Tagged: labour

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प्रभांशु कुमार की दो कविताएं

लेबर चौराहा और कविता सूर्य की पहली किरण के स्पर्श से पुलकित हो उठती है कविता चल देती है लेबर चौराहे की ओर जहां  मजदूरों की बोली लगती है। होता है श्रम का कारोबार गाँव-देहात से कुछ पैदल कुछ साइकिलों से काम की तलाश में आये मजदूरों की भीड़ में...

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मान बहादुर सिंह की कविता ‘बैल-व्यथा’

  तुम मुझे हरी चुमकार से घेरकर अपनी व्यवस्था की नाद में जिस भाषा के भूसे की सानी डाल गए हो एक खूंटे से बंधा हुआ अपनी नाथ को चाटता हुआ लम्बी पूंछ से पीठ पर तुम्हारे पैने की चोट झाड़ता हुआ खा रहा हूं।   देखो हलधर, मुझे इस...

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मनोज चौहान की तीन कविताएं

ऐ कविता   दस्तक देना तुम कभी ऐ कविता दिनभर कमर तोड़ चुके ईंट-भठ्ठे के मजदूरों की उन बास छोड़ती झुग्गियों में बीड़ी के धुंएं और सस्ते देशी ठर्रे के घूंट पीकर जो चाहते हैं मिटा देना थकान और चिंताओं को व भीतर उपजती वेदना को भी और बुनते हैं सपनों...

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘विवशता’

जब सुबह झुनिया वहाँ पहुँची तो बंगला रात की उमस में लिपटा हुआ गर्मी में उबल रहा था । सुबह सात बजे की धूप में तल्ख़ी थी । वह तल्ख़ी उसे मेम साहब की तल्ख़ ज़बान की याद दिला रही थी । बाहरी गेट खोल कर वह जैसे ही अहाते...

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डाॅ. अजय पाठक के दस गीत

मजदूर-कटारों की कौन यहाॅ सुनता है हम मजदूर-कहारों की। खून पेर कर, करें पसीना क्या गर्मी-सर्दी हक मांगो तो लाठी मारे हमको ही वर्दी जुल्म जबर झेला करते है हम सरकारों की मेहनत अपनी, हुकुम तुम्हारा मालिक तुम हुक्काम बारह घंटे भठ्ठी झोंके फिर भी नमक हराम! नीयत हम भी...

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समकालीन कविता का महत्वपूर्ण दस्तावेज : दिल्ली की सेल्फी कविता विशेषांक

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव लड़ना था हमें भय, भूख और भ्रष्टाचार के खिलाफ हम हो रहे थे एकजुट आम आदमी के पक्ष में पर उनलोगों को नहीं था मंजूर यह। उन्होंने फेंके कुछ ऐंठे हुए शब्द हमारे आसपास और लड़ने लगे हम आपस में ही! वे मुस्कुरा रहे हैं दूर खड़े...

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अमरजीत कौंके की पांच कविताएं

साहित्य अकादमी, दिल्ली ने पंजाबी के कवि , संपादक और अनुवादक डा. अमरजीत कौंके सहित 23 भाषाओँ के लेखकों को वर्ष 2016 के लिए अनुवाद पुरस्कार देने की घोषणा की है. अमरजीत कौंके को यह पुरस्कार पवन करन की पुस्तक ” स्त्री मेरे भीतर ” के पंजाबी अनुवाद ” औरत मेरे...

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विजय ‘आरोहण’ की नौ कविताएं

सारंडा, जंगल और आदिवासी,जल, जंगम और प्रतिरोध की कवितायें 1. हमारे पहाड़ों के बच्चे हमारे पहाड़ों के बच्चे गिल्ली-डंडा खेलते है वह छुप्पम-छुपाई खेलते शाल के पेड़ों के पीछे छिप जाते हैं वह तीर-धनुषों से निशाना साध रहे हैं इसके लिए वह एक बिजुका बनाते हैं और दनदनाती आती है...

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सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की कहानी ‘चटकल’

नरेश झुंझला गया। उसे लगा चटकल में बदली मजदूर का काम करना और भीख मांगना बराबर है। पिछले तीन दिनों से लेबर ऑफिस का चक्कर लगा-लगा कर वह हलकान था लेकिन बाबू थे कि काम देने का नाम ही नहीं ले रहे थे। बस एक ही ज़वाब–आज लोक नहीं लागेगा।(आज...

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मज़दूरों के संघर्ष का देखा-भोगा सच

पुस्तक समीक्षा सुशील कुमार आजादी के इतने सालों बाद भी जब दुनिया के प्रगतिशील देशों में रोटियों के हादसे हो रहे हों तो परिवेश का दबाव कवि को जनाकीर्ण विभीषिका पर कविता लिखने को मजबूर करता है। गोया कि , युवा कवि सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव का पहला काव्य संकलन “रोटियों...

