Tagged: riot

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘विरासत’

श्रीकांत जिस दिन अठारह साल का हुआ , उसी दिन उन्मादियों ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिरा दी । देश में जगह-जगह दंगे शुरू हो गए जिनमें निर्दोष लोग मारे जाने लगे । उस दिन श्रीकांत देर तक रेडियो और टी.वी. पर ख़बरें देखता-सुनता रहा । आज़ाद भारत के इतिहास...

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कमलेश भारतीय की चार कविताएं

एक दिन जब थक जाता है तब रात उसे थाम लेती है दिन और रात की सुख और दुख की जुगलबंदी का नाम ही जिंदगी है, मित्रो । दो वसंत तुम आए हो तुम्हारा स्वागत् है पर मैं तुम्हारे फूलों का क्या करूं? किसी शहर में आगजनी किसी में लगा...

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गियासुर्रहमान की कहानी ‘बीच की दीवार’

उर्दू कहानी मूल लेखक :  गियासुर्रहमान अनुवाद : नसीम अजीजी पूरे दस दिन हो गए थे। फ़साद की आग जो भड़की तो बुझने का नाम नहीं लेती थी। सारे शहर में सख्त कर्प्यू के बावजूद वारदातें हो रही थीं। पूरी दस रातें आंखों में गुजर गईं। इस क़दर शोर-शराबे में...

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परितोष कुमार पीयूष की तीन कविताएं

मत आना प्रिय तुम! सुनो प्रिय मत आना तुम मुझसे मिलने ठीक नहीं है मौसम मेरे शहर का यहाँ शहर की नालियों में लाशें ही लाशें हैं सड़कों पर धर्म और राजनीति के साँप फुफकार रहे हैं यहाँ की गलियों में खूनी फब्बारों का आनंद लेने आती है प्रशासनिक गाड़ियां...

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘कबीरदास’

यह काल्पनिक कहानी नहीं है , सच्ची घटना है । पिछले साल गर्मी की छुट्टियों में मैं अपने मामा के यहाँ रहने के लिए आया । वहीं मामाजी ने मुझे यह सत्य-कथा सुनाई । पिछले कई सालों से शहर के इलाक़े रामपुरा शरीफ़ में एक अर्द्ध-विक्षिप्त बूढ़ा भटकता हुआ दिख...

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सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की कविता ‘रोटियों के हादसे’

एक मरियल कुत्ता और एक मरियल आदमी कूड़ेदान में पड़ी एक सूखी रोटी के लिए झगड़ पड़े। कुत्ते ने कहा– मैंने देखा है पहले हक मेरा बनता है। आदमी चिल्लाया–नहीं! नहीं कर सकते तुम उल्लंघन मानवाधिकारों का रोटी पहले मैंने देखी है इस पर मेरा अधिकार बनता है। आदमी ने...

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सुशांत सुप्रिय की दो कविताएं

एक जलता हुआ दृश्य वह एक जलता हुआ दृश्य था वह मध्य-काल था या 1947 1984 था या 1992 या वह 2002 था यह ठीक से पता नहीं चलता था शायद वह प्रागैतिहासिक काल से अब तक के सभी जलते हुए दृश्यों का निचोड़ था उस दृश्य के भीतर हर...

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निर्मल गुप्ता की दो कविताएं

संवाद का पुल मैं लिखा करता था अपने पिता को ख़त जब मैं होता था उद्विग्न ,व्यथित या फिर बहुत उदास जब मुझे दिखाई देती थीं अपनी राह में बिछी नागफनी ही नागफनी यहाँ से वहां तक। मेरा बेटा मुझे कभी ख़त नहीं लिखता फ़ोन ही करता है केवल उसकी...

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘चिकन’

” आज कुछ नॉन-वेज खाते हैं , स्वीटी । चिकन-शिकन हो जाए । ” बिस्तर पर अँगड़ाई लेते हुए रजिंदर बोला । ” आँख खुली नहीं जी और आपने फ़रमाइश कर दी । ले आना । बना दूँगी । ” बगल में लेटी सुमन बोली । प्यार से रजिंदर उसे...