं खुद तो कर चुका था। “लीजिए, आप हँस क्यों रहे हैं?” “तो क्या करें, तुमने बात ही ऐसी पूछ ली?” “क्यों? आपके बच्चों के बारे में ही तो पूछा।” “कोई हो तब तो बताएँ बाबू।” वे फिर हँसे। “ओह लेकिन ऐसा क्यों?” “शादी होती तभी तो औलाद होती।” “क्या कहते हैं, अजीज मियाँ! आपने अब तक दुनिया भर के लोगों की बारातें सजायीं और खुद….?” “यही तो ऊपरवाले का खेल है। उसने मुझे इस लायक समझा ही नहीं। और मैं भी फिजूल झंझटों से बच गया।” सहसा मुझे उनकी जवानी याद आ गयी। हम तब बच्चे थे, यही कोई आठ-दस बरस के। उनकी बहन और मेरी बहन अच्छी सहेलियाँ थीं। दोनों साथ-साथ स्कूल जाती। हालाँकि बाद में अनारो, हाँ यही नाम था उनका, ने स्कूल जाना बन्द कर दिया था। लेकिन दोनों सखियों की दोस्ती को इससे खास फर्क नहीं पड़ा था। मैं भी बहन के साथ कभी-कभी उनके घर जाता। उनके अब्बा को हमारे यहाँ सभी खाँ साहब कहते थे। वे दमा के मरीज थे और अक्सर खाँसते रहते। मैं जब कुछ सयाना हुआ तब समझ हुई कि ’खाँ साहब’ की संज्ञा का उनकी खाँसी से कोई सम्बन्ध नहीं था, बल्कि उनका नाम ही था मुहम्मद बशर खाँ। तब नेम प्लेटों का चलन नहीं था, वह भी निम्न-मध्य वर्ग में। हम बच्चे तो उस वक्त नेम प्लेट को साइन बोर्ड ही कहते थे और एक-दूसरे के पिताओं के ठीक-ठीक नाम नहीं जानते थे। खैर, खाँ साहब अक्सर होठों में बीड़ी दबाये रहते और उनकी बकरी, जो दरअसल बकरा हुआ करता था, को पत्ते वगैरह खिलाने में मशगूल रहते। लम्बे सफेद बालों से उनका आधा माथा ढँका रहता। हम बच्चों को उनके बकरे में खासी दिलचस्पी थी। हम जब भी उसे छूते या छूने की कोशिश करते, वह उछल-उछलकर हमें अपनी छोटी-छोटी सींगों पर तोलने की कोशिश करता। यह खेल का उसका तरीका था। फिर एक दिन अचानक उनका बकरा गायब हो जाता। हम अन्दर से रुआँसे हो जाते और उसकी चिकनी-चमकीली-चितकाबरी खाल और लम्बे-लम्बे कान याद करते रह जाते। तब तक नया मेमना खूँटे से बँध जाता। अजीज मियाँ और हमारे परिवार के बीच रिश्ते की एक और कड़ी थी और वह था भूरे रंग का एक रोबदार कुत्ता । था तो खाँटी देशी लेकिन दुनिया भर के अलशेशियंस पर बीस बैठता था। उसका डील-डौल और उसकी गुर्राहट अच्छों-अच्छों का खून जमा देती थी। खाँ साहब को वह कुत्ता बहुत प्यारा था मगर उनको हमेशा मलाल रहा कि हमलोगों ने उनके कुत्ते को उनका नहीं रहने दिया। कम्बखत खाता उनका था मगर वक्त काटने के लिए उसे जैसे हमारे घर का अहाता ही मुफीद पड़ता था। उसे किसी ने जहर दे दिया था, वह मरा भी तो ऐन हमारे आँगन की चौखट पर। मुझे अजीज मियाँ के घर जाना हमेशा अच्छा लगता क्यों कि मुझे वहाँ वह सब कुछ देखने-सुनने को मिलता जो और किसी के यहाँ मैंने कभी नहीं देखा। अनारो दीदी हमेशा सफेद, मटमैले से दुपट्टे से अपना सर ढँके रहती। उनकी अम्माँ बराबर पान चबाती रहतीं। उनके दाँत बिल्कुल काले थे, वे हँसतीं तो कभी-कभी डर लगता। नाक में उनके सोने की मोटी-सी कील (लौंग) चमकती