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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘फुंसियाँ’

सुशांत सुप्रिय A-5001,गौड़ ग्रीन सिटी ,वैभव खंड ,इंदिरापुरम ,ग़ाज़ियाबाद – 201014( उ. प्र . )मो: 8512070086ई-मेल: sushant1968@gmail.com  सुधीन्द्र, जब यह पत्र तुम्हें मिलेगा, मैं तुम्हारे जीवन से बहुत दूर जा चुकी हूँगी । मेरे पैरों में इतने वर्षोंसे बँधी जंजीर खुल चुकी होगी । मेरे पैर परों-से  हल्के लग रहे होंगे और किसी भी रास्ते पर चलने के लिए स्वतंत्र होंगे । चलने से पहले तुम से चंद बातें कर लेना ज़रूरी है । कल रात फिर मुझे वही सपना आया। तुममुझे अपने दफ़्तर की किसी पार्टी में ले गए हो । सपने में जाने-पहचाने लोग हैं।  परस्पर अभिवादन और बातचीत हो रही है कि अचानक सबके चेहरों पर देखते-ही-देखते फुंसियाँ उग आती हैं । फुंसियों का आकार बढ़ता चला जाता है । फुंसियों की पारदर्शी झिल्ली के भीतर भरा मवाद साफ़ दिखने लगता है । और तब एक भयानक बात होती है । उन फुंसियों के भीतर मवाद में लिपटा तुम्हारा डरावना चेहरा नज़र आने लगता है । तुम्हारे सिर पर दो सींग उग जाते हैं । जैसे तुम तुम न हो कर कोई भयावह यमदूत हो । असंख्य फुंसियों के भीतर असंख्य तुम । मानो बड़े-बड़े दाँतों वाले असंख्य यमदूत… डर के मारे मेरी आँख खुल गई । दिसंबर की सर्द रात में भी मैं पसीने से तरबतर थी । “तुमने ऐसा सपना क्यों देखा ? “जब भी मैं इस सपने का ज़िक्र तुमसे करती तो तुम मुझे ही कटघरे में खड़ा कर देते । “क्यों क्या ? क्या सपनों पर मेरा वश है ? “मैं कहती । तुम्हारा बस चलता तो तुम मेरे सपने भी नियंत्रित कर लेते ! तुम कहते हो कि यह सपना मेरे अवचेतन मन में दबी हुई कोई कुंठा है, अतीत की कोई स्मृति है । दुर्भाग्य यह है कि मेरी तमाम कुंठाओं के जनक तुम ही हो । मेरे भूत और वर्तमान में तुम्हारे ही भारी क़दमों की चहलक़दमी की आवाज़ गूँज रही है । मुड़कर देखने पर लगता है कि मामूली-सी  बात  थी।  मेरे  गाल  पर अक्सर उग आने वाली चंद फुंसियाँ ही तो इसकी जड़ में थीं । लेकिन क्या यह बात वाक़ई इतनी मामूली-सी थी ? तुमने ‘ आइसबर्ग ‘ देखा है ? उसका केवल थोड़ा-सा हिस्सा पानी की सतह के ऊपर दिखता है । यदि कोई अनाड़ी देखे तो लगेगा जैसे छोटा-सा बर्फ का टुकड़ा पानी की सतह पर तैर रहा है । पर ‘ आइसबर्ग ‘ का असली आकार तो पानी की सतह के नीचे तैर रहा होता है जिससे टकरा कर बड़े-बड़े जहाज़ डूब जाते हैं । जो बात ऊपर से मामूली दिखती है उसकी जड़ में कुछ और ही छिपा होता है। बड़ा और भयावह  । मेरे चेहरे पर अक्सर उग आने वाली फुंसियों से तुम्हें चिढ़ थी । मेरा उन्हें सहलाना भी तुम्हें पसंद नहीं था । बचपन से ही मेरी त्वचा तैलीय थी । मेरे चेहरे पर फुंसियाँ होती रहती थीं । मुझे उन्हें सहलाना अच्छा लगता था । ” फुंसियों से मत खेलो । मुझे अच्छा नहीं लगता । ” तुम ग़ुस्से से कह उठते । ” क्यों ? ” आख़िर यह छोटी-सी आदत ही तो थी । ” क्यों क्या ? मैंने कहा, इसलिए ! ” ” पर तुम्हें अच्छा क्यों नहीं लगता ? ” तुम कोई जवाब नहीं देते पर तुम्हारा ग़ुस्सा बढ़ता जाता । फिर तुम मुझ पर चिल्लाने लगते । तुम्हारा चेहरा मेरे सपने में आई फुंसियों में बैठे यमदूतों-सा  हो  जाता ।  तुम चिल्ला कर कुछ बोल रहे होते पर मुझे कुछ भी सुनाई नहीं देता । मैं केवल तुम्हें देख रही होती । तुम्हारे हाथ-पैरों में किसी जंगली जानवर के पंजों जैसे बड़े-बड़े नाख़ून उग जाते । तुम्हारे विकृत चेहरे पर भयावह दाँत उग जाते । तुम्हारे सिर पर दो सींग उग जाते । तुम मेरे चेहरे की ओर इशारा कर के कुछ बोल रहे होते और तब अचानक मुझे फिर से सब सुनाई देने लगता । ” भद्दी, बदसूरत कहीं की ।” तुम ग़ुस्से से पागल हो कर चीख़ रहे होते । शायद मैं तुम्हें शुरू से ही भद्दी लगती थी , बदसूरत लगती थी । फुंसियाँ तो एक बहाना थीं । शायद यही वजह रही होगी कि तुम्हें मेरी फुंसियाँ और उन्हें छूने की मेरी मामूली-सी आदत भी असहनीय लगती थी । जब हम किसी से चिढ़ने लगते हैं, नफ़रत करने लगते हैं तब उसकी हर आदत हमें बुरी लगती है । यदि तुम्हें मुझ से प्यार होता तो शायद तुम मेरी फुंसियों को नज़रंदाज़ कर देते । पता नहीं तुमने मुझसे शादी क्यों की ? शायद इसलिए कि मैं अपने अमीर पिता की इकलौती बेटी थी । मेरे पापा को तुमने चालाकी से पहले ही प्रभावित कर लिया था । उनकी मौत के बाद उनकी सारी जायदाद तुम्हारे पास आ गई और तुम अपना असली रूप दिखाने लगे । ” तुम भी पक्की ढीठ हो । तुम नहीं बदलोगी । ” तुम अक्सर किसी-न-किसी  बात  पर  अपने  विष-बुझे बाणों से मुझे बींधते रहते । सच्चाई तो यह है कि शादी के बाद से अब तक तुमने अपनी एक भी आदत नहीं बदली — सिगरेट पीना , शराब पीना , इंटरनेट पर पार्न-साइट्स देखना...

