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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘बंटवारा’

मेरा शरीर सड़क पर पड़ा था । माथे पर चोट का निशान था । क़मीज़ पर ख़ून के छींटे थे । मेरे चारो ओर भीड़ जमा थी । भीड़ उत्तेजित थी । देखते-ही-देखते भीड़ दो हिस्सों में बँट गई । एक हिस्सा मुझे हिंदू बता रहा था । केसरिया झंडे...

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अबयज़ ख़ान की ग़ज़ल

बेवजह नहीं दीवार पे इल्ज़ाम लिखे हैं हमने तो बस मंज़र ए आम लिखे हैं तुमने पैदा की है हिन्दू मुसलमा की खाई शहर शहर नफ़रतों के इश्तेहार लिखे हैं तुम्हारी शफकतों के तलबगार नहीं हम ख़ुदा ने किस्मत में बहुत इनाम लिखे हैं हमारी वफ़ादारियों पर शक ना करो...