एस. आनन्द के दस मुक्तक

एक इतना आदर दिया गया मुझको टूटा छप्पर दिया गया मुझको। इस सियासत की गंदी भाषा का अक्षर-अक्षर दिया गया मुझको दो सबको सबका विश्वास नहीं होता है सुख सूरज सा ढल जाता ,अहसास नहीं होता है दुख की बदली जब घिरती है चारों ओर उस वक्त अपना भी अपने...