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‘पिंक’ से दो कदम आगे है ‘पार्च्ड’

संदीप श्याम शर्मा “पार्च्ड” का मतलब बंजर, शुष्क, जला हुआ, भुना हुआ, सूखा आदि है लेकिन लीना यादव द्वारा लिखित-निर्देशित यह फ़िल्म इतनी हरी-भरी और ख़ूूबसूरत है कि अंत तक आते-आते सबकी बांछे खिल उठेंगी, हर तरफ़ हरियाली दिखाई देगी। सभी किरदार अपनी-अपनी कहानी लेकर चलते हैं, आगे बढ़ते हैं...

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इस निपात समय को जवान बरगद का पेड़ सौंपते कवि की कविताएँ

पुस्तक-समीक्षा शहंशाह आलम सुल्तान अहमद समकालीन कविता के वैसे कवियों में शुमार किए जाते रहे हैं, जिनकी कविताएँ हमारे समय की अवनति को, ह्रास को, अध:पतन को को चिह्नित करके जवान, हरियल, उन्नति से भरे पत्ते फागुन और चैत माह को सौंपते रहे हैं। यानी जिस माह में सभी वृक्षों...

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इस संसार को देखने की समझ देती कविताएँ

पुस्तक-समीक्षा शहंशाह आलम हर कवि अपने समय को गहराई में जाकर सुनता है, तब अपने सुने हुए समय को एकदम विलक्षण प्रकट करता है। सच्चाई यही है, कवि के समय में जो कुछ घटित हुआ होता है, हर कवि उसी घटे हुए के प्रभाव में होता हुआ ख़ुद को रचनारत...

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निराला की कविता का विस्तार -‘‘राजा की दुनिया’’

अमीरचंद वैश्य बुद्धिलाल पाल पुलिस विभाग में उच्चपद पर सेवारत है। ऐसी अवस्था में व्यवस्था की आलोचना करते समय उन्हें सघन अन्तद्र्वन्द्व का तनाव झेलना पड़ता होगा। फिर भी उन्होंने साहस किया है। ‘राजा की दुनिया’ से साक्षात्कार करवाके वर्तमान क्रूर व्यवस्था की सटीक आलोचना की है। मुक्तिबोध के बहुप्रयुक्त...

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एक अच्छी दुनिया का मतलब समझाती कविताएं

शहंशाह आलम कविता का मतलब प्रार्थना के शब्द नहीं होते। मेरा मानना है कि कोई कवि जैसे ही अपनी कविता को प्रार्थना का माध्यम बना लेता है, कविता की मृत्यु उसी क्षण हो जाती है। इसलिए कि कविता-लेखन का अर्थ यह तो क़तई नहीं है कि कवि अपने आस-पास की...

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मनुष्य और लोकजीवन के कभी न अंत होने की कविताएँ

शहंशाह आलम   मेरा मानना है कि कविता की आँखें होती हैं, तभी तो जिस तरह कवि की पुतली अपने समय को देखने के लिए हर तरफ़ घूमती-घामती है, वैसे ही कविता की भी पुतली चहुँओर घूमती रहती है। कवि और कविता के लिए यह ज़रूरी भी है कि दोनों...

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हमारे समय की पटकथा

राजकिशोर राजन   हम ऐसे समय में जी रहे हैं जब साहित्य भी बाजारवाद के ढाँचे में समाहित हो रहा है। प्रतिरोध के स्वर नेपथ्य में जा रहे हैं। वैसे में एक कविता ही है जो सबसे ज्यादा बेचैन है, चूँकि उसका सपना संसार को सुन्दर, कलात्मक, भय-भूख और शोषण...

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रूपेश कश्यप की सच्ची कविताएं

राकेश कायस्थ   कुछ कविताएं अच्छी होती हैं। कुछ कविताएं कच्ची होती हैं लेकिन ज्यादातर कविताएं सच्ची होती हैं। ऐसी ही एक सच्ची कविता से पिछले दिनों मुलाकात हो गई- नन्ही-सी उम्र से ही हमारा नन्ही चवन्नियों से याराना था वो भी क्या खूब ज़माना था कि हर बाजी पर...