Tagged: JANTANTRA

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शहंशाह आलम की छह कविताएं

हमला हम गहरे, बेहद गहरे अँधकार भरे युग को जी रहे हैं जिसमें हम प्रेम करते हैं तो हम पर हमले किए जाते हैं एक सफल हत्या एक सफल बलात्कार के लिए सम्मानित अब उनके शब्दों के वर्ण विन्यास, अर्थ, प्रयोग, व्युपत्ति, पर्याय यही थे कि उन्हें भेड़ों के साथ...

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पद्मश्री स्वर्गीय बेकल उत्साही को श्रद्धांजलि

एक इक दिन ऐसा भी आएगा होंठ-होंठ पैमाने होंगे मंदिर-मस्जिद कुछ नहीं होंगे घर-घर में मयख़ाने होंगे जीवन के इतिहास में ऐसी एक किताब लिखी जाएगी जिसमें हक़ीक़त औरत होगी मर्द सभी अफ़्साने होंगे राजनीति व्यवसाय बनेगी संविधान एक नाविल होगा चोर उचक्के सब कुर्सी पर बैठ के मूँछें ताने...

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शहंशाह आलम की पांच कविताएं

 विस्थापन मेरा यह विस्थापन करोड़ों-करोड़ बरस का है जाना हुआ जिसमें छिपाने जैसा कुछ भी नहीं न बचाने जैसा कुछ है कुछ है भी बचा हुआ तो वह दूर किया जा चुका है मुझसे   अड़ा खड़ा उस पेड़ को जब हटाया गया बलपूर्वक कितने-कितने पक्षी विस्थापित हो गए बरसात...

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शहंशाह आलम की पांच कविताएं

पेंटिंग : शहंशाह आलम   खोलना खोलने की जहाँ तक बात है लगता है रहस्य का रहस्य आश्चर्य का आश्चर्य तक खोल डाला है किसी परिचित जैसा   लेकिन मेरे जैसे झूठे ने उस घर का द्वार खोला तो लगा कितना कुछ खोलना बाक़ी रह गया है अभी भी  ...

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सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की पांच ग़ज़लें

एक धीरे धीरे ही सही बदल रहा हूं मैं दुनिया के सांचे में ढल रहा हूं मैं। सिसकती है रात, सिसकती रहे सुबह के लिए मचल रहा हूं मैं। अंधेरे के बाद उजाला ही आएगा उम्मीद झूठी है, उछल रहा हूं मैं। इंसां था, जाने कब सांप बन गया आदमी...

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गौरव भारती की दो कविताएं

1. मैं भूखा ….. तुम भी भूखे हो , आओ ,आओ मिलकर भूख मिटायें, इक -दूजे को नोचें खाएं | नहीं खा सके इक -दूजे को ? क्यों न सियासी पेंच लगाएं , बहुत सीखा है इतिहास से हमने , नुस्खा क्यों न वही आजमायें | चलो खेलते हैं  एक...

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नित्यानंद गायेन की दो कविताएं

नित्यानंद गायेन   अगले वर्ष अगले वर्ष फिर निकलेगी झांकी राजपथ पर  भारत भाग्य विधाता  लेंगे सलामी  डिब्बों में सजाकर परोसे जाएंगे  विकास के आंकड़े शहीदों की विधवाओं को पदक थमाएं जाएंगे राष्ट्र अध्यक्षों के शूट की चमक और बढ़ जाएगी  जलती रहेगी अमर ज्योति इंडिया गेट पर  मूक खड़ी...

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मेरे काम के लोग

हेमन्त वशिष्ठ   यहां आबादी बहुत है… लेकिन किसी काम की नहीं… क्षत-विक्षत शरीर, छिन्न-भिन्न अंग वैसे भी किस काम आते हैं… उनका मकसद उनकी आत्माओं को छल चुका है वो पाक-पवित्र रूहें, जो मैने भेजी थी ज़्यादातर दूषित वापिस आ रही हैं खंडित यानी डैमेज़्ड उनकी रहने की वजह...

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चोट करतीं कविताएं

रामस्वार्थ ठाकुर   जनतंत्र जिन्दा है गुंबज पर ध्वज फहरा रहा है संसद चिल्ला रही है सरहद पर भौंक रही हैं संगीनें ‘जनतंत्र जिन्दा है’   बोलो मत बोलो मत शब्द को शीत लग जाएगा अथवा चीनी या जापानी इन्सेफ्लाइटिस का संक्रमण अथवा सांप्रदायिक उन्माद में कोई उसे छूरा भोंक...