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प्रभांशु कुमार की दो कविताएं

लेबर चौराहा और कविता सूर्य की पहली किरण के स्पर्श से पुलकित हो उठती है कविता चल देती है लेबर चौराहे की ओर जहां  मजदूरों की बोली लगती है। होता है श्रम का कारोबार गाँव-देहात से कुछ पैदल कुछ साइकिलों से काम की तलाश में आये मजदूरों की भीड़ में...

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘विवशता’

जब सुबह झुनिया वहाँ पहुँची तो बंगला रात की उमस में लिपटा हुआ गर्मी में उबल रहा था । सुबह सात बजे की धूप में तल्ख़ी थी । वह तल्ख़ी उसे मेम साहब की तल्ख़ ज़बान की याद दिला रही थी । बाहरी गेट खोल कर वह जैसे ही अहाते...

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प्रवीण कुमार की दो कविताएं

पेंसिल, कलम, गुलाब वाले बच्चे ‘क’ से कलम नहीं जानता वह ‘प’ से पेंसिल मायने भी नहीं समझता शायद गुलाब जैसा खुद रहा होगा कभी शायद जन्म लेने के वक्त या कुछ महीनों बाद तक पर अब हो गया है सूखकर कांटे जैसा स्कूल का मुंह नहीं देखा लेकिन कर...

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क़ैस जौनपुरी की कहानी ‘सफ़ेद दाग़’

इला बड़ी देर से बस के आने का इन्तज़ार कर रही थी. काफ़ी लम्बे इन्तज़ार के बाद जब बस आई, तो इला भीड़ के साथ बस में चढ़ तो गई, लेकिन बैठने के लिए उसे सीट नहीं मिली. उसने भीड़ से खचा-खच भरी हुई बस से उतर जाना चाहा, ये...

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महावीर राजी की कहानी ‘पंच’

रेलवे स्टेशन के गर्भ से नाल की तरह निकल कर ऐश्वर्या राय की कमर की तरह छुई मुई सी “स्टेशन सरणी ” शहर के बीचों बीच से गुजरने वाले अजगरनुमा ‘शेर शाह सूरी मार्ग ‘ को जिस स्थान पर लम्बवत क्रॉस करती आगे बढ़ जाती है, वह जगह शहर के...

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हिन्दी साहित्य का बाजारकाल

भरत प्रसाद                                                        नयी सदी, नया जमीन, नयी आकाश, नया लक्ष्य, नयी उम्मीदें, नयी आकांक्षाएँ। यकीनन मौजूदा सदी ने मनुष्य और उसके जीवन के प्रत्येक पहलू को नयेपन की आँधी में उलट-पलट कर रख दिया है। परम्परागत मूल्य, मान्यताएँ, रिवाज, संस्कार और तौर-तरीके विलुप्त प्रजातियों की नियति प्राप्त करने वाले...

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परितोष कुमार पीयूष की कविता ‘बाज़ारवाद’

बाज़ारवाद सत्ता की पीठ पर बैठा बाज़ारवाद देखो किस प्रकार राक्षसी हँसी हँस रहा प्रवेश कर तुम्हारे ही घर और समाज में तुमसे छीन ली है तुम्हारी सारी संवेदनाएं और तोड़ दिए हैं समस्त मानवीय रिश्तों को तार-तार कर तुम्हारी सभ्यता की शालीनता बेच दी है तुम्हें और तुम्हारी विरादरी...

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हेमन्त वशिष्ठ की कविता ‘आपकी क्या राय है’

” नहीं यार मैं नहीं पूछूंगा … मेरा मन नहीं मानता … ये उस टाइप का लगता ही नहीं है “… — ‘ ये कैसे कह दिया आपने ‘… “कभी बातें सुनी हैं आपने इसकी “… ‘ कभी … हां कभी कभी ही तो बोलता है … जाने कौन घमंड...

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘चिकन’

” आज कुछ नॉन-वेज खाते हैं , स्वीटी । चिकन-शिकन हो जाए । ” बिस्तर पर अँगड़ाई लेते हुए रजिंदर बोला । ” आँख खुली नहीं जी और आपने फ़रमाइश कर दी । ले आना । बना दूँगी । ” बगल में लेटी सुमन बोली । प्यार से रजिंदर उसे...

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शैलेंद्र शांत की चार कविताएं

शैलेंद्र शांत   उसके सीने पर सवार थी इमारत मछलियां बार-बार ऊपर आ जाती थीं और पलट कर गोताखोर बन जाती थीं इस छोर, उस छोर कुछ लोग उन्हें फंसाने की फिराक में बैठे थे बंसी डाले और उधर उस छोर पर बैठे थे कुछ जोड़े अपनी सुध खोए और...

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बाज़ार

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव   एक लड़की छपवाती है दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित फैशन पत्रिका में अपना नग्न चित्र। बताते हैं वह दुनिया की सबसे महंगी मॉडल है शायद इसलिए उसकी नग्नता में सौंदर्य नहीं ज्यामिति झलकती है। शरीर की ज्यामिति अर्थ की ज्यामिति जो देती है आमंत्रण विज्ञापनदाताओं को लो...