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डॉ दिग्विजय शर्मा “द्रोण” की तीन कविताएं

डॉ दिग्विजय शर्मा “द्रोण” शिक्षा- एम ए (हिंदी, भाषाविज्ञान, संस्कृत, पत्रकारिता), एम फिल, पीएच डी,। विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं व वेब मीडिया तथा ई-पत्रिकाओं में अनेक लेख, कविताएँ प्रकाशित। राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों में सहभागिता। अनेक संस्थाओं से सम्मानित। सम्प्रति- अध्यापन, केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा (भारत) में सेवारत। मोबाइल — 8909274612...

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शहादत ख़ान की कहानी वेलेंटाइन डे

शहादत शिक्षा-           दिल्ली विश्वविद्यालय के भीमराव अंबेडर कॉलेज से बी.ए. (विशेष) हिंदी पत्रकारिता। संप्रीति-         रेख़्ता (ए उर्दू पोएट्री साइट) में कार्यरत। मोबाईल-        7065710789 दिल्ली में निवास। कथादेश, नया ज्ञानोदय, समालोचना, कथाक्रम, स्वर्ग विभा, परिवर्तन, ई-माटी और जनकृति सहित आदि पत्रिकाओं में कहानियां प्रकाशित। वेलेंटाइन-डे...

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भास्कर चौधुरी की दस कविताएं

भास्कर चौधुरी पता : 1 / बी / 83,        बालको        जिला : कोरबा (छ.ग.)        495684        मोबाइल न. : 9098400682 Bhaskar.pakhi009 @gmail.com परिचय जन्म: 27 अगस्त 1969 रमानुजगंज, सरगुजा (छ.ग.) शिक्षा: एम. ए. (हिंदी एवं अंग्रेजी) बी एड प्रकाशन: एक काव्य संकलन ‘कुछ हिस्सा तो उनका भी...

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प्रेम नन्दन की पांच कविताएं

 प्रेम नंदन जन्म – 25 दिसम्बर 1980,को फतेहपुर (उ0प्र0) के फरीदपुर गांव में| शिक्षा – एम.ए.(हिन्दी), बी.एड.। पत्रकारिता और जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा। लेखन – कविता, लघुकथा, कहानी, आलोचना । परिचय – लेखन और आजीविका की शुरुआत पत्रकारिता से। दो-तीन वर्षों तक पत्रकारिता करने तथा तीन-चार वर्षों तक भारतीय रेलवे में स्टेशन मास्टरी  के पश्चात...

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प्रेरणा शर्मा ‘प्रेेरणा’ की सात प्रेम कविताएं

प्रेरणा शर्मा ‘प्रेरणा’ पेशे से अध्यापिका विभिन्न पत्र – पत्रिकाओं , समाचार पत्रों  में लेख, कविताएं प्रकाशित बोधि प्रकाशन द्वारा  प्रकाशित पुस्तक ‘ स्त्री होकर सवाल करती है ‘  में कविताएं प्रकाशित  हो चुकी हैं । एक प्रभात  के आगमन  से .. निशा  के अवसान  तक .. घूमती  रहती  हूँ...

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सुरेंद्र भसीन की चार कविताएं

सुरेन्द्र भसीन पेशे से एकाउंटेंट, कई निजी  कंपनियों में काम किया। पता के 1/19A, न्यू पालम  विहार, गुड़गांंव, हरियाणा मो-9899034323 मेरी बेटी /सबकी बेटी मैं जब भी अपनी बीवी की आँखों में देखता हूँ उसमें मेरी बेटी का चेहरा नजर आता है। जो बड़ी होकर अपने पति को जैसे बड़ी उम्मीद से याचक होकर निहार रही है तो मैं बिगड़ नहीं पाता हूँ वहीं ढीला पड़ जाता हूँ। क्रोध नहीं कर पाता उबलता दूध जैसे छाछ हो जाता है. हाथ-पांव शरीर और दिल अवश होकर जकड़ में आ जाता है और आये दिन अख़बारों में पढ़े अच्छे-बुरे समाचारों की सुर्खियाँ याद आ-आकर मुझे दहलाने लगती हैँ। और मेरी पाशविक जिदें, नीच चाहतें बहुत घिनौनी और बौनी होकर मेरा मुँह  चिढ़ाने लगती है। कोई भला ऐसे में कैसे अपने परिवार को भूल अपनी बेटी के भावी सुखों को नजरअंदाज कर अपना सुख चाहता है ? वह ऐसा बबूल कैसे बो सकता है जिसे काटने की सोचते ही उसका कलेजा मुँह  को आता है? तभी जब मैं कुछ कहने को होता हूँ...

