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परमानन्द रमन की चार कविताएं

परमानन्द रमन जन्मतिथि : 20/12/1983 जन्म-स्थान : जमशेदपुर(तात्कालीन बिहार, वर्तमान झारखण्ड) ग्राम: करहसी, जिला- रोहतास (बिहार) आरंभिक शिक्षा बारहवीं तक

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जया यशदीप घिल्डियाल की तीन कविताएं

जया यशदीप घिल्डियाल मूल निवासी – पौड़ी गढ़वाल ,उत्तराखंड स्नातकोत्तर रसायन विज्ञान रसायन विज्ञान अध्यापिका पुणे ,महाराष्ट्र कातिलों के बच्चे

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डॉ दिग्विजय शर्मा “द्रोण” की तीन कविताएं

डॉ दिग्विजय शर्मा “द्रोण” शिक्षा- एम ए (हिंदी, भाषाविज्ञान, संस्कृत, पत्रकारिता), एम फिल, पीएच डी,। विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं व वेब

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समीर कुमार ठाकुर की कहानी “लव यू डैड”

समीर कुमार ठाकुर समीर नवोदित कथाकार हैं। लिटरेचर प्वाइंट में उनकी ये पहली कहानी प्रकाशित हो रही है। उम्मीद है

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शिवदयाल की कहानी ‘मुन्ना बैंडवाले उस्ताद’

