परितोष कुमार ‘पीयूष’ की दो कविताएं

इंसानी शक्ल वाले गिद्ध नन्हें कदमों से परचून की दूकान जाते वक्त जब वो खींच ली गई होगी सड़क किनारे से खर-पतवारों के बीच सूनसान जंगली खेतों में कितनी छटपटाई होगी कितनी मिन्नतें माँगी होगी कैसा लगा होगा उसे जब उसका सुनने वाला कोई नहीं होगा उसकी अपनी ही आवाज...