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भास्कर चौधुरी की दस कविताएं

भास्कर चौधुरी जन्म: 27 अगस्त 1969 रमानुजगंज, सरगुजा (छ.ग.) शिक्षा: एम. ए. (हिंदी एवं अंग्रेजी) बी एड प्रकाशन: एक काव्य संकलन ‘कुछ हिस्सा तो उनका भी है’ एवं गद्य संकलन (यात्रा वृतांत) ‘बस्तर में तीन दिन’ प्रकाशित। लघु पत्रिका ‘संकेत’ का छ्टा अंक कविताओं पर केंद्रित. कविता, संस्मरण, समीक्षा आदि...

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डाॅ. मृणालिका ओझा की कहानी ‘पिता, जाने के बाद’

  उस वक्त भैया गए थे, पिता जी के साथ, उनके अंतिम प्रवास पर। नाव पर नाविक भी था और जीजा जी भी। आज बीच संगम, नदियों के मंझधार, वे पिताजी को पूरी तरह छोड़ आएंगे। अब वे पिताजी की अत्यधिक पानी खर्चने की आदत से परेशान नहीं होंगे। बीच...

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हमारी भी छापो! हम भी लेखक-वेखक हैं!

व्यंग्य आलोक प्रकाश एक बहुत ही गुणी साहित्यकार हैं. मुझ से उम्र में बड़े हैं. उनका लिहाज करता हूँ मैं. सर कहकर संबोधित करता हूँ उनको. फ़ेसबुक पर उन्होंने एक ग्रुप बनाया हुआ है. इसमें हम साहित्यकारों की कृतियाँ प्रकाशित होती हैं. ग्रुप तो दूसरे भी हैं लेकिन उनका  स्टैंडर्ड मेरे स्टैंडर्ड...

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प्यार करना रचनाकार होना है

  वेद प्रकाश प्यार एक सहज व्यक्ति की सहज अभिव्यक्ति है । हम इसे श्रेणियों में विभक्त नहीं कर सकते । एक मन से दूसरे मन की आभासी बातचीत जब रूपाकार होने लगती है, तो प्रेम का स्वरूप तैयार होने लगता है । यह किसी को बताया नहीं जाता और...

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नीरजा मेहता की कविता ‘ज़िन्दगी एक पहेली’

ज़िन्दगी आदि से अंत तक शाश्वत किन्तु क्षणिक विस्तृत किन्तु संक्षिप्त विचित्र किन्तु सत्य अलबेली किन्तु नित्य चिर परिचित किन्तु अकाल्पनिक रहस्यमयी किन्तु दिलचस्प विस्मयकारी किन्तु प्रभावकारी अभिशापित किन्तु अलौकिक वरदान सी उलझी डोर सी किन्तु सपनों को साकार करती सी प्रवाहमयी अद्भुत अभिव्यक्ति सी भावानुकूल सुसंस्कृत आदर्शमयी कविता की...

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भावना की तीन कविताएं

संवेदनाओं का पौधा अधिकांश औरतें जब व्यस्त होती हैं खरीदने में साड़ी और सलवार सूट तो लेखिकाएं खरीदती हैं अपने लिए कुछ किताबें ,पत्रिकाएॅ और कलम अधिकांश औरतें जब ढूंढती हैं इन्टरनेट पर फैशन का ट्रेंड तो लेखिकाएं तलाशती हैं ऑनलाइन किताबों की लिस्ट अधिकांश औरतें जब नाखून में नेलपाॅलिश...

