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তিনকবির সংলাপ ” মেঘবালিকার ধারাপাত…”

ভেজা মেঘের আলাপে আবেগ করে স্নান আমার মনে তোমার ছবি হয়না কভু ম্লান। আকাশের মেঘ যখন মনের মাঝে এসে জমাট বাঁধে অগোছালো ভাবনা গুলো তখন কবিতা হয়ে ডুব দেয় মন দরিয়ায়। পামেলা, দেবারতি, শেলী এরা তিন বন্ধু।না চাক্ষুষ কেউ কাউকে দেখেনি। তবুও তারা বন্ধু। ভার্চুয়াল জগৎ এর মোহজালে আবদ্ধ তিন...

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अनुपमा शर्मा की कविता ‘अस्तित्व की जड़’

अदृश्य है ,है दृश्य भी, सजीव में है,निर्जीव में भी, ज्ञान में है, अश्रु में है, मुस्कान में है, आवाज़ में है, साज़ में भी, नृत्य की मुद्राओ में भी, अभिनय में भी, शिक्षा में भी, आत्मविश्वास में भी, विश्व की हर काबिलियत में भी, उसकी प्राथमिकता है केवल सम्मान,...

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পামেলা চক্রবর্তীর কবিতা “একটি রূপকথার জন্ম!”

   সব শব্দের অর্থ থাকলে অর্থহীন শব্দেরা নিঃশব্দ হয়ে যায়।           “হাজার কথা”র ভীড়…                     নিঃশব্দ হলে মন্দ কি? তবে ,সেইদিন, এক ‘সাধারণ’ছেলে….                     যখন এক ‘অ’ মেয়ের...

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प्रतिभा चौहान की पांच कविताएं

||हमारे फूल -तुम्हारे नक्शे|| तुम्हें उलझे हुए आदमी हो तुम सुलझा नहीं  सके समय की लट को तुमने नहीं सीखा खुशियों से खेलना तुम्हें नहीं आता सीधे सरल सवालों का जवाब देना तुमने तो यह भी नहीं समझा कि डूबते हुए आदमी को तिनके का सहारा होता है तुमने नहीं...

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पंकज शर्मा की दो कविताएं

तस्वीरें… गहरे असमंजस से भरा चेहरा अचानक मुस्कुरा उठता है। स्माइल प्लीज.. सुनकर कुछ साफ दिल लोगों को छोड़ हर चेहरा हरा भरा हो उठता है। और.. निकल आती है तरह तरह की तस्वीरें.. कुछ हँसते चेहरों के बीच, बुझी आँखों की कुछ जवां नौकरियों के बीच,रिटायर्ड साखों की अटल...

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सुशांत सुप्रिय की छह कविताएं

1. लौट आऊँगा मैं क़लम में रोशनाई-सा पृथ्वी पर अन्न के दाने-सा कोख में जीवन के बीज-सा लौट आऊँगा मैं आकाश में इंद्रधनुष-सा धरती पर मीठे पानी के कुएँ-सा ध्वंस के बाद नव-निर्माण-सा लौट आऊँगा मैं लौट आऊँगा मैं आँखों में नींद-सा जीभ में स्वाद-सा थनों में दूध-सा ठूँठ हो...

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कविता में भाषा की खोज

शहंशाह आलम मेरे मन में अक्सर यह प्रश्न आता.जाता रहा है कि भाषा का काम क्या है? मैं सोचता हूँ (मेरा ऐसा सोचना भाषा के विद्वान अध्येता की दृष्टि में किसी जाहिल, किसी अपढ़, किसी बच्चे का सोचा हुआ कहा जा सकता है, तब भी मैं अपने इस सोचे को...

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শেলী নন্দীর কবিতা ‘মন্দ হলে ‘

অবুঝ মনের অবাধ্যতায় ডাক পড়ে সর্বনাশী খেলার। গোপন থেকে সঙ্গোপনে কুড়িয়ে রাখি ইচ্ছে পালক। মন্দ হওয়ার বেপরোয়া শক্তিতে পরাজিত হয় মনের রক্তকরবী।  মনের সাথে শরীর মেশে, শরীর জুড়েও মন। লজ্জারা যায় নির্বাসনে শীতের ঝরাপাতা হয়ে। শিহরন জাগরন মিলেমিশে রং পায় উষ্ণতার বুকে। অভিমানী সত্ত্বা বেপথু হয় অভিসারী বাঁশীর হাতছানিতে। শিশিরের...

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कविता हमें त्रासदी से बाहर निकालती है : मदन कश्यप

 राजभाषा विभाग, बिहार सरकार के   ‘नागार्जुन-सम्मान’ से सम्मानित  कवि मदन कश्यप का कविता-पाठ शहंशाह आलम की रिपोर्ट    ‘गूलर के फूल नहीं खिलते’, ‘लेकिन उदास है पृथ्वी’, नीम रोशनी में’, ‘कुरुज’ और ‘दूर तक चुप्पी’ जैसे महत्वपूर्ण कविता-संग्रहों के कवि मदन कश्यप की कविताओं का पाठ पटना में स्थित ‘टेक्नो हैराल्ड’...