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प्रज्ञा की कहानी ‘एक झरना ज़मींदोज़’

प्रज्ञा प्रकाशित कृतियां कहानी संग्रह-तकसीम, मन्न्त टेलर्स उपन्यास—गूदड़ बस्ती, धर्मपुर लॉज नाट्यालोचना और सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दों पर भी पुस्तकें प्रकाशित संप्रति एसोसिएट प्रोफेसर किरोड़ीमल कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय ई-मेल-pragya3k@gmail.com एक प्रेम कहानी ऐसी भी! जैसा उन्हें उस वक्त देखा, मैं वैसा ही पेश करने की कोशिश करूंगा जनाब! न...

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आलोक कौशिक की लघुकथा ‘डॉग लवर’

आलोक कौशिक शिक्षा- स्नातकोत्तर (अंग्रेजी साहित्य)पेशा- पत्रकारिता एवं स्वतंत्र लेखनसाहित्यिक कृतियां- प्रमुख राष्ट्रीय समाचारपत्रों एवं साहित्यिक पत्रिकाओं में दर्जनों रचनाएं प्रकाशितपता:- मनीषा मैन्शन, जिला- बेगूसराय, बिहार, 851101,Email  devraajkaushik1989@gmail.com    ओमप्रकाश भारतीय उर्फ पलटू जी शहर के सबसे बड़े उद्योगपति होने के साथ ही फेमस डॉग लवर अर्थात् प्रसिद्ध कुत्ता प्रेमी भी...

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संजीव ठाकुर की कविता ‘प्रेमिका की याद’

संजीव ठाकुर प्रेमिका की याद  1 प्रेमिका की याद मजबूत खूँटी टाँगकर खुद को हुआ जा सकता है निश्चिंत । 2 प्रेमिका की याद शहद में डूबा तीर बार–बार खाने का मन करे । 3 प्रेमिका की याद बरसाती नदी नहीं होती प्रेमिका की याद बूँदा–बाँदी भी नहीं प्रेमिका की...

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रमेश उपाध्याय की कहानी ‘काठ में कोंपल’

रमेश उपाध्याय सम्मान गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार (केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा), साहित्यिक पत्रकारिता पुरस्कार (वनमाली सृजनपीठ, भोपाल), ‘नदी के साथ’ (उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ द्वारा पुरस्कृत), ‘किसी देश के किसी शहर में’, ‘डॉक्यूड्रामा तथा अन्य कहानियाँ’ (दोनों पुस्तकें हिंदी अकादमी, दिल्ली द्वारा पुरस्कृत) संपर्क 107, साक्षरा अपार्टमेंट्स, ए-3, पश्चिम...