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प्रभांशु कुमार की दो कविताएं

लेबर चौराहा और कविता सूर्य की पहली किरण के स्पर्श से पुलकित हो उठती है कविता चल देती है लेबर चौराहे की ओर जहां  मजदूरों की बोली लगती है। होता है श्रम का कारोबार गाँव-देहात से कुछ पैदल कुछ साइकिलों से काम की तलाश में आये मजदूरों की भीड़ में...

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राकेश रोहित की सात कविताएं

जब सब लौट जायेंगे सब जब घर लौट जायेंगे मैं कहाँ जाऊंगा इतनी बड़ी दुनिया में नहीं है मेरा कोई वृक्ष! मेरे जीवन में कुछ कलरव की स्मृतियाँ हैं और एक पुराने स्कूल की जिसकी दीवार ढह गयी थी मास्टर जी की पीठ पर छुट्टी का घंटा बजने पर जहाँ...

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अंजना वाजपेई की कविता ‘ये शेष रह जाएंगे’

कुछ गोलियों की आवाजें बम के धमाके , फैल जाती है खामोशी …नहीं, यह खामोशी नहीं सुहागिनों का ,बच्चों का, मां बाप का करूण विलाप है, मूक रूदन है प्रकृति का , धरती का ,आकाश का …..जलेंगी चिताएं और विलीन हो जायेंगे शरीर जो सिर्फ शरीर ही नहीं प्यार है...

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गौतम कुमार ‘सागर’ की चार कविताएं

एक उम्र  की सुराही से रिस रहा है लम्हा लम्हा बूँद बूँद और हमें मालूम तक नहीं पड़ता कितनी स्मृतियाँ पुरानी किताब के जर्द पन्ने की तरह धूमिल पड़ गई हमें मालूम तक नहीं पड़ता बिना मिले , बिना देखे कितने अनमोल रिश्ते औपचारिकता में तब्दील हो जाते है हमें...

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विभा परमार की दो कविताएं

सवाल आने बंद हो जाएं… मेरे भीतर चलती रहती है सवालों की सीरीज अनवरत गति से जैसे हवा चलती है, पानी बहता है और साँसें चलती हैं सोचती हूँ अक्सर हवा गर रुक जाये तो दम घुटता है पानी रुक जाये तो सड़ने लगता है सवाल आने बंद हो जाएं...

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मनी यादव की चार ग़जलें

एक ख़ुशबू तेरी पयाम लायी है फिर फ़िज़ा में बहार आयी है बेवफ़ा मैं नहीं, न ही तुम हो फ़ितरते इश्क़ बेवफ़ाई है इत्र चुपके से कान में बोला खुशबू दिलदार से चुरायी है कोई मंज़र नहीं रहा ग़म का आज शायद वो मुस्करायी है पहना ज्यों ही लिबास यादों...

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अजमेर अंसारी ‘कशिश’ की एक ग़ज़ल

पस्ती में जिसने माना के तदबीर इश्क़ है पहुँचा बुलन्दियों पे तो तक़दीर इश्क़ है ! क्यों देखूँ इस जहान कीं रंगीनियाँ तमाम मेरी नज़र में यार की तस्वीर इश्क़ है हर लम्हा आता–जाता बताता है दोस्तो दुनिया है एक ख़्वाब तो ताबीर इश्क़ है मुझ सा कोई गनी नहीं...

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चंद्र प्रकाश श्रीवास्तव की सात कविताएं

जब कविताएं नहीं होंगी सोचो जरा ऐसे कल के बारे में जब कविताएं नहीं होंगी सोचो जब गीतों में सुर नहीं होंगे सोचो जब आल्हा चैती के स्वर नहीं होंगे सोचो जब ताल, धुन और लय नहीं होंगे सोचो जब किस्से और किस्सागो नहीं होंगे सोचो जब बच्चे सपने देखना...