Tagged: Kolkata

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सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की कहानी ‘चटकल’

नरेश झुंझला गया। उसे लगा चटकल में बदली मजदूर का काम करना और भीख मांगना बराबर है। पिछले तीन दिनों से लेबर ऑफिस का चक्कर लगा-लगा कर वह हलकान था लेकिन बाबू थे कि काम देने का नाम ही नहीं ले रहे थे। बस एक ही ज़वाब–आज लोक नहीं लागेगा।(आज...

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निर्मल गुप्त की दो कविताएं

मेरे बचपन का कलकत्ता  कलकत्ता कोलकाता हो गया बचपन स्मृति  लिए बाबा गुलाम रसूल की खुरदरी अंगुली थामे हुगली किनारे आज भी वहाँ हुमकता है. बाबा की सुनाई कहानी के आलसी बौने और उदास मसखरे आज भी फोर्ट विलियम्स में अलगोजे पर उदास धुन बजाते द्वितीय विश्व युद्ध की यादें...

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‘सड़क पर ज़िंदगी’: मनुष्य-जीवन के संघर्ष-काल को कमाल का शब्द देती कविताएं

पुस्तक-समीक्षा शहंशाह आलम यह सच है कि आदमी के जीवन का संघर्ष रहस्यों से भरा रहता है। ये संघर्ष-रहस्य आदमी के जीवन में चुपचाप चले नहीं आए हैं। मेरे ख़्याल से पूरी चालाकी से दुनिया भर के पूँजीवादियों ने और दुनिया भर की अमीर, क्रूर, दंभी सरकारों ने आदमी के...

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नूर मुहम्मद ‘नूर’ की पांच कविताएं

अंधे और बटेर जब से अंधों के हाथ लगी है बटेर अंधे हरा – हरा हंस रहे हैं उन्हें चारों ओर बस हरा-हरा सूझ रहा है उनकी धृतराष्ट्र आंखों में नई सदी के हरे – हरे सपने हैं नक़्शे हैं लगातार बजाते हुए ताली और करते हुए जुगाली वे पतझड़...

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राज्यवर्द्धन की चार कविताएं

छठ मइया तुम्हें सलामत रखें! एक दीप हर दीपावली में तुम्हारे नाम का आज भी जला आती हूँ – छत पर   रास्ता दिखाने तुम्हारे हृदय तरंगों को पता नहीं कब आ जाये भूले भटके   आज भी तो हिचकी आई थी खाते खाते कहा माँ ने कि कोई याद...

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कथाकार कपिल आर्य का सम्मान

‘सहज व्यक्तित्व वाले कपिल आर्य ने अपने लेखन और संगठनात्मक कार्य से सभी पीढ़ियों को प्रभावित किया  है’ ये कहना है प्रबुद्ध आलोचक-संपादक डॉ श्रीनिवास शर्मा का। मौका था पश्चिम बंगाल प्रगतिशील लेखक  संघ के अध्यक्ष और कथाकार कपिल आर्य के सम्मान का। सम्मान समारोह का आयोजन 7 मई को...

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शहंशाह आलम की चार कविताएं

शहंशाह आलम जिस तरह झरना गूँजता है जिस तरह झरना गूँजता है आत्मीय-आत्मविभोर बार-बार वैसे ही आकाश को गूँजते देखता हूँ हुगली नदी के गान में आनंदित झरने में आकाश में जो कुछ गूँजता है उस गूँज में तुम्हारी भी भाषा की गूँज सुनता हूँ घनीभूत अपनी इस यात्रा की...

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जंगल ज़िन्दगी

कहानी नूर मुहम्मद नूर पिछले पांच दिनों के भयावह अंतर्द्वन्द्व से आज कहीं जाकर नसीम को मुक्ति मिली। सोमवार की दोपहर अपने दो साल के मटमैले चिथड़े पहने, बेटे को अपनी गोद में सुला रही, उस पागल जैसी औरत को देखने के बाद से, निरंतर पांच दिनों की लंबी मानसिक...

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स्मिता मृणाल की दो कविताएं

स्मिता मृणाल रेस्ट इन पीस प्रत्यूषा कितना आसान होता है झूठ के आवरण में सच को छुपा देना जाने कितने ही रहस्य कैद होते हैं इस सच और झूठ के बीच और इन रहस्यों की खोज में हम पाते हैं खुद को तर्क और वितर्क के दो अंतिम छोरों पर...

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सुरेंद्र दीप की तीन कविताएं

सुरेंद्र दीप   मां मां अपने चश्मे पर विश्वास करती है और चश्मे का विश्वास मां से उठता जा रहा है मां डॉक्टर से बार-बार सलाह लेती है डॉक्टर की सलाह उसे जंचती है, अच्छी लगती है वह चाहती है फिर से विश्वास की दुनिया में शामिल होना किलकिलाते शिशुओं...

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हाशिये पर

उदयराज   ”हैलो, कौन?” ”हैलो, मैं श्यामल बोलता। तुम्हारे पीछे से।” ”अरे, श्यामल दा। तुमने इस नाशुक्रे को कैसे याद किया?” ”नहीं दीपक, तुम ऐसा मत बोलो। वो हमारा मिस्टेक था।” ”नहीं, श्यामल दा, कुछ तो सच, अ बिट ट्रूथ तो रहा ही होगा न।” ”हम तुम्हारा बात आज भी...

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तुम्हारी परी

एक परी उनके प्यार की गवाह थी लेकिन अचानक क्या हो गया? परी चुप क्यों हो गई? क्या हुआ उनके प्यार का अंजाम? Read more…