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विमलेश त्रिपाठी की 5 प्रेम कविताएं

विमलेश त्रिपाठी विमलेश त्रिपाठी के कविता संग्रह ‘उजली मुस्कुराहटों के बीच’ को अभी किंडल से डाउनलोड करें और अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत कराएं। डाउनलोड करने के लिए नीचे की तस्वीर पर क्लिक करें। एक भाषा हैं हम शब्दों के महीन धागे हैं हमारे संबंध कई-कई शब्दों के रेशे-से गुंथेसाबुत खड़े...

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अर्पण कुमार की 5 कविताएं

अर्पण कुमार दो काव्य संग्रह ‘नदी के पार नदी’ (2002), ‘मैं सड़क हूँ’ (2011) एवं एक उपन्यास ‘पच्चीस वर्ग गज़’ (2017) प्रकाशित एवं चर्चित। कविताएँ एवं कहानियाँ, आकाशावाणी के दिल्ली, जयपुर एवं बिलासपुर केंद्र से प्रसारित। दूरदर्शन के ‘जयपुर’ एवं ‘जगदलपुर’ केंद्रों से कविताओं का प्रसारण एवं कुछ परिचर्चाओं में...

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डा.अमरजीत कौंके की 12 क्षणिकाएं

अमरजीत कौंके  1सुरमई संध्या कोहरी घास पर उस की आँखों में देखते  सोचा मैंने- अगर सारी जिंदगी यूँ ही गुज़रती तो बस क्षण भर की होती…. 2सुरमई संध्या को हरी घास पर उसके पास बैठे मैंने कहा उस से – कोई बात करो वह बोली -जब ख़ामोशी ख़ामोशी से संवाद कर रही होतो शब्दों को निरर्थक गँवाने का क्या...

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पल्लवी मुखर्जी की 5 कविताएं

पल्लवी मुखर्जी एक आओ सुनते है एक दूसरे की धड़कनों को धड़कनेंधड़कती हैं जैसेघड़ी की सुईटिक-टिक करती और ले जाती हैं हमेंं उम्र के उस दौर मेंजहाँ न मैं….मैं रहती हूँन तुम….तुम रहते हो हम एक हो जाते हैंउम्मीदों का हरापन लेकर  दो तुम एक पुल होजिस पर सेतमाम रिश्ते गुज़र रहे हैंधड़ाधड़ जैसे गुज़रती...

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उदयराज की कहानी ‘विश्वास-यात्रा’

उदयराज रितेश और मोहिनी बड़ी सतर्कता से प्लेटफॉर्म पर पहुंच एक कोने में दुबकने के अंदाज़ में बैठ गए। दिल्ली के लिए टिकट आते ही ले लिया था। उनकी नज़रें निरंतर प्लेटफॉर्म पर आने के सभी प्रवेश द्वारों पर घूम रही थीं और कान अनाउंसमेंट पर लगा हुआ था। यूं...

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पुष्कर बन्धु की 5 कविताएं

पुष्कर बन्धु काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातक व परास्नातक ( हिन्दी साहित्य ) 2017 । सोशल मीडिया पर कविताओं का प्रकाशन । साहित्य , समाज और राजनीति में  गहरी रुचि । पता – हौसला सिंह लॉज, नसीरपुर, सुसुवाहि , हैदराबाद गेट , BHU चयन और प्रस्तुति : विहाग वैभव  ...

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নিবেদিতা হালদার গাঙ্গুলি র “মেঘাচ্ছন্ন আকাশ”

(৩) এর মধ্যে কফি আর মাফিন চলে এল। আমি ওর দিকে তাকানো বন্ধ করে কফিতে মন দিলাম। চিনি ঢাললাম, চামচ দিয়ে গুলতে থাকলাম। তারপর মাফিনের প্লেটটা সামনে টেনে নিলাম। চামচ দিয়ে এক টুকরো কেটে মুখে দিয়ে ওর দিকে না তাকিয়েই বললাম “thanks”! আমার ষষ্ঠ ইন্দ্রিয় জানান দিচ্ছিল এই পুরো সময়টা ও...

