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कुमार विजय गुप्त की कविता ‘दीपावली की रात तुम’

एक लक्ष्मी-गणेश पूजन के बाद धूपबत्ती की भीनी खुशबू और घंटी की सुरीली आवाज़ के बीच अराधना की मुद्रा में हाथ जोड़े खड़ी तुम दिखती हो एक सुंदर मंदिर -सी और मेरे भीतर जड़ जमाने लगती है आस्तिकता की दूब दो नन्हें नन्हें टिमटिमाते दीपों को करीने से सजाकर छज्जे,...

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सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की तीन कविताएं

 सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव भूख और मुहब्बत मैंने ठंडे चूल्हे में मुहब्बत को दम तोड़ते देखा है भूख दीवानी है किसी को नहीं छोड़ती दिवास्वप्न हां यह एक दिवास्वप्न है कि आदमी कभी आदमी भी बनेगा। अंधेरे से क्या डरना? अंधेरे से क्या डरना? अंधेरा है तो उजाला आएगा ही आखिर...