रहती जो चमकती कम थी दिखती ज्यादा थी। वैसे वे हँसमुख महिला थीं और हमसे खूब हालचाल पूछती थीं। हाँ, टूटे-फूटे पलस्तरवाले बरामदे में एक कोने में रखा टोंटीवाला लोटा (बधना) मुझे सबसे ज्यादा चकित करता। मुझे हैरत होती कि आखिर उस लोटे में नलकी की क्या जरूरत थी। वह हमेशा चाय की केतली का स्थानापन्न ही नजर आता। बाद में मैंने अपनी अम्माँ से एक बार वैसा ही लोटा खरीदने की सिफारिश की तो वे देर तक मुझे गोद में लिये हँसती रहीं।कुतूहल के और भी सामान थे जिन्हें मैं कभी छूकर तो कभी दूर से निहारा करता। टिन की गहरी, बैंगनी रंग के किनारेवाली प्लेटें उस घर के सिवा कहीं नहीं दिखतीं। लकड़ी के एक गन्दे से आले पर आईना रखा होता जिसकी परत जगह-जगह से झाँक रही होती। उसके एक ओर मीनारों के रंग-बिरंगे चित्र और अरबी में लिखी इबारतें मुझे कभी समझ में नहीं आतीं। हम दोस्तों के बीच अक्सर चर्चा होती कि अजीज मियाँ के घर में भाला-बल्लम और चमचमाती तलवारें हैं लेकिन इसी कमरे के कोने में मुझे बस एक लम्बी-सी बरछी खड़ी दिखाई देती जिसके फल पर जंग लगी होती। आईनेवाले आले पर इत्र की छोटी-छोटी रंग-बिरंगी शीशियाँ रखी होतीं। कभी कभी अजीज मियाँ एक छोटे पनडब्बेनुमा डब्बे से रुई का फाहा निकालकर उसे एक सींक में लपेट देते और उसे इत्र में डुबोकर मुझे पकड़ा देते। इत्र की वह महक अब तक मेरी साँसों में वैसी की वैसी बनी हुई है। उन मुहल्लों में बीते बचपन की मीठी यादें उस महक से सराबोर हैं, सुवासित। अजीज मियाँ को घर में लोग मझलू कहकर पुकारते थे। दरअसल उनसे भी छोटे एक भाई थे जो बचपन में ही गुजर गये थे। इस तरह मँझला होने के कारण वे मझलू कहे जाते थे। उनके बड़े भाईजान बड़े धीर-गम्भीर-से दिखाई देते। हम उनके पास फटकने से भी डरते। बड़े मियाँ का कुछ कारोबार था। क्या था, न कभी हमें मालूम हुआ न समझ में आया। हम उनके घर जब भी गये, खाँ साहब को मझलू मियाँ को ही खरी-खोटी सुनाते देखा। जबकि अजीज मियाँ हमारे लिए सचमुच बड़े अजीज थे। वे हमसे बहुत हिलगे रहते। बाद के दिनों में जब खाँ साहब ने मुर्गीखाना खोेला तो अजीज मियाँ हमारे अनुरोध पर कभी-कभी नन्हे चूजों को एकदम पास से देखने की इजाजत दे देते। हम चूजों को देखकर हैरान और उतने ही खुश होते और मन ही मन अजीज मियाँ को बहुत धन्यवाद देते। अनारो दीदी अपने मझलू भाईजान की तारीफ करने का कोई मौका नहीं छोड़ती थीं। मेरे घर में हालाँकि उन्हें एक दो टके का आदमी ही समझा जाता था, उन्हें गम्भीरता से लेने की बात तो दूर रही। मैट्रिक में कई बार फेल होकर उन्होंने आखिरकार पढ़ाई ही छोड़ दी थी। मेरे घर में बेपढ़े लोगों को अच्छी निगाह से नहीं देखा जाता था। वैसे अपने शौकों को लेकर मेरे घर में भी वे अक्सर चर्चा में रहते। मुझे एक दफा कुकुरखाँसी हो गयी थी तो उन्होंने फूँक मारकर पानी पिलाया था। मुझे तो याद नहीं लेकिन अम्माँ कहती है, मैं तीसरे दिन एकदम ठीक हो गया था। उनके