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জয়াবতী ভট্টাচার্যর কবিতা ”স্বপ্ন পরশ”

সবে তো পান পাত্র হয়েছে নিঃশেষ, সবে তো ছোঁয়া ঘন আবেশে রঙিন স্বপ্ন….রঙিন পরশ, মোহমুগ্ধ,  তন্দ্রালু চাহনি, শরীর অবশ । রজনী এখনো বাকি…. তোর মত্ততার নেশায়।।

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দেবায়ন কোলের অনুগল্প ‘ভালোবাসার রঙ’

বিয়ের পরে একবারই মাত্র দোল খেলার সুযোগ হয়েছিল সুতপার। অর্ণব পেছন থেকে সেদিন হঠাৎ করে তার শ্যামলা রঙের মুখটাতে আবীর মাখিয়ে বলেছিল, “শুভ দোলযাত্রা,তপা। এরকমই সুন্দর থেকো সবসময়।” লজ্জায় আবীরের থেকেও লাল হয়ে উঠেছিল সেদিন সুতপা। মুখে বলেছিল, “আমার রঙ মাখতে ভালো লাগে না, জানো না?” অর্ণব তাকে আলিঙ্গনাবদ্ধ করে...

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দোলা সেনের গল্প ‘বসন্ত –রাগ’

শনির রাতে দমকা ঝড় উঠল। হালকা, খুব হালকা ধারাপাত। তাতেই রবিবারের সকালটায় বেশ শিরশিরে আমেজ। ছটার সময় নিত্যকার প্রাতঃভ্রমণে যাই যাই করছি, সৌরভের আধ-ঘুমন্ত গলা কানে এল, – “ঘণ্টাখানেকের মধ্যে বেরোতে পারবে ?” তা, ‘পাগলা খাবি ? না, আঁচাবো কোথায় !’ ঝড়ের বেগে স্নান, টোস্ট সহযোগে চা, তারপরেই গাড়ী —-...

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পিউ দাশের গল্প ‘প্রেম’

“হোলি হ্যায়!” দূর থেকে ভেসে আসে কাদের যেন চিৎকার। সেই শব্দকে ছাপিয়ে ওঠে ধ্রুবর গলা। “অসম্ভব!” চেঁচিয়ে ওঠে ধ্রুব। “অসম্ভব!” ওর কপালের উপরের শিরা ফুলে ওঠে। নাকের পাটা ফুলে ওঠে। লাল হয়ে ওঠে ওর মুখ। “কি মনে করিস তুই আমাকে? কি ভাবিস?” প্রবল তিক্ততায় চাপা গলায় ওর জিজ্ঞাসা কঠোর হয়ে...

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रमेश शर्मा की पांच कविताएं

  रमेश शर्मा जन्म: 06.6.1966, रायगढ़ छत्तीसगढ़ में . शिक्षा: एम.एस.सी. (गणित) , बी.एड. सम्प्रति: व्याख्याता सृजन: एक कहानी संग्रह मुक्ति 2013 में बोधि प्रकाशन जयपुर से प्रकाशित . छह खंड में प्रकाशित कथा मध्यप्रदेश के छठवें खंड में कहानी सम्मिलित . *कहानियां: समकालीन भारतीय साहित्य , परिकथा, हंस ,पाठ...

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भास्कर चौधुरी की पांच कविताएं

  भास्कर चौधुरी परिचय जन्म: 27 अगस्त 1969 रमानुजगंज, सरगुजा (छ.ग.) शिक्षा: एम. ए. (हिंदी एवं अंग्रेजी) बी एड प्रकाशन: एक काव्य संकलन ‘कुछ हिस्सा तो उनका भी है’ एवं गद्य संकलन (यात्रा वृतांत) ‘बस्तर में तीन दिन’ प्रकाशित। लघु पत्रिका ‘संकेत’ का छ्ठा अंक कविताओं पर केंद्रित. कविता, संस्मरण,...

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हाफ गर्लफ्रेंड

  संजय स्वतंत्र द लास्ट कोच : किस्त 9 राजीव चौक से वह मेरे साथ ही आखिरी डिब्बे में सवार हुई है। वह जिस तरह बार-बार अपने चेहरे को पोंछ रही है, उससे लगता है कि वह काफी दूर से और कई काम निपटा कर आई है। रूमाल से वह...

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अनुपम निशान्त की चार कविताएं

  अनुपम निशान्त चुनार (मिर्जापुर) में जन्म। काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी से पत्रकारिता में परास्नातक। देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में काम। संप्रति अमर उजाला, वाराणसी में वरिष्ठ उप संपादक। 1- अपना शून्य गढ़ो कभी-कभी जिंदगी के लिए जरूरी खुशी करीब होकर भी गुम जाती है तलाशने लगो तो मिलती...