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স্বাতী মজুমদারের কবিতা ‘আত্মপরিচয়’

একবার বুঝতে চেয়ে বুঝতে চেষ্টা কর আমায়। জলের চেয়েও সহজ আমি। আর না চাইলে? পৃথিবীর সবচেয়ে জটিল ধাঁধাটাও হার মানবে আমার কাছে। না। আমার চেতনার রঙে কখনও পান্না সবুজ, চুনী রাঙা হয়ে ওঠেনি । আমি কখনও পুবে পশ্চিমে আলো জ্বালব বলে চোখ মেলিনি আকাশে। গোলাপের দিকে চেয়ে কখনও বলিনি ‘সুন্দর’।...

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मार्टिन जॉन की दो कविताएं

मैं ईश्वर की शपथ लेता हूँ   उसने शपथ ली , “मैं ईश्वर की शपथ लेता हूँ ……….” और वह राजा बन गया   इसके पहले मज़हबी क़िताबों की कसमें खा चुका है कई कांडों को सरअंजाम देने के मामले में .   ईश्वर सर्वशक्तिमान है ईश्वर उसे शक्ति देगा...

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মৌমিতা গুঁইর কবিতা ‘নীলস্বপ্ন’

আমার দুঃখের সূর্য ঝলমল করে আকাশে রাতের তারারা মিটিমিটি চায় ভাবসম্প্রসারণের চাঁদ হোক যতই ঝলসানো রুটি, রুটিতে যে বড্ড অরুচি। মেঘ যদি পিওন হয়, দমকা হাওয়া নিয়ে আসে উড়োচিঠি – বসন্ত চাই না আমি, অপেক্ষা করছি কালবৈশাখী। উড়ে যাবে ছাতা, আমি কিন্তু ইষ্টনাম জপতে জপতে ভাবব ডুবল বুঝি তরী –...

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সৌমেন দত্তর কবিতা ‘পরিণীতা’,

প্রহর গুলো অরুণা জালে ঘিরেছে, অভ্যাসের চিলেকোঠার বদ্ধতা থেকে, তোমার টানে কিনারাহীন কিনারায় পদার্পন। রজনীগন্ধা নেই,বকুল গাছও নেই, তবুও ঘরছাড়া এ মন। মিথ্যে মুখে সত্যির স্নো পাউডারে শহরটা চকচকে, কান্না আর হাহাকারের নিত্য আনাগোনা। কষ্টের দহনে,দগ্ধ আর্তনাদ, এতো কোলাহল আর্তনাদের মাঝে শান্তি খুঁজি। রঙিন জৌলুশে ঠাসা, চতুর্দিক উনকোটি চৌষট্টি কর্মে...

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चन्द्रप्रकाश श्रीवास्तव की छह कविताएं

गतिमान हने दो समय को भागता है समय तो भागने दो समय को कुलाचें भरने दो समय चीखता-चिल्लाता है तो चीखने चिल्लाने दो समय अकुलाता है तो अकुलाने दो समय विलाप करता है तो सुनो समय का विलाप अच्छा है समय का गतिमान रहना कुलाचें भरना चीखना-चिल्लाना हांफना और विलाप...

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कृष्णधर शर्मा की चार कविताएं

नदी और औरत किसी झरने का नदी बन जाना ठीक वैसे ही तो जैसे किसी लड़की का औरत बन जाना जैसे एकवचन से बहुवचन हो जाना जैसे अपने लिए जीना छोड़कर दुनिया के लिए जीना जैसे दूसरों को अमृत पिला खुद जहर पीना अद्भुत सी समानताएं हैं नदी और औरत...

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ललित शर्मा की दो कविताएं

 बिजूका जानते नहीं , क्या होता, बिजूका? एक टाँग , पर खड़ा हुआ, बाँहें पसारे, मटकी का सिर लटकाये, सदा मुस्कराये, पराली का शरीर, चीथड़े लगा कोट, खेत जैसे इसका हो। कौआ भगाने को, लगाया इसको, चिड़िया तक नहीं , भागती, चूहे भी, कुतर जाते टाँग , इसी की, कभी...

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डॉ भावना की तीन कविताएं

उस रात उस रात जब बेला ने खिलने से मना कर दिया था तो ख़ुशबू उदास हो गयी थी उस रात जब चाँदनी ने फेर ली अपनी नज़रें चाँद को देखकर तो रो पड़ा था आसमान उस रात जब नदी ने बिल्कुल शांत हो रोक ली थी अपनी धाराएँ तो...

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देवेंद्र कुमार की पांच कविताएं

आंखों में पानी  डॉक्टर ने कहा आंखों में ड्रायनेस है आंसू नहीं बनते अब कुछ दिनों में दिखना भी बंद हो जाएगा दिखना बंद होने से पहले ही बंद हो गए आंसू देखकर भी नहीं बहता आंखों से आंसू चाहे कुछ भी देख लो डॉक्टर ने कहा प्रदूषण बढ़ गया...

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सुधीर कुमार सोनी की छह कविताएं

बेमिसाल मुहब्बत पानी के गहरे तल में पत्थर है पत्थर के गहरे तल में पानी है पानी है पत्थर है अटूट प्रेम है यह शायद कोई नहीं जानता कि इनके प्रेम की मिसाल दी जाए धीरे-धीरे कटकर प्रेम में सब कुछ मिटा देना पत्थर के सिवाय कोई नहीं जानता युगों-युगों से...