दूसरे शौक के बारे में हम बच्चों को कुछ अजब ही ढंग से पता चला। मुहल्ले की मुख्य सड़क पर बाजार के नजदीक बाजे की एक दुकान थी-’मुन्ना बैंड’। यहाँ अक्सर रियाज चल रहा होता, खासकर दोपहर के समय। नये-पुराने फिल्मी गानों की धुनें बजती रहतीं। शादी-ब्याह और देशभक्ति गीतों की धुनें भी कभी-कभी बजती होतीं। हम घरवालों की नजरें बचाकर कभी-कभी उस दुकान के सामने जाकर चुपचाप खड़े हो रहते। उस्ताद बूढ़े थे, बड़े-बड़े सन जैसे बालोंवाले। वे क्लैरिनेट बजाते और शागिर्दों को हाथ से, आँख से निर्देश देते जाते। उनके गाल दो छोटे गुब्बारे बन जाते और गर्दन की मानो झिल्लियाँ तक दिखाई देने लगतीं। हम धुनों से ज्यादा चेहरों और बाजों में दिलचस्पी रखते। शागिर्द उस्ताद से बहुत भय खाते। वे सहमे हुए चुपचाप उनका निर्देश मानते। एक दिन जब हम वहाँ पहुँचे तो उस्ताद हमें देखकर मुस्कराये। वे अबतक हमें पहचानने लगे थे। हमारा नाम पूछा और बैठने को कहा। हम चुपचाप बेंच पर बैठ गये। धुन शुरू हुई -“पंख होते तो उड़ आती रे, रसिया ओ बालमा…….।” उस्ताद के क्लैरिनेट से संगीत लहरी गूँजी। उसके पीछे बाकी साज सक्रिय हुए। ड्रमर को उस्ताद ने बीच में रुककर धुन की बारीकी समझायी और ट्रम्पेटवाले को बाजा पकड़ने का कायदा सिखाया। और तब हम देखकर चैंक गये कि ट्रम्पेट और कोई नहीं, अजीज मियाँ सँभाले बैठे थे। मेरे मुँह से अचानक निकला – ‘अजीज मियाँ.. ‘ । वे देखकर मुस्कराये लेकिन जैसे घबराये भी। मुँह पर अँगुली रखकर मुझे चुप रहने को कहा। वे अच्छा बजा ले रहे थे। हमारे सामने ही गाना खत्म होने पर उस्ताद ने उन्हें शाबाशी दी लेकिन डाँट भी पिलायी, “अबे लौंडे, खामख्वाह तू क्यों इस शौक के पीछे पड़ा है? यह बर्बाद करनेवाला है! खाँ साहब सुनेंगे तो उन्हें अलग तकलीफ होगी। तू कोई धन्धा सँभाल, यह गाजे-बाजे का झमेला छोड़।“ अजीज मियाँ ने झेंपकर अपनी दुपल्ली टोपी ठीक की और मुस्कराकर मुझे देखा। हम साथ-साथ घर लौटे। रास्ते में हम बच्चों को उन्होंने लेमनचूस खरीद कर दिया और कहा कि यह बात हम कभी किसी से नहीं कहेंगे। खासकर उन्होंने मुझे इस बात के लिए सख्त ताकीद की। इस बात को कोई चार-छह महीने गुजरे होंगे कि बाबूजी का तबादला हो गया। अजीज मियाँ और उनके कुनबे का किस्सा वहीं खत्म हो गया। “ये धन्धा कैसा चल रहा है?” “कैसा क्या, बस किसी तरह गुजर हो जाती है बाबू!” “चाचा कैसे हैं?” वे प्लेट में बची नमकीन खा रहे थे। “अब्बा का इन्तकाल हो गया। कई बरस हो गये।” “अरे! और चाची?” “अम्माँ हैं। बिस्तर से लगी हुई हैं।” “ओह! और सब लोग कैसे हैं? अनारो दीदी ?”...

0

प्रतिभा चौहान की पांच कविताएं

||हमारे फूल -तुम्हारे नक्शे|| तुम्हें उलझे हुए आदमी हो तुम सुलझा नहीं  सके समय की लट को तुमने नहीं सीखा खुशियों से खेलना तुम्हें नहीं आता सीधे सरल सवालों का जवाब देना तुमने तो यह भी नहीं समझा कि डूबते हुए आदमी को तिनके का सहारा होता है तुमने नहीं...