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सेवा सदन प्रसाद की तीन लघुकथाएं

  सेवा सदन प्रसाद एक हिंदी लेखक मोबाइल की घंटी बजी ।ऑन करने पे आवाज आई — “हेलो,  सुधीर जी नमस्कार ।” ” नमस्कार भाई साहब ।” ” सुधीर जी, आपकी कहानी बहुत अच्छी लगी “कैसी कहानी  ? ” सुधीर जी ने थोड़ा आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा । ”...

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘दो दूना पांच’

     कैसा समय है यह / जब भेड़ियों ने हथिया ली हैं / सारी मशालें /                               और हम निहत्थे खड़े हैं … जैसे पहाड़ से एक बहुत बड़ा पत्थर तेज़ी से लुढ़कता हुआ सीधा...

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विहाग वैभव की पांच कविताएं

माँ का सिंगारदान हर जवान लड़के की याद में बचपन सर्दियों के मौसम में उठता गर्म भाप सा नहीं होता रेत की कार में बैठा हुआ लड़का गुम गया मड़ई की हवेली में हमारे प्रिय खेलों में सबसे अजीब खेल था माँ के सिंगारदान में उलट-पलट , इधर-उधर जिसमें रहती...