इतनी सी बारात पार्टी और इतना विलम्ब! कुल पचास साठ से ज्यादा लोग नहीं रहे होंगे। जमाने के हिसाब से यों बाराती कुछ संकोची और गम्भीर दिखते थे। हम वधू पक्षवाले कोई घंटे भर से उनके सत्कार के लिए खड़े थे, बल्कि थक गये थे। कई लोग तो नौ बजे के बाद घर लौटने लगे थे। मेरा भी यही विचार था। मैंने पत्नी को बताया तो कहने लगी- मौसी बुरा मानेंगी।  कम से कम बारात लगने तक तो रुकना पड़ेगा। शादी पत्नी की मौसेरी बहन की थी, गो सीधी मौसेरी बहन नहीं, उसकी माँ की चचेरी बहन की लड़की। मरता क्या न करता, मुझे खड़ा रहना पड़ा। अब जब कि बारात लग ही रही थी तो मैं बहुत राहत महसूस कर रहा था। बारात पार्टी के कुछ नौजवान सदस्यों में जोश था। वे आत्ममुग्ध से क्लैरिनेट और ड्रम की बीट्स पर मटक रहे थे। बारात है, बाजा है तो नाच है। कुछ महिलाएँ भी बारातियों में शामिल थीं और उनमें से कुछ तालियाँ बजा-बजाकर नाचनेवालों का उत्साह बढ़ा रही थीं। मेरे सबसे नजदीक सोजोफोन लिये एक बाजावाला खड़ा था। मुझे इसका गुमान तब हुआ जबकि उसकी भारी और कर्कश आवाज ने मुझे बुरी तरह चौंका दिया। जैसे बकरियों की मिमियाहट के बीच सहसा शेर ने दहाड़ मारी हो। ड्रम तेज होकर अचानक खामोश हो गया – ढन्-ढना-ढन-ढन्! कुछ ही क्षणों बाद क्लैरिनेट की सुरीली आवाज फिज़ा में उभरी। मालूम पड़ता था कि इस नयी धुन के खामोश होने के बाद ही बाराती-घराती गले मिल पाएँगे। मुझे बहुत ताज्जुब हो रहा था। नयी धुन पुराने फिल्मी गाने की थी-“पंख होते तो उड़ आती रे … ”, मैं उस उत्सव भरे माहौल से जैसे ऊपर उठ गया – हवा में। पहले तो लगा मानो बहुत दूर कहीं यह धुन बज रही है, फिर लगा यह धुन मेरे ही अन्दर बज रही है, जाने कब से बज रही है-बरसों से। मुझे आश्यर्च वैसे इस बात पर भी हो रहा था कि आज के इस ’राॅक’ और ’पाॅप’ के दौर में बाजेवाले इतनी हिम्मत का काम कैसे कर बैठे कि ’पंख होते तो  उड़ आती रे……’ बजा लें। मेरी दिलचस्पी अब बारातियों की बजाय बाजावालों में थी। पोशाक उनकी अच्छी थी। लाल, हरे, सुनहरे रंग की यूनिफार्म में वे सजे-धजे थे लेकिन क्लैरिनेट वाला आदमी यानी मास्टर पतलून-कमीज में था। धुन मुश्किल थी। वह जब बाजे में फूँक मारता तो उसके गाल छोटे-छोटे गुब्बारों की तरह फूल जाते और गर्दन का रेशा-रेशा ऐसा तन जाता कि मानो अब फटा कि तब। जबकि चेहरा पसीने से तर-ब-तर जिस पर वह अवकाश मिलने पर रूमाल फिरा लेता। ड्रमवाला कहीं प्रफुल्लित दिखता था। नौजवान था सत्रह-अठारह का, गोरा, खूबसूरत। ड्रम ठोकते हुए बार-बार उस्ताद को देख लेता था। एक बार किंचित् तेज ठोक बैठा हो, उस्ताद ने झट उसकी ओर कड़ी नजरों से देखा और हाथ से इशारा किया-हौले से, आहिस्ता से। “पंख होते तो उड़ आती रे …….।” मैं बाजेवाले को देख रहा था और कभी-कभी फूलों से सजी धजी कार के अन्दर बैठे दूल्हे को भी देख लेता था, जो गर्मी से परेशान दिखता था। लेकिन मेरा मन न जाने कहाँ, किन दिशाओं में भटक रहा था। पता नहीं मैं क्या भूल रहा था और क्या याद कर रहा था। तभी ड्रमवाले ने शायद फिर गलती की। उस्ताद इस बार फिर गुर्राये। वह झेंपकर हँसने लगा, जैसे अपनी गलती मान ली हो। उस्ताद अब बिल्कुल मेरे सामने खड़े थे। गहरा साँवला परेशान चेहरा, उभरी हुई कनपटियों की नसें, तलवार-कट मूँछें, किन्हीं सोच में दाखिल आँखों के ऊपर छोटी भवें, लम्बी-सी नाक और अधपके बाल छोटे-छोटे। बायीं गाल पर नाक की जड़ के पास एक बड़ा सा मस्सा भी दूधिया रोशनी में दिखने से बच न सका। “अजीज मियाँ….” बेसाख्ता मेरे मुँह से निकला। ’अरे, यह तो अजीज मियाँ हैं’- मैंने अपने आप से कहा। अजीज मियाँ ने अपने आस-पास देखा लेकिन मुझे नहीं और अपने साथियों को एक ओर जाने को कहकर खुद भी उनके पीछे हो लिये। अब द्वार-पूजा हो रही थी, मंगल-गान गाती स्त्रियों में थोड़ी आपाधापी थी। “अजीज मियाँ? आप अजीज मियाँ हैं न?” मैंने उन्हें पीछे से पुकारा। वे रुक गये और पीछे मुड़कर मुझे देखा, अपरिचित निगाहों से। “मुझे पहचाना? मैं सूरज! आप तो बूढ़े हो गये एकदम?” मैं हँसने लगा। वे मुस्कराये लेकिन जैसे अभी मुझे पहचान नहीं पाये थे। “याद आया? मैं सूरज …….. भरत बाबू का लड़का ………?” “अरे बाबू आप? आप तो इतने कद्दावर और सयाने हो गये हैं। मैंने तो सच ही नहीं पहचाना।” “मेरे रिश्तेदार की बेटी की शादी है। मैंने तो आपको पहचान लिया। आपने ऐसी धुन ही बजायी जो और कोई बजा ही नहीं सकता। ” मैं फिर हँसने लगा। “आप तो नाहक मुझे बना रहे हैं। और सुनाइए, सब खैरियत तो है? बाबूजी कैसे हैं? चाची कैसी हैं?” “सब लोग ठीक हैं लेकिन आपने ये आप-आप क्या लगा रखी है? मैं तो वही पुराना सूरज हूँ अजीज मियाँ।’’ “आपका बड़प्पन है बाबू आप इतने बड़े हो गये तो आपको तो आप ही कहूँगा न।” “अच्छा नहीं लगता।”

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