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पंकज चौधरी की चार कविताएं

दिल्ली दिल्ली में समाज नहीं है दिल्ली में व्यक्ति ही व्यक्ति है दिल्ली में राम का नाम नहीं है दिल्ली में सुबह और शाम काम ही काम है दिल्ली में श्रम का दाम नहीं है दिल्ली में श्रम ही श्रम है दिल्ली में प्यार नहीं है दिल्ली में तिज़ारत ही...

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पीड़ा और प्रेम की अजस्र धारा वाली ‘एक नदी जामुनी सी’

पुस्तक समीक्षा सुशील कुमार मालिनी गौतम अंग्रेजी साहित्य की प्राध्यापिका होते हुए हिंदी में लिखती हैं जो हिंदी के लिए एक बड़ी अच्छी बात है। गजल-संग्रह के बाद बोधि प्रकाशन से 2016 में उनकी एक कविता की किताब *एक नदी जामुनी सी* आई है। पूरे संग्रह से गुजरने पर मुझे...

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प्रवीण कुमार की दो कविताएं

पेंसिल, कलम, गुलाब वाले बच्चे ‘क’ से कलम नहीं जानता वह ‘प’ से पेंसिल मायने भी नहीं समझता शायद गुलाब जैसा खुद रहा होगा कभी शायद जन्म लेने के वक्त या कुछ महीनों बाद तक पर अब हो गया है सूखकर कांटे जैसा स्कूल का मुंह नहीं देखा लेकिन कर...

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आरती कुमारी की पांच कविताएं

वह लड़की आती है रोज गन्दे बोरे को अपने कांधे पर उठाए ‘वह’ लड़की’ और चुनती है अपनी किस्मत-सा खाली बोतल, डिब्बे और शीशियां अपने ख्वाबों से बिखरे कुछ कागज के टुकडा़ें को और ठूंस देती है उसे जिंदगी के बोरे में गरीबी की पैबन्दों का लिबास ओढ़े कई पाबन्दियों...

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शहंशाह आलम की पांच कविताएं

पेंटिंग : शहंशाह आलम   खोलना खोलने की जहाँ तक बात है लगता है रहस्य का रहस्य आश्चर्य का आश्चर्य तक खोल डाला है किसी परिचित जैसा   लेकिन मेरे जैसे झूठे ने उस घर का द्वार खोला तो लगा कितना कुछ खोलना बाक़ी रह गया है अभी भी  ...

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महावीर राजी की कहानी ‘पंच’

रेलवे स्टेशन के गर्भ से नाल की तरह निकल कर ऐश्वर्या राय की कमर की तरह छुई मुई सी “स्टेशन सरणी ” शहर के बीचों बीच से गुजरने वाले अजगरनुमा ‘शेर शाह सूरी मार्ग ‘ को जिस स्थान पर लम्बवत क्रॉस करती आगे बढ़ जाती है, वह जगह शहर के...

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रवि सुतार की तीन कविताएं

पासपोर्ट स्विट्ज़रलैंड हो जैसे गाँव का बस स्टैंड खेत से गाँव की दूरी जितनी है उतनी ही दूर तेरे लिए सिडनी है डिनर दुबई में ब्रेकफास्ट के लिए इटली है स्लिम सा ड्रिंक हैबिट तेरी यार तेरा काश्तकार अमली है अंग्रेजन पट गई तू कैसे..?? घास नहीं डालती मुझे गाँव...

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नूर मोहम्मद ‘नूर’ की दस ग़ज़लें

एक बे-देश हो रहल बा जे हिंदोस्तान में हरछन समा रहल बा हमर देह-परान में कुछ ए तरा से लोग बा नेतन के मन में, ओह जइसन के गंदगी हो भरल नाबदान में चहुंओर चित होके पड़ल बा तमाम देश पर झंडा उड़ि रहल बा गजब आसमान में भासा सभे...

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यशपाल निर्मल की दो लघुकथाएं

गर्व   ” घर में कोई है क्या?” सरपंच अवतार सिंह ने आवाज़ लगाई ही थी कि फकीर चंद  दौड़ते हुए दरवाज़े पर पहुँचा । उसने भय और घबराहट से कहा,” मालिक आपने क्यों कष्ट किया? मुझे बुला लेते। ” “क्यों फकीर चंद, हम तुम्हारे घर भी नहीं आ सकते...

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परितोष कुमार ‘पीयूष’ की दो कविताएं

शहरीकरण जब हो रहा था गावों का शहरीकरण बिछाए जा रहे थे कंक्रीट मुनाफों के गोदाम से ला-लाकर जब झोपड़ियों को उजाड़-उजाड़ कर बन रहे थे जानलेवा फ्लाईओवर दी जा रही थी आहुति प्रकृति की परियोजनाओं के धधकते हवनकुंड में, आधुनिकता के नाम पर उस समय फटेहाली का मारा एक...